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Home Prabhat Khabar Special झारखंड की प्रख्यात कवयित्री जसिंता केरकेट्टा को अवध का प्रतिष्ठित ‘माटी रतन’ सम्मान

झारखंड की प्रख्यात कवयित्री जसिंता केरकेट्टा को अवध का प्रतिष्ठित ‘माटी रतन’ सम्मान

झारखंड की प्रख्यात कवयित्री जसिंता केरकेट्टा को अवध का प्रतिष्ठित ‘माटी रतन’ सम्मान
जसिंता केरकेट्टा

Jacinta Kerketta : झारखंड की आदिवासी संवेदनाओं व सरोकारों की प्रख्यात कवयित्री, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा को अवध का प्रतिष्ठित ‘माटी रतन’ सम्मान 2025 दिए जाने की घोषणा की गई है.

उन्हें यह सम्मान आगामी 19 दिसंबर को फैजाबाद में ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन ऐक्शन के शहीद क्रांतिकारी अशफाकउल्लाह खां के शहादत दिवस पर आयोजित समारोह में प्रदान किया जायेगा. उनके साथ हिंदी के अवध के ही निवासी लब्धप्रतिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति और मुंबईवासी उर्दू के कवि, लेखक व पत्रकार फरहान हनीफ वारसी को भी इस सम्मान से सम्मानित किया जायेगा.

शनिवार को सम्मान की चयन समिति की बैठक में किये गये इस आशय के फैसले के बाद सम्मान के प्रायोजक शहीद अशफाकउल्लाह खां मेमोरियल शहीद शोध संस्थान की ओर से उसके प्रबंध निदेशक सूर्यकांत पांडेय ने इसकी जानकारी दी. गौरतलब है कि पिछले पच्चीस वर्षों से हिंदी-उर्दू और उनके समाजों की सेवा करने वाली नामचीन हस्तियों को दिये जाते रहे इस सम्मान का यह रजत जयंती वर्ष है, जबकि अशफाकउल्लाह खां, जिनकी याद में इसे दिया जाता है, वे जिस काकोरी ऐक्शन में भाग लेकर शहीद हुए थे, उसका शताब्दी वर्ष.

पांडेय के अनुसार इस सबके मद्देनजर इस साल इस सम्मान का खास महत्व है. उनका दावा है कि देश में शहीदों के नाम पर दिया जा रहा यह इकलौता लोकसम्मान है और अवध में इसकी नोबेल पुरस्कार जैसी प्रतिष्ठा है. इससे विभूषित कोई एक दर्जन शख्सियतों को बाद में पद्म पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं.

अब तक यह सम्मान अदम गोंडवी, रफीक सादानी, दूधनाथ सिंह, विजय बहादुर सिंह, अष्टभुजा शुक्ल, अनवर जलालपुरी, मुनव्वर राना, मलिकजादा मंजूर, नरेश सक्सेना, डाॅ विद्या बिन्दु सिंह, जयप्रकाश ‘धूमकेतु’, सुभाष राय और वसीम बरेलवी जैसी साहित्यिक प्रतिभाओं को दिया जा चुका है.

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के खुदपोस नामक गांव में एक गरीब आदिवासी परिवार में पैदा हुई जसिंता केरकेट्टा किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. वे आदिवासी संवेदनाओं व सरोकारों की झारखंड की उन कवयित्रियों में से एक हैं, जिन्होंने कठिन जीवन संघर्ष के बीच अपनी राह बनाई और कवि कर्म व पत्रकारिता के साथ सामाजिक कार्य में भी भागीदारी की.

उनका बचपन गरीबी और अभावों के बीच बीता और छुटपन में उन्हें हाटों-बाज़ारों में इमली बेचकर अपने परिवार की गुजर-बसर के लिए पैसे जुटाने पड़े. फिर भी उन्होंने शिक्षा पाने की अपनी लगन को कतई कमजोर नहीं पड़ने दिया. आगे चलकर धनाभाव उनकी कॉलेज की शिक्षा के आड़े आया तो उनकी मां ने ज़मीन गिरवी रखकर उसकी व्यवस्था की. फिर भी काम नहीं चला तो जसिंता ने कई छोटे-मोटे काम करके परिस्थिति का सामना किया.

कठिन संघर्ष के इन्हीं दिनों में उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कीं तो आलोचकों ने कहा कि उनकी कविताओं में उनका व्यक्तिगत दुःख समष्टिगत दुःख में अभिव्यक्त होता हुआ अपने समाज के विमर्श को लेकर आगे बढ़ता है. इतना ही नहीं, गहरी, अचेतन व अनकही भावनाओं को शब्दों और छवियों में पिरोने की उनकी कला अनूठी है और इस कला से वे इन भावनाओं को वास्तविकता का रूप दे देती हैं.

उनका पहला कविता संग्रह 2016 में आदिवाणी प्रकाशन, कोलकाता से हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

जानकार बताते हैं कि वे झारखंड की पहली ऐसी आदिवासी कवि प्रतिभा हैं, जिनके कविता संग्रहों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक साथ तीन-तीन भाषाओं में प्रकाशन हुआ है. इसके अतिरिक्त उनकी कविताओं का कई भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, जिनमें पंजाबी, उर्दू, गुजराती, मराठी, असमिया, कन्नड़, तमिल व संथाली आदि शामिल हैं.

वे काफ़ोस्करी, मिलान, तुरिनो और ज्यूरिख आदि विश्वविद्यालयों में कविता-पाठ तो कई देशों में अपनी कविताओं पर संवाद भी कर चुकी हैं. इटली के तुरीनो शहर में आयोजित 31 वें इंटरनेशनल बुक फ़ेयर में वे विशेष आमंत्रित अतिथि थीं और इस अवसर पर उनके कविता-संग्रह ‘अंगोर’ के इतालवी अनुवाद ‘ब्राचे’ का लोकार्पण भी किया गया था. जसिंता के खाते में ‘माटी रतन’ के अलावा भी कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान हैं.

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