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विश्व का सबसे ताकतवर देश अमेरिका, लेकिन आजादी से आजतक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं

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विश्व का सबसे ताकतवर देश अमेरिका, लेकिन आजादी से आजतक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं

Kamala Harris vs Donald Trump : विश्व के सबसे ताकतवर देश कहे जाने वाले अमेरिका ने एक बार फिर महिलाओं को निराश किया है. 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में कमला हैरिस राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थीं और उम्मीद की जा रही थी कि इस बार अमेरिका के इतिहास में पहली बार महिला राष्ट्रपति चुनी जाएंगी. लेकिन कमला हैरिस राष्ट्रपति पद का चुनाव हार गईं और उन्होंने अपनी हार स्वीकार भी कर ली है. अमेरिका की आजादी के बाद लगभग 250 साल के इतिहास में अभी तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं चुनी गई हैं.

दो बार महिला उम्मीदवारों ने लड़ा राष्ट्रपति चुनाव

अमेरिका के इतिहास में पहले राष्ट्रपति जाॅर्ज वाॅशिंगटन थे. वे 1789 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने थे और अमेरिका के इतिहास में अबतक 46 राष्ट्रपति बन चुके हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में 2016 में पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन किसी पार्टी द्वारा बनाई गई पहली उम्मीदवार थीं, उनके बाद दूसरी महिला उम्मीदवार कमला हैरिस ही बनी हैं. एक और महिला विक्टोरिया वुडहूल का नाम राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में सामने आता है, हालांकि उन्हें किसी पार्टी ने नामित नहीं किया था. विक्टोरिया ने 1872 में चुनाव लड़ा था वह अमेरिका में महिला अधिकारों के लिए संघर्षरत थी और उन्होंने महिलाओं को मताधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया था. चूंकि विक्टोरिया को किसी भी पार्टी ने अपना उम्मीदवार नहीं बनाया था इसलिए अमेरिकन इतिहासकारों में इस बात को लेकर विवाद है कि विक्टोरिया वुडहूल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार माना जाए अथवा नहीं.

हिलेरी क्लिंटन और कमला हैरिस दोनों को डोनाल्ड ट्रंप ने दी शिकस्त

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कमला हैरिस ने डोनाल्ड ट्रंप को टक्कर दी, लेकिन जीत नहीं पाईं

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में दो बार महिला उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा. दोनों ही बार डेमोक्रेट्‌स ने ही महिलाओं को मौका दिया और यह एक संयोग ही है कि दोनों के खिलाफ उम्मीदवार रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप ही थे और ट्रंप ने दोनों ही बार महिला उम्मीदवारों को शिकस्त दी. कमला हैरिस के अपेक्षा हिलेरी क्लिंटन की लोकप्रियता ज्यादा बताई जाती है क्योंकि हिलेरी क्लिंटन ने पॉपुलर वोटों की गणना में ट्रंप से ज्यादा वोट पाए थे, लेकिन वे चुनाव जीत नहीं पाई थीं. हिलेरी को कुल 65,853,514 पॉपुलर वोट मिले थे जबकि डोनाल्ड ट्रंप को 62,984,828 वोट मिले थे. लेकिन कुल इलेक्टोरल वोट में से हिलेरी को 227 और ट्रंप को 304 वोट मिले थे.

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अमेरिका चुनाव 2016 का परिणाम

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कमला हैरिस की अगर बात करें तो वे चुनावी मैदान में वोटिंग से महज चार महीने पहले लाॅन्च हुईं थी, यही वजह है कि उनकी लोकप्रियता जनता के बीच उतनी नहीं थी जितनी की हिलेरी क्लिंटन की थी. यहां तक कि उन्हें पोल में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन की अपेक्षा कम महिलाओं ने वोट किया. बाइडेन के साथ 68 प्रतिशत महिलाएं थीं जबकि कमला के साथ 61 प्रतिशत. अमेरिका में शोध कर रहे जे सुशील ने अपने आलेख में जिक्र किया है किया है कि कमला हैरिस को डेमोक्रेट ही एक कमजोर उम्मीदवार मान रहे थे. कमला के सामने परेशानी यह थी कि वह अपना कोई एजेंडा पेश नहीं कर सकती थीं, क्योंकि यह अपनी आलोचना हो जाती. यही वजह था कि वे अपना काम भी नहीं गिना सकीं. अमेरिका में चुनाव स्थानीय मुद्दे पर होते हैं और ट्रंप ने यहां हैरिस से बाजी मार ली. अमेरिकियों की राय यह थी कि उनके सामने दो खराब राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं. ट्रंप को पढ़ा-लिखा वर्ग पसंद नहीं करता है, लेकिन उन्होंने कमला को भी अपनी पसंद नहीं बनाया, बल्कि ट्रंप के खिलाफ वोट किया, जिसका नुकसान कमला को हुआ.

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अमेरिका में अधिकारों के लिए महिलाओं को करना पड़ा है संघर्ष

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महिलाओं को मतदान का अधिकार

अमेरिका के इतिहास पर गौर करें तो हम यह समझ पाएंगे कि आखिर क्यों यहां अबतक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन पाई है. सबसे बड़ा उदाहरण तो यह है कि यहां महिलाओं को मताधिकार का अधिकार भी आजादी के 144 साल बाद मिला था. अमेरिका को ब्रिटिश हुकूमत से आजादी 1776 में मिली थी. संविधान 1789 में लागू हुआ, लेकिन महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला. काफी संघर्ष के बाद 1919 में कांग्रेस ने महिलाओं को मतदान का अधिकार देने से संबंधित संविधान संशोधन किया और इस 19वें संविधान संशोधन की वजह से 1920 से महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला.

अमेरिका की दो प्रमुख पार्टियां हैं जिनका वर्चस्व सत्ता पर है डेमोक्रेट और रिपब्लिकन. रिपब्लिकन एक रूढ़िवादी सोच की पार्टी है, जबकि डेमोक्रेट प्रगतिशील सोच की पार्टी है, बावजूद इसके पार्टी ने 2016 में पहली बार किसी महिला को अपना उम्मीदवार बनाया. वहीं रिपब्लिकन ने आज तक किसी महिला को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाया है. उपराष्ट्रपति के लिए भी किसी महिला को 2020 से पहले मौका नहीं मिला था. कमला हैरिस पहली महिला हैं, जो उपराष्ट्रपति बनी हैं. उनसे पहले 2008 में रिपब्लिकन पार्टी ने सारा पॉलिन और 1984 में डेमोक्रेटिक पार्टी ने गेराल्डिन फेरारो को नामित किया था, लेकिन वे चुनाव जीत नहीं पाईं.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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