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Papertrail India: अखबार के पुराने पन्नों से इको-फ्रेंडली बैग बना संवार रही हैं किस्मत

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Papertrail India: अखबार के पुराने पन्नों से इको-फ्रेंडली बैग बना संवार रही हैं किस्मत

Papertrail India: केरल के कोच्चि की रहने वाली दिव्या तोमस को शुरू से ही आर्ट एंड क्राफ्ट में गहरी दिलचस्पी रही है. वर्ष 2008 में उन्होंने ‘पेपरट्रेल इंडिया’ की शुरुआत की और उसे साल 2012 में रजिस्टर कराया. दिव्या बताती हैं, ‘‘मैंने अपने काम की शुरुआत पुराने अखबारों के बैग बनाने से की, पर अब मैं साधारण पेपर बैग के अलावा गिफ्ट पैकिंग बॉक्स, लैंटर्न, गिफ्ट कार्ड, बायोडिग्रेडेबल बैग जैसे 100 से ज्यादा तरह के इको-फ्रेंडली उत्पाद बना रही हूं, जिससे मेरी सालाना कमाई लाखों में हो जाती है.

साल 2008 की आर्थिक मंदी से मिला बिजनेस आइडिया

दिव्या कहती हैं, “2004 में मैंने बेंगलुरु में पेपर बैग बनाने को लेकर आयोजित एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया था. इसके बाद ही मुझे इस सेक्टर में काम करने की इच्छा हुई, पर मैंने उस वक्त काम नहीं किया, जिससे मेरा यह विचार मन में ही कहीं दबा रह गया.” वे बताती हैं, “वर्ष 2008 में आयी आर्थिक मंदी के दौरान कुछ ऐसी घटना घटी, जिससे मेरे भीतर कुछ अलग करने की चाह पैदा हो गयी. एक दिन मैं अपनी दोस्त के घर गयी तो देखा कि वह काफी मुश्किल हालातों से गुजर रही थी. यहां तक कि उस वक्त उसके पास चाय बनाने के लिए दूध भी नहीं था. उसने बताया कि मेरे पास अभी इतने पैसे नहीं हैं कि मैं दूध खरीद सकूं. चूंकि, उस दौरान देश में आर्थिक मंदी चल रही थी और इसका प्रभाव हम सब पर पड़ रहा था. दोस्त के घर से वापस लौटने के बाद ही मैंने अपने पेपर बैग के आइडिया पर काम करने का मन बना लिया.”

करीब 100 से ज्यादा महिलाओं को दे चुकी हैं ट्रेनिंग

दिव्या कहती हैं, “फिर मैंने अपनी दोस्त से बात की और पूछा कि अगर घर पर ही रहकर कुछ कमाने का मौका मिले, तो क्या तुम करना चाहोगी? इसके बाद मैंने अपनी दोस्त और कुछ महिलाओं को अपने काम से जोड़ा. उन्हें अखबार से बैग बनाने की ट्रेनिंग दी. शुरू में हमारे साथ सिर्फ पांच महिलाएं जुड़ीं,पर अब 70 महिलाएं काम कर रही हैं. साथ ही मैं 100 से ज्यादा महिलाओं को ट्रेनिंग भी दे चुकी हूं.

पेपर बैग के अलावा अन्य उत्पाद बनाने के लिए जयपुर व दिल्ली के उद्योगों का किया दौरा

दिव्या ने शुरू में पेपर बैग को बेचने के लिए कई स्थानीय दुकानदारों से बात की. उस समय एक पेपर बैग के दो रुपये मिलते थे और एक महिला तीन घंटे में 60 पेपर बैग बनाती थी, जिससे उन्हें दिन के 120 रुपये मिलते थे. वे कहती हैं, “आज ये पैसे भले ही हमें कम लगे, लेकिन 12-13 साल पहले इतने पैसों में कम से कम एक परिवार का गुजारा हो जाता था. धीरे-धीरे मैंने अपने काम को बढ़ाया, क्योंकि मुझे लगा कि सिर्फ पेपरबैग से आय नहीं बढ़ पायेगी, इसलिए अन्य विकल्पों पर भी काम करना होगा.” इसके बाद मैंने दिल्ली तथा जयपुर जैसी जगहों पर रद्दी पेपर के उद्योगों का दौरा किया और जाना कि वे लोग कैसे काम करते हैं. पेपर बैग के अलावा और कौन-से उत्पाद बना सकते हैं.

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सोशल मीडिया पर की अपने उत्पादों की ब्रांडिंग

दिव्या कहती हैं, “जब केरल सरकार ने प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया, तब मुझे लगा कि हम इस क्षेत्र में भी काम कर सकते हैं. हम सब्जियों के स्टार्च (माड़) से बायोडिग्रेडेबल बैग भी बनाते हैं, जो मिट्टी में दबाने पर मात्र 180 दिनों में डीकम्पोज हो जाते हैं. हालांकि, इन बैग्स की कीमत प्लास्टिक के बैग से कहीं ज्यादा है, लेकिन धीरे-धीरे ही सही, अब इनका प्रचलन बढ़ रहा है. जैसे-जैसे मांग बढ़ेगी तो उत्पादन ज्यादा होगा और फिर इनकी कीमत कम होती जायेगी.” दिव्या ने ‘पेपरट्रेल इंडिया’ के नाम से अपना इंस्टाग्राम, फेसबुक पेज के साथ वेबसाइट भी बनाया है, जहां वे अपने उत्पादों की फोटो साझा करती रहती हैं. अधिकांश उत्पादों के ऑर्डर इन्हीं जगहों से आते हैं. साथ ही उनके बनाये उत्पाद की कीमत 80 रुपये से शुरू है, जो उत्पाद के अनुसार बढ़ती है.

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