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Home Prabhat Khabar Special भारत-चीन के बीच 1947 से पहले नहीं था कोई सीमा विवाद, तिब्बत पर चीन के कब्जे से शुरू हुआ संघर्ष

भारत-चीन के बीच 1947 से पहले नहीं था कोई सीमा विवाद, तिब्बत पर चीन के कब्जे से शुरू हुआ संघर्ष

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भारत-चीन के बीच 1947 से पहले नहीं था कोई सीमा विवाद, तिब्बत पर चीन के कब्जे से शुरू हुआ संघर्ष
भारत चीन संबंध

India China Border Dispute : भारत और चीन दो ऐसे देश हैं, जिनके संबंध प्राचीन काल में तो बड़े अच्छे रहे, लेकिन 19वीं-20वीं शताब्दी में यह संबंध बिगड़ गए. भारत और चीन के बीच जो सीमा विवाद आज प्रमुखता से उजागर होता रहता है, उसका प्राचीन काल में कोई वजूद नहीं था. आप जानते हैं कि ऐसा क्यों था? अगर नहीं जानते हैं तो यह आलेख पढ़ें. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की वजह है तिब्बत.

प्राचीन काल में चीन की सीमा भारत से नहीं लगती थी

प्राचीन काल में चीन की सीमा भारत से नहीं लगती थी, तो क्योंकि तब तिब्बत एक स्वतंत्र देश था. ब्रिटिश भारत में अंग्रेजों को यह डर सताता था कि रूस और चीन तिब्बत के रास्ते भारत में प्रवेश कर सकते हैं, इसी वजह से ब्रिटिश भारत के समय एक सीमा रेखा भारत और तिब्बत के बीच खिंची गई जिसे मैकमोहन लाइन कहा जाता था. यह मैकमोहन लाइन तिब्बत और भारत के बीच एक सीमारेखा थी, जिसे 1914 में खिंचा गया था. 1949-50 में जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार आई, तो उसने तिब्बत पर हमला कर दिया और वहां कब्जा कर लिया. 1951 में तिब्बत के औपचारिक रूप से चीन का हिस्सा घोषित कर दिया गया. उसके बाद चीन की सीमा भारत से लगी, चूंकि चीन ने मैकमोहन लाइन को सीमा मानने से इनकार कर दिया और यह कहा कि यह लाइन गलत तरीके से खिंची गई है, तब भारत और चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हुआ. भारत और तिब्बत ने मैकमोहन लाइन को अपनी स्वीकृति दी थी, जबकि चीन इसे अस्वीकार करता रहा और भारतीय भूमि पर गलत नजर रखता रहा, उसी समय से भारत और चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हुआ.

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क्या है तिब्बत का इतिहास और भारत के साथ इसके संबंध

प्राचीन काल में तिब्बर एक स्वतंत्र क्षेत्र था, जहां तिब्बती सभ्यता और बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था. सोंगत्सेन गम्पो तिब्बत के सबसे प्रमुख शासकों में से एक था, जिसने यहां एक सशक्त और एकीकृत तिब्बत राज्य की स्थापना की थी. 7वीं से 9वीं शताब्दी तक तिब्बत एक शक्तिशाली साम्राज्य था, लेकिन उसके बाद यह क्षेत्र मंगोलों के अधीन आ गया. क्रूर मंगोल शासन चंगेज खान ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था. मंगोल शासकों की वजह से चीन और तिब्बत का संपर्क बढ़ा, लेकिन तिब्बत ने अपनी स्वतंत्रता बनाकर रखी. ब्रिटिश शासकों को यह शंका थी कि तिब्बत के रास्ते चीन या रूस भारत की सीमा तक आ सकते हैं, इसलिए उसने तिब्बत में अभियान चलाया. चीन ने ब्रिटेन के साथ समझौता कर तिब्बत को चीन का हिस्सा बता दिया, लेकिन उस वक्त यह शर्त रखी कि ब्रिटेन भारत के हित देखेगा. ब्रिटेन, चीन और तिब्बत के बीच 1914 में समझौता हुआ, इसमें भारत-तिब्बत सीमा (मैकमोहन रेखा) खिंची गई. भारत की आजादी के बाद तक तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र था, उसपर चीन का कब्जा नहीं था, लेकिन 1950 में चीन की सेना तिब्बत में घुसी और 1951 में तिब्बत को चीन का हिस्सा घोषित कर दिया गया. तिब्बत में विद्रोह हुआ, जिसे चीन ने कुचल दिया, उसी वक्त 1959 में तिब्बत के धार्मिक नेता दलाई लामा भागकर भारत आ गए और यहां शरण ली. भारत ने दलाई लामा को शरण दिया, इससे भारत और चीन के रिश्ते बिगड़े और उसका असर अभी भी दिखता है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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