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जेन जी प्रोटेस्ट का नेपाल चुनाव पर खासा असर, बालेन शाह की पार्टी आरएसपी पर जनता ने दिखाया विश्वास

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जेन जी प्रोटेस्ट का नेपाल चुनाव पर खासा असर, बालेन शाह की पार्टी आरएसपी पर जनता ने दिखाया विश्वास
वोट डालने के बाद बालेन शाह

Nepal Election Results : नेपाल चुनाव की मतगणना जारी है और ताजा रुझानों से जो संकेत मिल रहे हैं वे यह साबित करते हैं कि नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव होने जा रहा है. हालांकि अभी चुनाव के पूरे परिणाम नहीं आये हैं, लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं वे यह बताते हैं कि बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करने जा रही है. 35 साल के बालेन शाह यानी बालेंद्र शाह नेपाली जनता की राजनीतिक उम्मीद बनकर उभरे हैं. बालेन शाह काठमांडू के मेयर रहे हैं और वे भाषण देने से ज्यादा काम करने में यकीन करते हैं. वे व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हैं और आम लोगों के हित की बात करते हैं.

नेपाल में जेन जी प्रोटेस्ट का क्या हुआ असर?

नेपाल में जेन जी प्रोटेस्ट का असर यह हुआ है कि वहां की जनता राजनीति के क्षेत्र में नया चेहरा और उम्मीद तलाश रही थी, जो उन्हें बालेन शाह के रूप में मिल गया है. नेपाल की जनता ने 5 मार्च को
प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) के लिए मतदान किया था. लगभग 60 प्रतिशत वोटर्स ने मतदान किया है. जो शुरुआती रुझान आए हैं उनके अनुसार बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी( Rastriya Swatantra Party) ने 77 सीटों पर लीड हासिल कर ली थी. प्रतिनिधि सभा में कुल 275 सीटें हैं और चुनाव जीतने वाली पार्टी को बहुमत के लिए 138 सीटों पर जीत हासिल करनी होगी.

अबतक जो चुनाव परिणाम आए हैं, वो शुरुआती रुझान ही हैं, लेकिन लोगों का मन पढ़ने के लिए काफी हैं. भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश और राजनीतिक अस्थिरता की वजह से नेपाल का युवा सड़क पर था और उन प्रदर्शनों के बाद जब वहां पहली चुनाव हो रहे हैं, तो जनता क्या चाहती है इसका प्रमाण बालेन शाह की पार्टी को बढ़त के रूप में स्पष्ट दिख रहा है. साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डाॅ धनंजय त्रिपाठी बताते हैं कि नेपाल में जो चुनाव परिणाम सामने आ रहे हैं, उसपर जेन जी प्रोटेस्ट का असर स्पष्ट दिख रहा है. आम जनता पुराने राजनीतिक पार्टियों से त्रस्त हैं और वह बदलाव के लिए वोट कर रही हैं. बालेंद्र शाह जब काठमांडू के मेयर बने थे तो वे किसी पार्टी का हिस्सा नहीं थे, लेकिन अब वे राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का हिस्सा हैं. यह पार्टी कोई नयी पार्टी नहीं है, पिछले चुनाव में भी इसने हिस्सा लिया था. यह पार्टी क्रांतिकारी विचारों की समर्थक है. इसी वजह से जनता ने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का चुनाव किया है.

कौन हैं बालेन शाह और जनता को उनसे क्यों जगी है उम्मीद?

Balen-Shah
बालेन शाह

नेपाल की जनता देश के राजनेताओं से परेशान है. एक ओर तो नेपाल की जनता गरीबी और बेरोजगारी में जीती है, वहीं दूसरी ओर वहां के राजनेता और उनका परिवार ऐशो–आराम की जिंदगी जीता है. नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता भी दिखती है. 2008 में नेपाल में राजशाही खत्म हुई और लोकतंत्र कायम हुआ, लेकिन सरकारें अस्थिर रहीं और राजनेता पाला बदलते रहे. इस वजह से जनता भुक्तभोगी बन गई. ऐसे में आक्रोशित जनता सड़क पर उतरी और उन्हें अपने घावों पर मरहम लगाने वाले के रूप में बालेन शाह दिखे. बालेन शाह जो 2022 में काठमांडू के मेयर बने थे, वे व्यवस्था के खिलाफ उसी तर्ज पर बोलते हैं, जिस तरीके से जनता बोलना चाहती है. वे नेपाल में नयी तरह की राजनीति की शुरुआत और खुद को भ्रष्टाचार विरोधी नेता के रूप में पेश करते हैं. बालेन शाह नेपाल के एक रैपर हैं और सोशल मीडिया पर काफी चर्चित भी हैं. उनका स्टाइल लोगों को बहुत पसंद है, वे जिस तरह से आम लोगों से बात करते हैं, जनता को वे अपने तारणहार नजर आते हैं. काठमांडू के मेयर के रूप में उन्होंने कई ऐसे काम किए, जो उन्हें एक आदर्श नेता के रूप में स्थापित करते हैं.

डाॅ धनंजय त्रिपाठी बताते हैं कि बालेंद्र शाह एक स्वच्छ छवि के व्यक्ति हैं और उन्होंने आम लोगों के मुद्दों को बखूबी उठाया है. नेपाली जनता का कहना है कि काठमांडू के मेयर के रूप में इन्होंने गरीबों के लिए काफी काम किया. गरीब लोगों के लिए कोटे की व्यवस्था करवाई, एंबुलेंस की व्यवस्था करवाई, साफ–सफाई की व्यवस्था करवाई, जिसकी वजह से आम आदमी की उम्मीदें उनसे जुड़ी हैं. दूसरी जो बड़ी वजह दिखती है वो है उनका किसी पार्टी से जुड़ा नहीं होना है. वे किसी पार्टी से जुड़े नहीं थे, इसलिए पार्टी की गलतियों का बोझ उनपर नहीं था.

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बालेन शाह अगर चुनाव जीतते हैं, तो भारत के साथ संबंधों पर क्या होगा असर?

बालेन शाह अगर नेपाल में चुनाव जीतकर सरकार बनाते हैं, तो संभव है कि कुछ बड़े बदलाव नजर आयें, इसकी वजह यह है कि बालेन शाह देश के स्वाभिमान की बात करते हैं और वे यह भी कहते हैं कि नेपाल को किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. इसका अर्थ यह है कि नेपाल भारत के साथ–साथ चीन के साथ भी अपने संबंधों को पुख्ता कर सकता है. इसके अलावा कालापानी,लिपुलेख और लिंपियाधुरा के मुद्दे पर भी बालेन शाह के रुख पर गौर करना होगा. क्योंकि भारत के इन क्षेत्रों पर नेपाल ने 2020 में अपना दावा पेश करते हुए नेपाल का नया मानचित्र जारी किया था, जिसपर भारत सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई थी. इस बारे में डाॅ धनंजय त्रिपाठी कहते हैं कि बालेंद्र शाह (बालेन शाह) अगर नेपाल की सत्ता की कमान संभालते हैं, तो वह बिलकुल नयी परिस्थिति होगी, जिसके बारे में अभी से कुछ भी कहना उचित नहीं होगा. भारत को अभी वेट एंड वाॅच की मुद्रा में रहना चाहिए और नेपाल में जो कुछ हो रहा है, उसे देख–समझकर ही आगे के निर्णय करने चाहिए.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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