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क्या पीएनजी है तेल संकट का समाधान, जानिए क्यों सरकार इसे कर रही है प्रमोट?

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क्या पीएनजी है तेल संकट का समाधान, जानिए क्यों सरकार इसे कर रही है प्रमोट?
एलपीजी की जगह पीएनजी के इस्तेमाल पर सरकार का जोर

PNG vs LPG : ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध के बीच खाड़ी क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया है. इस तनाव की वजह से पूरे विश्व के साथ–साथ भारत में भी तेल संकट गहराया है. इस संकट से बचने के लिए सरकार ने बुधवार को बड़ा फैसला लिया, जिसके तहत उन क्षेत्रों के लोगों के लिए पीएनजी कनेक्शन लेना अनिवार्य कर दिया जाएगा, जहां पाइपलाइन बिछी हुई है. इसका मतलब यह हुआ कि जहां पीएनजी की पाइपलाइन है, वहां के लोगों को एलपीजी का सिलेंडर नहीं मिलेगा. सरकार के इस नये निर्देश का फायदा क्या होगा और एलपीजी और पीएनजी में क्या है अंतर? आइए समझते हैं.

सबसे पहले जानें PNG और LPG में क्या है फर्क?

पहलूPNG (Piped Natural Gas)LPG (Liquefied Petroleum Gas)
स्रोतप्राकृतिक गैस (मीथेन)पेट्रोलियम से बनी (प्रोपेन + ब्यूटेन)
सप्लाई तरीकापाइपलाइन के जरिए सीधे घर तकसिलेंडर के माध्यम से
उपलब्धतालगातार (continuous supply)खत्म होने पर रिफिल जरूरी
उपयोग में सुविधाज्यादा सुविधाजनक (no refill tension)कम सुविधाजनक (बार-बार सिलेंडर लेना)
सुरक्षाज्यादा सुरक्षित (हवा से हल्की, ऊपर उड़ जाती है)कम सुरक्षित (हवा से भारी, नीचे जमा होती है)
लीकेज का असरजल्दी फैल जाती है, खतरा कमनीचे जमा होकर खतरा बढ़ाती है
लागत (Cost)आमतौर पर सस्तीतुलनात्मक रूप से महंगी

पीएनजी (Piped Natural Gas) और LPG (Liquefied Petroleum Gas) दोनों ही प्रमुख घरेलू ईंधन हैं, लेकिन इनके स्रोत अलग–अलग हैं. पीएनजी मीथेन आधारित प्राकृतिक गैस है, जबकि एलपीजी में प्रोपेन और ब्यूटेन का मिश्रण होता है. एलपीजी को सिलेंडर में भरकर ग्राहकों को उपलब्ध कराया जाता है, जबकि पीएनजी की सप्लाई पाइपलाइन से होती है. इसी वजह से पीएनजी की सेवा बाधित नहीं होती है, जबकि एलपीजी के सिलेंडर को गैस खत्म होने के बाद रिफिल करवाना पड़ता है. सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी पीएनजी को ज्यादा बेहतर माना जाता है, क्योंकि इसमें मीथेन होता है, जो हवा से हल्की होती है और लीक होने पर तेजी से ऊपर जाती है और हवा में फैल जाती है. एलपीजी की गैस हवा से भारी होती है और लीक होने पर नीचे जमा हो जाती है, जिससे आग लगने का खतरा ज्यादा होता है. पीएनजी का एक फायदा यह भी है कि यह एलपीजी की अपेक्षा सस्ता पड़ता है.

पीएनजी का इस्तेमाल बढ़ाने से क्या होगा फायदा?

सरकार अगर देश में पीएनजी का उपयोग अभी बढ़ाती है, तो खाड़ी युद्ध की स्थिति में भारत को इसका फायदा मिलेगा. भारत अपनी LPG जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसका लगभग 80% खाड़ी देशों से भारत आता है. युद्ध की स्थिति में होर्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील समुद्री मार्ग से आवागमन बाधित है. इस परिस्थिति में तेल संकट ना हो इससे बचने के लिए सरकार ने पीएनजी कनेक्शन को विस्तार देने का सोचा है, जो बहुत ही जरूरी कदम साबित हो सकता है. इससे तेल संकट कम होगा और महंगाई भी नियंत्रण में रहेगी.

क्या पीएनजी के मामले में आत्मनिर्भर है भारत?

सरकार ने पीएनजी पर जोर इसलिए दिया है क्योंकि इसका आयात खाड़ी देशों से नहीं होता है. हालांकि पीएनजी के मामले में भी भारत आत्मनिर्भर नहीं है. अभी पीएनजी की जरूरत का लगभग 50% हिस्सा आयात होता है, बाकी भारत में उत्पादन होता है. पीएनजी का ज्यादातर आयात भारत कतर से करता है, युद्ध की स्थिति में भारत रूस, अमेरिका और आस्ट्रेलिया से आयात बढ़ा सकता है. इस कदम से एलपीजी पर निर्भरता कुछ कम होगी और भारत तेल संकट से पड़ने वाले झटके को कुछ हद तक कम कर पाएगा.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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