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Home Prabhat Khabar Special क्या ईरान को नेस्तनाबूद करने के लिए सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका और इजरायल को उकसाया?

क्या ईरान को नेस्तनाबूद करने के लिए सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका और इजरायल को उकसाया?

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क्या ईरान को नेस्तनाबूद करने के लिए सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका और इजरायल को उकसाया?
ईरान पर हमले में हुई खामेनेई की मौत का शोक मनाते लोग

Iran War : मिडिल ईस्ट में तनाव ने शनिवार 28 फरवरी को बड़ा रूप ले लिया, जब अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त अभियान चलाकर ईरान पर हमला कर दिया. अमेरिका और इजरायल ने ईरान की राजधानी तेहरान सहित कई अन्य अहम ठिकानों पर मिसाइल से हमले कर पूरे क्षेत्र को थर्रा दिया. इस हमले को कई नाम दिये गये हैं जिनमें से ऑपरेशन रोरिंग लाॅयन सबसे ज्यादा चर्चित है. इस हमले के जवाब में ईरान ने भी इजरायल की ओर मिसाइलें दागी हैं, लेकिन अमेरिका अपने मकसद में कामयाब हो गया क्योंकि उसने अपने पुराने विरोधी और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई का परिवार सहित अंत कर दिया. यहां सवाल यह है कि क्या महज अमेरिका की दुश्मनी अयातुल्लाह खामेनेई के अंत का कारण है या कोई और लोग भी थे, जिन्होंंने अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर इस साजिश को अंजाम दिया.

सऊदी अरब और ईरान के बीच दुश्मनी ने खामेनेई का अंत करवाया?

सऊदी अरब और ईरान दो ऐसे देश हैं, जिनकी जमीनी सीमाएं आपस में नहीं मिलती हैं, लेकिन दोनों देश आमने–सामने हैं और दोनों के बीच फारस की खाड़ी (Persian Gulf) और कुछ हिस्सों में ओमान की खाड़ी (Gulf of Oman) है. इन दोनों देशों के बीच दुश्मनी या टकराव की सबसे बड़ी वजह धर्म है. 2023 से पहले दोनों देशों के बीच किसी भी तरह के संबंध बहाल नहीं थे. दोनों के रिश्ते बहुत ही तनावपूर्ण भी रहे हैं. सऊदी अरब में सुन्नी इस्लाम लोग रहते हैं, जबकि ईरान शिया मुसलमानों का देश है. यहां 1979 में जो इस्लामिक क्रांति हुई, उसे ईरान अन्य मुस्लिम देशों में भी फैलाना चाहता था, जिसे सऊदी अरब के शाही शासकों ने अपने लिए खतरा माना और इससे इनके बीच टकराव बढ़ा.

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ईरान युद्ध : खामेनेई की मौत का शोक

ईरान में इस क्रांति के राजशाही का अंत हो गया था. इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में क्षेत्रीय प्रभुत्व की भी जंग रही है, जिसमें दोनों देश आमने–सामने हो जाते हैं. इराक युद्ध, सीरिया युद्ध जैसे मुद्दों ने दोनों देशों के तनाव को और बढ़ाया, क्योंकि इससे दोनों के हित जुड़े थे. 2016 में दोनों देशों के रिश्ते बदतर हो गए थे क्योंकि जनवरी 2016 में सऊदी अरब ने शिया धर्मगुरु निम्र अल-निम्र को फांसी दी. जिसके बाद ईरान में सऊदी दूतावास पर हमला हुआ और संबंध तोड़ दिए गए थे. हाल के दिनों में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस ट्रंप से मिलने गए थे और ऐसी संभावना जताई जा रही है कि उन्होंने ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए अमेरिका को उकसाया या प्रेरित किया.

क्या संयुक्त अरब अमीरात ने किया है पीठ में छुरा घोंपने का काम?

संयुक्त अरब अमीरात के साथ ईरान के संबंध अच्छे तो नहीं थे, लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि दोनों दुश्मन राष्ट्र हैं. करीब से देखें तो यह स्पष्ट मालूम होता है कि दोनों देशों के बीच सामरिक प्रतियोगिता है और दोनों के संबंध काफी सीमित हैं. दोनों देशों की सीमाएं नहीं लगती हैं , लेकिन दोनों आमने–सामने हैं और बीच में फारस की खाड़ी है. फारस की खाड़ी के तीन द्वीप भी ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच विवाद की वजहों में से एक है. दरअसल फारस की खाड़ी के तीन द्वीप अब मूसा, ग्रेटर तुंब और लेसर तुंब को संयुक्त अरब अमीरात अपना हिस्सा मानता था, जिसपर ब्रिटेन का कब्जा था. 1971 में जब ब्रिटेन ने यहां से अपनी सेनाएं हटाईं तो ईरान ने उन द्वीपों पर कब्जा कर लिया.

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इस वजह से दोनों देशों के बीच तनाव है और जो आज भी बना हुआ है. ईरान का खाड़ी क्षेत्र में काफी प्रभाव है और उसकी परमाणु क्षमता इस क्षेत्र के देशों के लिए बड़ी चिंता है. इस वजह से भी संयुक्त अरब अमीरात की भूमिका ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में नजर आती है, भले ही वह प्रत्यक्ष तौर पर नहीं है. हां, यह उन देशों में शामिल हो सकता है, जिन्हें विश्वास में लेकर इजरायल और अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की. यूएई ने इजरायल के साथ अब्राहम समझौते (Abraham Accords) पर भी हस्ताक्षर किए थे, जो यह साबित करते हैं कि यूएई का रुख किस ओर है. अब्राहम समझौते के तहत अरब के देशों ने इजरायल के साथ संबंध बहाल करने की पहल की थी, इसकी वजह यह थी कि ज्यादातर अरब देश इजरायल के खिलाफ रहे हैं.

ईरान पर आक्रमण में इजरायल की क्या है भूमिका?

ईरान और इजरायल के बीच जो विवाद है, उसकी मुख्य वजह यह है कि ईरान इजरायल के अस्तित्व को नकारता है. ईरान में जब इस्लामिक क्रांति हुई तो इजरायल को अवैध देश घोषित किया गया. इसकी वजह यह थी कि ईरान ने खुद को पीड़ित मुसलमानों का रहनुमा बताया और इजरायल मुसलमानों का विरोधी था. फिलिस्तीन के साथ उसके विवाद में ईरान फिलिस्तीन के साथ खड़ा रहा. इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने अमेरिका का विरोध किया और उसके करीबी शाह पहलवी को हटाया. इजरायल और अमेरिका की दोस्ती भी ईरान को खटकती रही. ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वजह से भी इजरायल के साथ उसके संबंधों में खटास रही, क्योंकि यह क्षेत्रीय शांति पर खतरा है. ईरान द्वारा हमास और हिज्बुल्लाह जैसे आतंकवादी संगठनों को इजरायल के खिलाफ पनाह देने की वजह से भी दोनों देशों में कभी भी संबंध सामान्य नहीं हुए. पिछले साल जून के महीने में भी इजरायल ने हमास को समर्थन देने की वजह से ईरान पर मिसाइलों से हमला किया था, जिसे ईरान ने खुले युद्ध की संज्ञा दी थी.

ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाम कसना अमेरिका की चाल

अमेरिका के साथ ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई का विवाद जगजाहिर है. 28 फरवरी के हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि हम ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने नहीं देंगे क्योंकि यह क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है. ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिका विरोधी नीति की वजह से ही ट्रंप ने इजरायल के साथ ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया. इस सैन्य अभियान के लिए कई कूटनीतिक प्रयास भी किए गए, तभी ईरान पर हमला इतनी आसानी से हो सका.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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