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Iran : ईरान का निमंत्रण और भारत- संतुलन ही असली परीक्षा

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Iran : ईरान का निमंत्रण और भारत- संतुलन ही असली परीक्षा
PM Modi invited by Iran Explained

Iran : 2014 में मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री का पद छोड़ा. तबतक उनका कार्यकाल सुधारवादी छवि का पर्याय बन गया था. 1991 से 2014 तक, वे लगातार ऐसी सुधारवादी पहलों से जुड़े रहे जिनसे लोगों में उम्मीद जगी.

फिर जब बीजेपी आई तो उसे लोगों की इन उम्मीदों की अच्छी समझ थी. चुनावों से पहले, उसने अपना सबसे मजबूत चेहरा, नरेंद्र मोदी को सामने रखा. अगला कदम इस नेता को वैश्विक पहचान दिलाना था. नतीजतन, मोदी ने उस दौरान खूब यात्राएं कीं और न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से लेकर सिडनी के ओलंपिक पार्क तक कई जगहों का दौरा किया.

इस माहौल में, भारत की विदेश नीति में बुनियादी बदलाव आए. देश और विदेश, दोनों स्तरों पर काम करने के अलग तरीके की भावना आकार ले रही थी. भारत की ‘लुक वेस्ट’ नीति ‘एक्ट वेस्ट’ नीति में बदल गई.

यह बात एक दशक पुरानी है, जब हसन रूहानी ईरान के राष्ट्रपति थे. और बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे. तब तक ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंध नहीं लगाए गए थे. प्रधानमंत्री मोदी अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट पर ध्यान केंद्रित करने के लिए तेहरान पहुंचे. इस कदम पर उस समय खास आधिकारिक प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि ‘राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ बातचीत के बाद भारत ईरान के एक अहम बंदरगाह का निर्माण और संचालन करेगा.’

‘भारत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए 500 मिलियन डॉलर (344 मिलियन पाउंड) का निवेश करेगा, जो पाकिस्तान के साथ ईरान की सीमा के करीब है.‘ – पीएम मोदी

‘दिल्ली मध्य एशिया से गैस को इस बंदरगाह तक लाना और फिर उसे भारत पहुंचाना भी चाहती है.’

‘चाबहार बंदरगाह के लिए भारत से मिलने वाली सभी क्रेडिट लाइनों को देखते हुए, यह ईरान और भारत जैसे दो महान देशों के बीच सहयोग का एक बहुत बड़ा प्रतीक बन सकता है.’राष्ट्रपति हसन रूहानी 

ईरान के एक अखबार ने कहा कि ‘भारत चाबहार बंदरगाह के जरिए मध्य और दक्षिण एशिया में चीन की ताकत को चुनौती देना चाहता है.’

‘कांडला और चाबहार बंदरगाह के बीच की दूरी दिल्ली और मुंबई के बीच की दूरी से कम है, और इसलिए यह समझौता हमें पहले ईरान और फिर एक नए रेल और सड़क लिंक के जरिए अफगानिस्तान और रूस तक सामान की तेजी से आवाजाही करने में सक्षम बनाता है।’नितिन गडकरी (भारत के परिवहन मंत्री)

Pm Modi And Hassan Rouhani
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यकीनन, तब से गंगा में बहुत पानी बह गया है. ना ईरान वही ईरान है. ना भारत वही भारत है. और ना अमेरिका वही अमेरिका है. 

साल 2025 जैसे दुनियां भर के देशों के लिए शनि का साढ़ेसाती बनकर आया है. और साल बदलते ही इसका असर बढ़ता हुआ ही दिख रहा है. इस साल के शुरू में ईरान पर अमेरिकी हमले ने लोगों का नजरिया ही बदल दिया है. बम के धमाकों से ज्यादा सोच की बारूद ने काम किया है. अब हमारे लिए न तो अमेरिका वैसा रहा जैसा हम सोचते थे, और न ही ईरान. और इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री मोदी को मिला न्योता बहुत सारे सवाल करतें हैं. 

पीएम मोदी को ईरान का निमंत्रण केवल एक औपचारिक कदम नहीं. यह इस बात का संकेत है कि तेहरान अभी भी भारत को पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण और स्वतंत्र देश के रूप में देखता है. भारत की विदेश नीति के नजरिए से, यह प्रकरण रणनीतिक स्वायत्तता (स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी) की मुख्य दुविधा को फिर से सामने लाती है. और वो यह की ईरान, इज़राइल, अमेरिका और अरब खाड़ी देशों के बीच तालमेल कैसे बैठा कर रखा जाये.

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Iran : यह निमंत्रण क्यों अहम है?

इसका समय बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह निमंत्रण हालिया इज़राइल-ईरान संघर्ष और उसके बाद हुए संघर्ष-विराम के ठीक बाद आया है. ऐसे समय में जब तेहरान सक्रिय रूप से अपने राजनयिक संबंध बढ़ा रहा था. इस संदर्भ में, मोदी को आमंत्रित करने का कदम वाशिंगटन और तेल अवीव दोनों को एक संदेश देता है. ईरान एक ऐसी प्रमुख गैर-पश्चिमी शक्ति के साथ जुड़ाव बनाए रखने को महत्व देता है जिसने उसके साथ संबंध पूरी तरह से नहीं तोड़े हैं. यहां भारत के लिए भी एक संदेश है, कि उसकी पश्चिम एशिया नीति को केवल दो विकल्पों के बीच चुनाव तक ही सीमित रहने की ज़रूरत नहीं है.

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इज़राइल और अमेरिका का पहलू

भारत के इज़राइल के साथ संबंध तेज़ी से मज़बूत हुए हैं, खासकर रक्षा, इंटेलिजेंस, टेक्नोलॉजी और आतंकवाद-विरोधी सहयोग के मामले में. वहीं अमेरिका के साथ संबंध उसकी व्यापक वैश्विक रणनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं. इससे एक वास्तविक चुनौती पैदा होती है. ईरान के प्रति कोई भी ऐसा कदम जो सबकी नज़र में आए, उसे अपने-आप भारत के अमेरिका-इज़राइल खेमे के साथ जुड़ाव के नज़रिए से देखा जाता है. फिर भी, भारत तेहरान के साथ पूरी तरह से संबंध नहीं तोड़ सकता, क्योंकि इससे उस क्षेत्र में रणनीतिक लचीलापन कम हो जाएगा जहाँ संघर्ष अक्सर ऊर्जा, शिपिंग और कनेक्टिविटी को प्रभावित करते हैं. 

बड़ी बात यह है कि पश्चिम एशिया को लेकर भारत का हालिया रुख़ एकतरफा लगा है, और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण की चपेट में आ गया है. आलोचकों का तर्क है कि इज़राइल और वॉशिंगटन के साथ नज़दीकी ने भारत की स्वतंत्र जगह को सीमित कर दिया है, जिससे सामान्य कूटनीतिक संतुलन बनाना भी राजनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता है. हालांकि, मौजूदा नीति के समर्थकों का कहना है कि भारत ने ईरान का औपचारिक रूप से साथ छोड़े बिना सुरक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में ठोस फ़ायदे हासिल किए हैं. 

UAE और अरब पार्टनर

UAE, सऊदी अरब और खाड़ी के दूसरे राजशाही देश अब भारत के सबसे अहम आर्थिक और राजनीतिक पार्टनर बन गए हैं. यह खासकर ऊर्जा सुरक्षा, रेमिटेंस (बाहर से भेजा जाने वाला पैसा), व्यापार और वहां रहने वाले नब्बे लाख भारतीयों की भलाई के मामले में सच है. इन देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाने में भारत की कामयाबी ने उसे किसी एक क्षेत्रीय रिश्ते (जैसे ईरान के साथ) पर कम निर्भर रहने में मदद की है. इसके बावजूद, अरब खाड़ी के देश खुद भी भारत के ईरान-विरोधी रुख के बजाय एक मिले-जुले रुख को पसंद करते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत के अलग-अलग विरोधी गुटों के बीच एक स्वीकार्य बातचीत करने वाले देश के तौर पर बने रहने से उन्हें भी फायदा होता है.

इसलिए, इस निमंत्रण को ऐसे नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत ने खाड़ी के बजाय ईरान को चुना है. बल्कि, यह इस बात की परीक्षा है कि क्या भारत पश्चिम एशिया में अपनी “मल्टी-अलाइनमेंट” (कई गुटों के साथ तालमेल बिठाने की) रणनीति को जारी रख सकता है. जहां गुटों के प्रति वफादारी को लेकर छोटे-छोटे कदमों की भी बारीकी से जांच की जाती है. इस लिहाज से, UAE और दूसरे अरब पार्टनर इस बात की वजह हैं कि भारत को क्यों सावधान रहना चाहिए, न कि ईरान से जुड़ने से बचने की वजह.

ब्रिक्स और आपसी सहयोग वाले मंच

यहाँ कई देशों वाले मंच (मल्टीलेटरल प्लेटफ़ॉर्म) अहम भूमिका निभाते हैं. ईरान का पश्चिमी देशों से अलग बड़े समूहों में शामिल होना और भारत का ब्रिक्स (BRICS) व शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों से जुड़ा होना, आपसी तनाव के समय भी लगातार संपर्क बनाए रखने के लिए एक व्यवस्थित ज़रिया देता है. ये मंच इसलिए भी उपयोगी हैं क्योंकि इनसे भारत को एक डिप्लोमैटिक चैनल खुला रखने में मदद मिलती है, और हर बातचीत को किसी खास भू-राजनीतिक झुकाव के तौर पर नहीं देखा जाता.

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भारत के लिए, ऐसे मंच एक साधारण सिद्धांत को मज़बूत करते हैं: बड़ी ताकतों की कूटनीति अब सिर्फ़ दो देशों के बीच की दोस्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई संस्थाओं की सदस्यता को एक साथ संभालना भी शामिल है. ब्रिक्स जैसा सहयोग भारत को यह दिखाने में भी मदद करता है कि वह अमेरिका, इज़राइल या खाड़ी देशों के साथ अपने रिश्तों को दांव पर लगाए बिना ईरान के साथ जुड़ सकता है.

विकल्प खुले रखने के लिए समझदारी भरी कूटनीति

भारत और ईरान के बीच जटिल लेकिन दोनों के लिए फायदेमंद रिश्ते आज भी अहम हैं. फिर चाहे बात ऊर्जा की हो, कनेक्टिविटी की या मध्य एशिया तक पहुँच की. इसके तीन ठोस कारण हैं. चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत की लंबी अवधि की रणनीति के लिए बहुत ज़रूरी हैं. खासकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान से होकर जाने वाले ज़मीनी रास्ते अभी भी बंद हैं. भले ही प्रतिबंधों और इलाके में अस्थिरता की वजह से काम की रफ़्तार धीमी हुई हो, लेकिन ईरान भारत को समुद्री खाड़ी से आगे महाद्वीपीय भू-राजनीति से जोड़ने वाली एक अहम कड़ी है.

पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी का कहना बिल्कुल सही है कि यह दोनों देशों के बीच रिश्ते मज़बूत करने का समय है. ईरान और भारत, दोनों ही प्राचीन सभ्यताओं का हिस्सा रहे हैं. भारत के ईरान के साथ संबंध ज़्यादातर अच्छे ही रहे हैं. 2019 के बाद से अमेरिकी दबाव और लगाए गए प्रतिबंधों की वजह से ही ईरान के साथ रिश्तों में रुकावट आई थी. भू-राजनीतिक नज़रिए से देखें तो अमेरिका-ईरान तनाव के बाद ईरान एक क्षेत्रीय ताकत बनकर उभरा है. खाड़ी देश इस बात को अच्छी तरह समझते हैं और अब हर कोई ईरान के साथ जुड़ रहा है. दिल्ली के लिए तेहरान के साथ रिश्ते सुधारने का यह एक अच्छा मौका है. तेहरान पश्चिम एशिया का एक अहम देश है, जहाँ से भारत को अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का 47% हिस्सा और 55.8 अरब डॉलर की रेमिटेंस मिलती है.

Jassy Sodhi
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हालांकि, दिल्ली यूनिवर्सिटी की अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. चांदनी सेनगुप्ता के अनुसार ऐतिहासिक और भावनात्मक बातों (जैसे ‘हज़ारों साल पुरानी सभ्यता’) को मौजूदा राजनीतिक हकीकत के साथ नहीं मिलाना चाहिए. भले ही प्राचीन फारस के साथ सांस्कृतिक और भाषाई संबंध से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन आधुनिक इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान (1979 के बाद का) ऐसा देश नहीं है जिसके साथ सिर्फ़ साझा ऐतिहासिक भावनाओं का ज़िक्र करके रणनीतिक एकजुटता की उम्मीद की जा सके. सेनगुप्ता यह भी सही कहती हैं कि कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ईरान का रुख़ अक्सर अस्पष्ट रहा है; रणनीतिक सहयोग का मतलब हर मुद्दे पर समर्थन नहीं होता. इसी वजह से, शोक सभा जैसे उच्च-स्तरीय कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत मौजूदगी का कूटनीतिक रूप से बड़ा महत्व हो सकता है, जिससे दिल्ली की ‘मल्टी-अलाइंड बैलेंसिंग’ (कई देशों के साथ संतुलन बनाने) की नीति पर बेवजह सवाल उठ सकते हैं. 

Dr. Chandani Sengupta
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भू-राजनीतिक विश्लेषक आदि अचिंत एक काम की बात बताते हैं. ईरान का मोदी को न्योता देना यह दिखाता है कि तेहरान अभी भी भारत को एक बड़ी सभ्यता और रणनीतिक ताकत के तौर पर देखता है. वह इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि भारत का वैश्विक कूटनीतिक दबदबा, और इज़राइल, अमेरिका, खाड़ी देशों, रूस और ईरान के साथ उसके संबंध, यह कोई भ्रम नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत है. फिर भी, मोदी की व्यक्तिगत मौजूदगी एक बड़ा संदेश दे सकती है. इसलिए, बातचीत और जुड़ाव के मामले में एक संतुलित और नपा-तुला नज़रिया ही दिल्ली के लिए सही रास्ता है.

Aadi Achint
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जाने-माने भू-राजनीतिक विश्लेषक और मध्य-पूर्व मामलों के विशेषज्ञ मनीष राय के अनुसार, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ईरान के सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में आमंत्रित किया जाना भारत-ईरान के गहरे और ऐतिहासिक संबंधों का संकेत है. उनका कहना है कि भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत यह रही है कि उसने ईरान, इज़राइल और प्रमुख खाड़ी देशों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखे हैं. हालांकि, हालिया अमेरिका-इज़राइल और ईरान संघर्ष के बाद क्षेत्र में बढ़े ध्रुवीकरण के बीच इस निमंत्रण पर भारत की प्रतिक्रिया उसकी संतुलित विदेश नीति की अहम परीक्षा होगी. राय ने कहा कि ऊर्जा, व्यापार, संपर्क और सांस्कृतिक संबंधों के कारण ईरान भारत का महत्वपूर्ण साझेदार है, वहीं इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ भी भारत की रणनीतिक साझेदारी मजबूत हुई है. ऐसे में अंतिम संस्कार में किस स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व होगा, यह फैसला राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर ही लिया जाना चाहिए‘.

Manish Rai
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आखिर में, भारत का मकसद साफ़ होना चाहिए. ईरान के साथ सहयोग बनाए रखना जहां इससे राष्ट्रीय हित मज़बूत होते हों, जैसे कि ऊर्जा, कनेक्टिविटी और मध्य एशिया तक पहुँच. और साथ ही अमेरिका, इज़राइल और खाड़ी देशों जैसे अहम सहयोगियों के साथ बने नाज़ुक संतुलन को कोई नुकसान न पहुंचे. राजकीय शोक समारोहों में प्रतिनिधित्व के स्तर (जैसे सीनियर से मिड-लेवल डिप्लोमैट या स्पेशल एनवॉय) को समझदारी से चुनना एक ऐसी रणनीति है जो सम्मान भी दिखाती है और साथ ही दूसरे अहम हितों को नज़रअंदाज़ किए बिना या कोई गलत कूटनीतिक संकेत दिए बिना काम करती है.

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अचल प्रियदर्शी (Achal Priyadarshy) अंतरराष्ट्रीय संबंधों, इंडिक एवं इंडीजीनस अध्ययन के जानकार, शिक्षाविद् और 31 पुस्तकों के लेखक हैं। उन्होंने अपने अकादमिक और बौद्धिक जीवन में भारत की जनजातीय परंपराओं, ज्ञान प्रणालियों और वैश्विक राजनीति को केंद्र में रखा है। इन्होंने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI), रांची तथा झारखंड सरकार के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग (DoFECC) के साथ कार्य किया है। उन्होंने सैकड़ों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शन किया है, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व समसामयिक विषयों पर उनके विश्लेषणात्मक लेख नियमित रूप से UPSC-केंद्रित पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। साहित्य और जनजातीय इतिहास में उनके योगदान को मान्यता देते हुए उन्हें वर्ष 2025 में आयोजित जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल के उद्घाटन संस्करण में उनकी पुस्तक “Tribal Bravehearts” के लिए "शब्द-शिल्पी सम्मान" से सम्मानित किया गया। शैक्षणिक रूप से, उन्होंने हार्वर्ड डिविनिटी स्कूल से Religion, Peace and Conflict विषय में अध्ययन किया है।
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