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Sonam Wangchuk Arrest : सोनम वांगचुक कैसे बन गए एक आविष्कारक से बागी? FCRA लाइसेंस रद्द

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Sonam Wangchuk Arrest : सोनम वांगचुक कैसे बन गए एक आविष्कारक से बागी? FCRA लाइसेंस रद्द
सोनम वांगचुक

Sonam Wangchuk Arrest : इंजीनियर से शिक्षा सुधारक और पर्यावरणविद बने सोनम वांगचुक को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया है और वे फिलहाल जेल में हैं.लेह-लद्दाख में 24 सितंबर को युवा सड़कों पर उतरे और उनका प्रदर्शन हिंसक हो गया. युवाओं ने सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और सीआरपीएफ की एक गाड़ी को फूंक दिया. बीजेपी कार्यालय को भी आग के हवाले करने की सूचना सामने आई थी. लेह-लद्दाख का युवा वहां के शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुके की अगुवाई में आंदोलन कर रहा था और लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और उसे छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहा था. भीड़ के हिंसक होने पर सोनम वांगचुक ने शांति की अपील की और कहा कि यह हमारा रास्ता नहीं है. हम अनशन पर हैं और अपनी मांग सरकार के सामने शांतिपूर्वक ढंग से रख रहे हैं, बावजूद इसके सरकार ने यह माना कि सोनम वांगचुक के भड़काऊ भाषण की वजह से युवा आक्रोशित हुए और लेह-लद्दाख में हिंसा की. गृह मंत्रालय ने सोनम वांगचुक के एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद्द किया और उनपर यह आरोप भी लगा कि वे विदेश से गलत तरीके से चंदा लेते हैं.

Sonam Wangchuk Hunger Strike 1
Sonam wangchuk arrest : सोनम वांगचुक कैसे बन गए एक आविष्कारक से बागी? Fcra लाइसेंस रद्द 3

FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) लाइसेंस क्या है?

किसी भी गैर सरकारी संगठन द्वारा अगर विदेशी धन चंदे के रूप में प्राप्त किया जाता है, तो उसका सही और सद्‌पयोग हो, इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार FCRA लाइसेंस देती है. इस लाइसेंस के जरिए ही कोई संस्था विदेशी फंड का उपयोग कर सकती है, अन्यथा विदेश से धन मंगाना और उसका उपयोग करना किसी भी गैर सरकारी संस्थान के लिए संभव नहीं है और अगर वह ऐसा करता है, तो उसे गैरकानूनी माना जाएगा. FCRA लाइसेंस देश का गृह मंत्रालय जारी करता है और इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी गैर सरकारी संस्थान जो विदेशों से धन प्राप्त करती है, वह उस धन का उपयोग राष्ट्रीय हित में करे और उसका किसी भी तरह से दुरुपयोग न हो.

FCRA लाइसेंस जिन संगठनों को मिलता है, क्या सरकार उन्हें नियंत्रित कर सकती है?

FCRA लाइसेंस देने का उद्देश्य ही ऐसे संगठनों को नियंत्रित करना है जो विदेशी धन प्राप्त करते हैं. सरकार ऐसे संगठनों के आय का पूरा ब्यौरा उनसे मांगती है और उनके बैंक एकाउंट पर भी नजर रखती है. जिस भी संस्थान को FCRA लाइसेंस दिया जाता है, नियमानुसार उन्हें विदेश से पैसा एक फिक्स एकाउंट में मंगाना होता है, जिसपर सरकार कड़ी निगरानी रखती है. साथ ही उनके आय-व्यय की आॅडिट भी होती है, अगर सरकार को यह प्रतीत होता है कि कोई संस्थान विदेश से प्राप्त धन का गलत प्रयोग कर रहा है, तो सरकार उनका लाइसेंस रद्द भी कर सकती है. राजनीतिक दल, पत्रकार या मीडिया संस्थान, सरकारी कर्मचारी और न्यायाधीश यह लाइसेंस प्राप्त नहीं कर सकते हैं.

पहली बार कब जारी हुआ था FCRA लाइसेंस?

FCRA लाइसेंस की शुरुआत इमरजेंसी के दौरान हुई थी. उस वक्त देश में कांग्रेस की सरकार थी और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. उन्हें यह डर था कि विदेश से आने वाले पैसे के जरिए भारत की राजनीति को प्रभावित किया जा सकता है. उस वक्त देश में जेपी के नेतृ्त्व में आंदोलन चल रहा था, इसी वजह से सरकार ने विदेशी सहायता पर निगरानी के लिए FCRA लाइसेंस को 1976 में लागू किया था. 2010 में सरकार ने इस कानून में कई बड़े बदलाव किए जिसे यह कानून बहुत सख्त हो गया. नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा 2020 में इस कानून में फिर से संशोधन किया गया, जिससे सरकार ने विदेशी चंदे पर कड़ा नियंत्रण प्राप्त कर लिया. आय-व्यय के ब्यौरे को अपलोड करना, एक निश्चित खाते में सहायता राशि मंगाना जैसे नियम बने. FCRA लाइसेंस 5 साल के लिए जारी होता है और उसके बाद इसका रिन्यूअल कराना पड़ता है. रिन्यूअल के वक्त सरकार खास निगरानी रखती है और पूरी पड़ताल के बाद ही लाइसेंस रिन्यूअल होता है.

सोनम वांगचुक कैसे बन गए एक इनोवेटर से बागी

सोनम वांगचुक एक प्रसिद्ध इनोवेटर हैं. उन्होंने लद्दाख में शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में कई आविष्कार किए, जिनका फायदा वहां के लोगों को मिल रहा है. सोनम वांगचुक के आईस स्तूप (Ice Stupa),सौर-ऊर्जा आधारित इमारतें,SECMOL स्कूल जहां शिक्षा प्रणाली को नवीन तरीके से विकसित किया गया है और पैसिव सोलर ग्रीनहाउस जैसे आविष्कार किया. सोनम वांगचुक ने कभी भी राजनीतिक बयान नहीं दिया और ना ही सरकार के विरुद्ध कोई काम किया. गलवान झड़प के बाद भी वांगचुक ने चीनी उत्पादों के बहिष्कार की बात कही थी, यानी वे सरकार ने विरुद्ध नहीं थे. 2023 में पहली बार सोनम वांगचुक ने राजनीतिक बयान दिया. उन्होंने लद्दाख में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को उजागर किया और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की बात कही, ताकि लद्दाख को सुरक्षित रखा जा सके. बाद में उनके बयान राजनीतिक होते गए और जब उन्होंने यह कहा कि लद्दाख को औद्योगिक खनन लॉबी से सुरक्षा की जरूरत है, तो उनकी और सरकार के बीच की खटपट सामने आ गई. अब सोनम वांगचुक यह भी कह रहे हैं कि लद्दाख के लोगों को लोकतंत्र से दूर कर दिया गया है, वहां कोई विधानसभा नहीं है, कोई उनका नेता नहीं है, ऐसे में उनकी बात कोई सुन नहीं रहा है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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