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Home Prabhat Khabar Special ज्योतिष के अनुसार 15 अगस्त का दिन आजादी के लिए शुभ नहीं था, तब पंडित नेहरू ने किया था ये उपाय…

ज्योतिष के अनुसार 15 अगस्त का दिन आजादी के लिए शुभ नहीं था, तब पंडित नेहरू ने किया था ये उपाय…

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ज्योतिष के अनुसार 15 अगस्त का दिन आजादी के लिए शुभ नहीं था, तब पंडित नेहरू ने किया था ये उपाय…
क्या भारत को आजादी अशुभ मुहूर्त में मिली थी?

Story Of Partition Of India 5 : 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया गया. इस अधिनियम के पास होने से यह तय हो गया कि भारत अब  आजाद हो जाएगा और उसके दो टुकड़े हो जाएंगे. इससे पहले 3 जून 1947 को कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं ने भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया था. इस बात की सूचना जब रेडियो द्वारा प्रसारित हुई और महात्मा गांधी तक सूचना पहुंची, तो वे बहुत निराश हुए. उन्होंने देश के विभाजन को भयानक बहुत ही भयानक कहा था. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम से यह तो तय हो गया था कि भारत को स्वतंत्रता देश के विभाजन के साथ मिल रही है, लेकिन अंग्रजों के जाने की तिथि अभी घोषित नहीं थी, क्योंकि सत्ता हस्तांतरण का काम पूरा नहीं हुआ था, जो बहुत ही महत्वपूर्ण था.

भारत के विभाजन की खबर का महात्मा गांधी पर कैसा था असर

Mahatma Gandhi With Mountbatten In 1947
भारत के विभाजन का महात्मा गांधी पर असर

महात्मा गांधी को जिस दिन यह सूचना मिली कि भारत को आजादी विभाजन के साथ मिलेगी, वह उनके मौन का दिन था. महात्मा गांधी हमेशा यह कहते थे कि देश के विभाजन से पहले वे अपने शरीर के दो टुकड़े कर देंगे. लेकिन उनके सामने देश के टुकड़े हुए और उनके शागिर्दों ने इसपर सहमति भी दे दी. 4 जून को गांधीजी कांग्रेस के नेताओं से नाता तोड़कर अपनी प्रार्थना सभा में इस निर्णय की आलोचना करने वाले थे. यह खबर मिलते ही वायसराय माउंटबेटन उनसे मिलने पहुंचे और उन्हें समझाया कि आप ही कहते थे कि देश का विभाजन होगा या नहीं यह हिंदुस्तानियों पर छोड़ दिया जाए, तो यह हिंदुस्तानियों की ही इच्छा है. माउंटबेटन ने गांधी जी को कई तरह के तर्क देकर समझाने की कोशिश की, जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हो गए. गांधी जी प्रार्थना सभा में पहुंचे,तो उन्होंने कहा कि विभाजन के लिए वायसराय को दोष देने का कोई फायदा नहीं है. आप सब अपने मन को टटोलिए तब पता चलेगा कि जो हुआ, वह क्यों हुआ. 

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कैसे हुई थी आजादी की तिथि की घोषणा

माउंटबेटन एक संवाददाता सम्मेलन में अपनी योजनाओं की जानकारी दे रहे थे. बता रहे थे कि किस तरह पावर ट्रांसफर होगा. इस संवाददाता सम्मेलन में पत्रकारों का मजमा लगा था. सभी सवाल पूछ रहे थे और इस संवाददाता सम्मेलन का अंतिम प्रश्न एक भारतीय पत्रकार ने किया और उनसे पूछा कि सत्ता हस्तांतरण के लिए कोई तिथि निर्धारित की गई है क्या? इसपर माउंटबेटन ने उनसे कहा कि जी हां, बिलकुल तिथि निर्धारित है. माउंटबेटन ने अचानक ही अपने मन से यह बता दिया कि भारत को आजादी 15 अगस्त को मिलेगी.

क्या भारत को आजादी अशुभ मुहूर्त में मिली थी? 

Independence Of India
भारत की स्वतंत्रता का मुहूर्त

माउंटबेटन द्वारा आजादी की तिथि घोषित किए जाने के बाद जब यह सूचना रेडियो द्वारा प्रसारित हुई कि भारत को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिलेगी तो भारतीय ज्योतिषियों को झटका लग गया. उनके अनुसार यह तिथि शुभ नहीं थी. कोलकाता के एक ज्योतिष मदनानंद ने तो माउंटबेटन को एक पत्र भी लिखा था जिसमें यह जिक्र था कि यह अनर्थ ना करें, भारत को 15 अगस्त को आजादी ना दें. इस दिन अगर भारत को आजादी मिली तो नरसंहार होगा. बाढ़, अकाल जैसी त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है. इससे अच्छा तो यह हो कि भारत एक और दिन गुलामी की त्रासदी सह ले. इस बात का जिक्र डोमिनीक लापिएर और लैरी काॅलिन्स की किताब फ्रीडम एट नाइट में किया गया है. वरिष्ठ पत्रकार दुर्गादास ने अपनी किताब ‘इंडिया – फ्राम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर’ में भी इस बात का जिक्र किया है कि 15 अगस्त का दिन आजादी के लिए शुभ नहीं माना गया था. इसका रास्ता निकालने के लिए नेहरू जी ने दिल्ली के ज्योतिषों से बात की और फिर शुरू हुई ज्योतिषीय गणना. गणना के बाद यह तय हुआ कि भारत को आजादी 15 अगस्त (अंग्रेजी तारीख से रात के 12 बजे) को ही मिलेगी, लेकिन ज्योतिषीय गणना के अनुसार दिन की शुरुआत उदयातिथि से होती है और उससे पहले का समय आजादी के लिए शुभ था. यानी भारत को आजादी ज्योतिषीय गणना के अनुसार शुभ मुहूर्त में मिली थी.

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भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ब्रिटिश संसद से कब पारित हुआ था?

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ब्रिटिश संसद से 18 जुलाई 1947 को पारित हुआ था.

भारत की आजादी की तारीख किसने घोषित की थी?

भारत की आजादी की तारीख लॉर्ड माउंटबेटन ने घोषित की थी.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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