[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Prabhat Khabar Special Delimitation : लोकसभा चुनाव 2029 में सीटों की संख्या बढ़ने से डर क्यों रहे हैं एमके स्टालिन?

Delimitation : लोकसभा चुनाव 2029 में सीटों की संख्या बढ़ने से डर क्यों रहे हैं एमके स्टालिन?

0
Delimitation : लोकसभा चुनाव 2029 में सीटों की संख्या बढ़ने से डर क्यों रहे हैं एमके स्टालिन?
अमित शाह

Delimitation : नई शिक्षा नीति के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन पर सवाल खड़े किए हैं और उन्होंने पांच मार्च को इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि परिसीमन की प्रक्रिया दक्षिण भारत के सिर पर लटकती तलवार है. हालांकि गृहमंत्री अमित शाह ने उन्हें और अन्य दक्षिणी राज्यों को आश्वस्त किया है कि किसी भी राज्य से एक भी सीट नहीं छीनी जाएगी और अगर परिसीमन के बाद सीटों में बढ़ोतरी होगी, तो दक्षिण के राज्यों को भी उसमें से हिस्सा मिलेगा. लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि आखिर एम के स्टालिन बेचैन क्यों है? केंद्र सरकार की नीतियों से आखिर उनका क्या अहित होने वाला है, जिससे वे परेशान हैं?

क्या है परिसीमन जिसकी हो रही है चर्चा?

परिसीमन का अर्थ है- लोकसभा और विधानसभाओं के लिए प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या और  निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया.परिसीमन का काम एक उच्चाधिकार निकाय यानी आयोग करता है. भारत में अबतक चार बार परिसीमन आयोग का गठन किया गया है. इलेक्शन कमीशन के अनुसार भारत में पहली बार 1952, फिर 1963, फिर 1973 और 2002 में परिसीमन का कार्य हुआ है. परिसीमन आयोग का गठन हर जनगणना के बाद किया जाता है. परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है. यह देश का कानून है, जिसे राष्ट्रपति के आदेश से जारी किया जाता है. इस आदेश की प्रतियां  लोक सभा और राज्य विधानसभा के सदन के सामने रखी जाती है, लेकिन इन सभाओं को इसमें किसी भी तरह का संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं होता है. 

एमके स्टालिन को किस बात का लग रहा है डर

Mk Stalin
एमके-स्टालिन

नरेंद्र मोदी सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में अभी से है और संभावना है कि 2026 में जनगणना का कार्य पूरा हो जाए और परिसीमन आयोग का गठन कर परिसीमन का कार्य भी पूरा करा लिया जाए. चूंकि परिसीमन जनसंख्या में बढ़ोतरी के हिसाब से किया जाता है, उस लिहाज से तमिलनाडु सहित अन्य कई दक्षिणी राज्यों में सीटें घट सकती हैं, क्योंकि जनसंख्या वृद्धि का दर कम है. हालांकि अभी इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि परिसीमन के बाद लोकसभा में कितनी सीटें बढ़ेंगी. तमिलनाडु में अभी 39 लोकसभा क्षेत्र हैं, स्टालिन यह दावा कर रहे हैं कि तमिलनाडु से आठ सीटें छीन सकती है, जिसका असर लोकसभा में उनके राज्य के प्रतिनिधित्व पर बढ़ेगा. बेशक जनसंख्या में वृद्धि के लिहाज से दक्षिणी राज्य उत्तर भारत के राज्यों से पीछे हैं जिसका परिणाम परिसीमन आयोग की रिपोर्ट में दिख सकता है. 2026 में तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और बंगाल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हैं, यही वजह है कि स्टालिन खौफजदा हैं. गृहमंत्री अमित शाह ने यह स्पष्ट भी किया है कि दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व किसी भी कीमत पर कम नहीं होगा.

पढ़ें प्रभात खबर की प्रीमियम स्टोरी :सावधान!  कहीं आपका बच्चा घंटों मोबाइल से चिपक कर मनोरोगी तो नहीं बन रहा

औरंगजेब ने आंखें निकलवा दीं, पर छावा संभाजी ने नहीं कुबूल किया इस्लाम, क्या है शिवाजी के बेटे की पूरी कहानी?

विभिन्न विषयों पर एक्सप्लेनर पढ़ने के लिए क्लिक करें

1973 के बाद नहीं हुआ है लोकसभा की सीटों में बदलाव

1976 में इंदिरा गांधी ने परिसीमन पर रोक लगा दी थी, क्योंकि उन्हें डर था कि अगर उत्तर भारत की सीटें बढ़ीं, तो उनकी सरकार को खतरा हो जाएगा. उसके बाद से अबतक लोकसभा में 543 सीटें ही हैं, दो सांसद मनोनीत किए जाते हैं. 2002 के परिसीमन में सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया था, लेकिन 2026 की जनगणना के बाद जो परिसीमन होगा उसमें लोकसभा की सीटें बढ़ाई जाएंगी, यह बात तय है क्योंकि देश की जनसंख्या में बड़ा बदलाव आ चुका है. 

भारत में स्वतंत्रता के बाद हुई परिसीमन की प्रक्रिया

क्रमांकवर्षविवरणजनगणना का वर्षलोकसभा सीटों की संख्या
11952स्वतंत्रता के बाद पहली परिसीमन प्रक्रिया1951494
219631956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद पहली परिसीमन प्रक्रिया. केवल एकल सीट वाले निर्वाचन क्षेत्र1961522
31973लोकसभा सीटों की संख्या 522 से बढ़कर 543 हुई1971543
42002लोकसभा सीटों या विभिन्न राज्यों के बीच उनके आवंटन में कोई परिवर्तन नहीं2001543
520262002 में संविधान में 84वें संशोधन के बाद, 2026 के बाद आयोजित पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाना है.2026 (अपेक्षित)परिवर्तन संभावित

परिसीमन का फायदा अघोषित रूप से सरकारों को होता है: रशीद किदवई

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई प्रभात खबर के साथ बातचीत में बताते हैं कि भारत विविधताओं का देश है, यहां कई जाति और धर्म के लोग एक साथ रहते हैं. हमारे देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन का आधार जनसंख्या है. अगर इस बार भी जनसंख्या को ही सिर्फ आधार बनाकर परिसीमन होगा तो उन क्षेत्रों को बहुत नुकसान हो सकता है, जिन्होंने काफी प्रयास करके देशहित में जनसंख्या को नियंत्रित किया है. एमके स्टालिन जो चिंता जता रहे हैं, उसमें वजन है, क्योंकि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों का प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय राजनीति में इस परिसीमन के बाद घट सकता है, क्योंकि उन्होंने पापुलेशन कंट्रोल किया है. अभी देश में 10 लाख की आबादी वाला क्षेत्र एक लोकसभा बनता है, इस परिसीमन में संभव है कि 15 लाख की आबादी पर एक लोकसभा क्षेत्र बना दिया जाए. लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि जनसंख्या वृद्धि की जो दर उत्तर भारत में है, वो दक्षिण भारत में नहीं है, इस लिहाज से उनका बड़ा नुकसान संभव है. मेरी निजी राय यह है कि सरकार को परिसीमन के लिए सिर्फ जनसंख्या को आधार नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उन्हें इस तरह से भी विचार करना चाहिए कि हर राज्य में सांसदों की संख्या कितनी प्रतिशत बढ़ाई जाए, इससे दक्षिण के राज्यों को नुकसान कम होगा. यह भी एक सच्चाई है कि परिसीमन में कभी सीटें बढ़ती हैं और कभी घटती हैं. यह भी एक सच्चाई है कि परिसीमन से अघोषित रूप से सरकारों को फायदा होता है. इसलिए एके स्टालिन परेशान हैं, क्योंकि परिसीमन का असर उनकी राजनीति पर दिखेगा.

2026 के बाद दक्षिण भारत का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति में कम हो सकता है: अविनाश मिश्रा

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्काॅलर अविनाश मिश्रा कहते हैं कि दक्षिण भारत के लोगों ने काफी प्रयास करके अपनी जनसंख्या को नियंत्रित किया है और उनकी प्रति व्यक्ति आय भी अधिक है. लेकिन परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, इस लिहाज से उत्तर भारत में निश्चित तौर पर सीटें बढ़ेंगी जबकि दक्षिण में कम हो सकती हैं. अगर दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटें घटीं, तो उनका राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव कम होगा, जबकि उनका योगदान देश के विकास में बेहतर है. साथ ही दक्षिण भारतीय क्षेत्रीय पार्टियों का कद भी इससे कम होगा, यही वजह है कि वे राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को लेकर चिंतित हैं. आंतरिक परिसीमन से क्षेत्र भी बदलता है और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए वे इस बात को लेकर भी चिंतित हैं.

पढ़ें प्रभात खबर की प्रीमियम स्टोरी :भारत को पीछे छोड़ने के लिए छाती पीट रहे हैं शहबाज शरीफ, लेकिन सच्चाई कर रही कुछ और ही बयां

क्या है परिसीमन?

परिसीमन का अर्थ है- लोकसभा और विधानसभाओं के लिए प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या और  निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया.

परिसीमन का आधार अभी देश में क्या है?

देश में अभी परिसीमन का आधार जनसंख्या है.

Previous article मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्राइमरी स्कूलों को दी बड़ी सौगात, शिक्षकों के बीच 28,945 टैब का वितरण
Next article ‘तब समझेंगे काम किया…’, दलित समागम रैली में केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने सीएम नीतीश से कर दी ये बड़ी मांग
Avatar Of Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel