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Caste census and VP Singh: जाति जनगणना की बहस और वीपी सिंह की विरासत

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Caste census and VP Singh: जाति जनगणना की बहस और वीपी सिंह की विरासत
जाति जनगणना की बहस और वी. पी. सिंह की विरासत

Caste census and VP Singh: भारत की राजनीति में जाति हमेशा से एक प्रभावशाली और निर्णायक कारक रही है. यह सच है संविधान में ‘जातिहीन समाज’ की परिकल्पना की थी. लेकिन व्यवहार में यह सामाजिक श्रेणियां चुनावी रणनीति, आरक्षण नीति, प्रशासनिक संरचना और संसाधनों के वितरण तक में प्रभावी हैं. ऐसे में, जाति जनगणना की मांग को लेकर आज जो बहस उभर रही है, वह कोई नई बात नहीं है — यह उस ऐतिहासिक राजनीतिक आंदोलन की अगली कड़ी है जिसकी पृष्ठभूमि में पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह का नाम बेहद प्रासंगिक है.

उस दौर में भारतीय राजनीति में प्रदेश स्तर पर राजनीति प्रभावी ढंग से क्षेत्रीयकरण हो रहा था. कट्टरपंथी नवराष्ट्रवादी अपनी बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक राजनीति भी अपनी पैठ बना रही थी और लंबे समय से अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे पिछड़े वर्गों और दलित जातियां राजनीति में अपना सिक्का जमा चुकी थी। इन सबों के साथ-साथ बाजार आधारित संस्कृति भी अपनी जड़े जमा रही थी. वी. पी. सिंह भारतीय राष्ट्र्रीय राजनीति में व्यवस्था के अंदर मौजूद इन बेचैनियों और कुंठाओं का जवाब बनकर उभरे.

वीपी सिंह : जाति जनगणना और आज का परिदृश्य

2021 की जनगणना स्थगित होने के बावजूद जाति जनगणना की मांग एक बार फिर भारतीय राजनीति का मुख्य विषय बन चुकी है. बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्य अपनी-अपनी स्तर पर जाति आधारित सर्वेक्षण कर चुके हैं. कांग्रेस, आरजेडी, जेडीयू जैसी पार्टियों ने जाति जनगणना के पक्ष में खुलकर समर्थन किया है. वहीं बीजेपी की स्थिति थोड़ी अस्पष्ट रही है — कभी इसे जातिवाद बढ़ाने वाला कदम बताया गया तो कभी सामाजिक न्याय की ज़रूरत के रूप में स्वीकारा गया.

जातिगत आंकड़े न होने की स्थिति में नीतिगत योजनाओं के निर्माण, संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और सामाजिक न्याय के मूल्यांकन में गंभीर बाधाएं आती हैं. यही वह तर्क है जो जाति जनगणना समर्थकों का मूल आधार बनता है.

मंडल युग और वीपी सिंह की ऐतिहासिक भूमिका

जाति पर आधारित सामाजिक आंकड़ों की बात आते ही 1989–90 का मंडल दौर याद आता है. जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, तब देश में ज़बरदस्त सामाजिक उथल-पुथल हुई. इस आयोग ने पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण की सिफारिश की थी.

वी. पी. सिंह का यह कदम उस दौर में साहसी और राजनीतिक रूप से आत्मघाती कहा गया, लेकिन यह भारत की सामाजिक संरचना को चुनौती देने वाला और ‘पॉलिटिकल ब्राह्मणवाद’ को तोड़ने वाला फैसला था. उन्होंने उन तबकों को सार्वजनिक हिस्सेदारी दी जो लंबे समय से सत्ता और संसाधनों से वंचित रहे थे.

मंडल आयोग की रिपोर्ट की बुनियाद ही 1931 की जनगणना के जातिगत आंकड़ों पर आधारित थी — क्योंकि तब से लेकर आज तक कोई जाति आधारित गणना नहीं हुई. यही कारण है कि वी. पी. सिंह की मंडल राजनीति को जातिगत आंकड़ों की कमी और राजनीति की गहरी समझ दोनों के मिले-जुले प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है.

जाति जनगणना की मांग और वीपी सिंह की प्रासंगिकता

आज जब जाति जनगणना की मांग फिर उठ रही है, तो हमें यह समझने की ज़रूरत है कि यह बहस महज़ आरक्षण की सीमा बढ़ाने या घटाने की नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक न्याय की मांग है — जिसमें नीति निर्माण तथ्यों पर आधारित हो, अनुमान पर नहीं.

वी. पी. सिंह ने अपने कार्यकाल में जो सामाजिक जागृति पैदा की थी, वह आज भी OBC राजनीति की बुनियाद है. उनकी नीतियों ने लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, नीतीश कुमार जैसे नेताओं की राजनीति को पंख दिए. आज के समय में, जब विपक्षी दल जाति जनगणना को 2024 और 2025 के चुनावों में निर्णायक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तब वी. पी. सिंह की विरासत एक वैचारिक प्रेरणा बनकर सामने आती है — कि कैसे सत्ता को सामाजिक न्याय की दिशा में मोड़ा जा सकता है.

वी. पी. सिंह को अक्सर ‘जातिवादी राजनीति’ का जनक कहा गया, लेकिन सच यह है कि वे सामाजिक समानता के पैरोकार थे. उनका तर्क यह था कि जब तक समाज में जाति है, तब तक जाति पर बात करना, उसके आधार पर योजनाएं बनाना जरूरी है. उन्होंने कहा था — “अगर आरक्षण न हो, तो भी जाति काम कर रही है — लेकिन चुपचाप, दरवाज़े बंद करके. जब आरक्षण होता है, तब ही जाति दिखती है और विरोध शुरू होता है.” उनका यह दृष्टिकोण जाति को मिटाने की दिशा में एक व्यावहारिक सोच थी — कि पहले प्रतिनिधित्व दो, फिर बराबरी लाओ, और फिर जाति अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगी.

जातिगत आंकड़ों के बिना नीति नहीं

जाति जनगणना का विरोध करने वालों का तर्क है कि इससे समाज में विभाजन बढ़ेगा, लेकिन उनका यह तर्क उस ऐतिहासिक सच्चाई को अनदेखा करता है कि भारत में जाति पहले से मौजूद है — और वह गुप्त तरीकों से सत्ता में काम करती है.

आज जब नई योजनाएं लाई जाती हैं — चाहे वह पीएम गरीब कल्याण योजना हो, स्किल इंडिया या स्वरोजगार की योजना — तब सरकार के पास यह स्पष्ट आंकड़ा नहीं होता कि किन जातियों को कितना लाभ मिल रहा हैं ऐसे में नीतियां अंदाज़ों पर आधारित होती हैं. वी. पी. सिंह ने मंडल आयोग लागू कर राजनीति की एक नई भाषा गढ़ी थी. उन्होंने सवर्ण असंतोष के बावजूद अपने निर्णय को वापस नहीं लिया, जो आज के नेताओं के लिए एक मिसाल है — कि जनहित और राजनीतिक मूल्य कभी-कभी चुनावी गणित से ऊपर होते हैं.

आज जब जाति जनगणना पर सरकारें असमंजस में हैं और राजनीतिक दल इसे लेकर दोहरा रवैया अपना रहे हैं, तब वी. पी. सिंह की वह ‘अविचल इच्छाशक्ति’ एक आदर्श बन जाती है. वी. पी. सिंह के निधन को दो दशक हो चुके हैं, लेकिन उनकी नीतियों का असर आज भी भारतीय राजनीति में जीवित है. उन्होंने जिस ‘जाति को स्वीकार कर उसे तोड़ने’ की रणनीति अपनाई थी, वह आज की जाति जनगणना की मांग में भी झलकती है.

जातिगत आंकड़े केवल आंकड़े नहीं होंगे — सामाजिक न्याय के नए यथार्थ का निर्माण करेंगे और उस यथार्थ की नींव रखने वाले वी. पी. सिंह को आज, उनके जन्मदिन पर याद करना, एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं बल्कि एक वैचारिक आवश्यकता है. भारत की राजनीति को यदि समावेशी बनाना है, तो वी. पी. सिंह की उस विरासत की ओर लौटना ही होगा, जहां ‘राजनीति का उद्देश्य सत्ता नहीं, सामाजिक परिवर्तन होता है’.

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