[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion तसलीमा के निर्वासन के तीन दशक

तसलीमा के निर्वासन के तीन दशक

तसलीमा के निर्वासन के तीन दशक

Writer Taslima Nasreen: बांग्लादेश से निर्वासन के पहले वे वहां अधिकारों से वंचित महिलाओं के पक्ष में लगातार कलम चलाती रहीं. इस पर कट्टरपंथियों ने कहा कि तसलीमा बांग्लादेश की महिलाओं को भ्रष्ट कर रही हैं. साल 1992 में ढाका पुस्तक मेले में तसलीमा की किताबें जलायी गयीं. उन पर पथराव हुआ. पुस्तक मेले की आयोजक बांग्ला अकादमी ने उन्हें चेताया कि वे ढाका मेडिकल कॉलेज अस्पताल में चिकित्सक की सेवा या लेखन में किसी एक का चयन कर लें.

तसलीमा ने लेखन का चुनाव किया. उनकी पुस्तक ‘लज्जा’ ने उनके विरोध में बांग्लादेश के कट्टरपंथियों के अभियान को और तेज कर दिया. उनके सिर पर पहले 50 हजार और फिर एक लाख टका का इनाम घोषित किया गया. कट्टरपंथियों के दबाव में सरकार ने उन पर मुकदमा दर्ज किया और उनकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किया. अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दबाव बनाया, तब जाकर 1994 में तसलीमा को सुरक्षित स्वीडन जाने दिया. तभी से तसलीमा अपने देश से निर्वासित हैं.निर्वासन के आरंभिक वर्षों में तसलीमा का अधिकतर समय स्वीडन और पेरिस में बीता. उनके कोलकाता आने का सुयोग बीच-बीच में बनता रहा. साल 2004 से तो प्रायः भारत में ही रह रही हैं. यहां रहते हुए वे अपनी जड़ों से जुड़े रहने का अनुभव करती हैं. पश्चिम बंगाल एक अर्थ में बांग्लादेश का मौसेरा भाई है. अपने बांग्ला भाषी समाज में आकर उन्हें एक तरह से घर में रहने जैसा लगता है. लेकिन यह घर भी उनके लिए बेगाना हो गया. कोलकाता से वे नौ अगस्त, 2007 को हैदराबाद प्रेस क्लब में आयोजित अपने उपन्यास ‘शोध’ के तेलुगू अनुवाद के लोकार्पण समारोह में गयीं, तो उन पर कट्टरपंथियों ने जानलेवा हमला किया. कुछ माह बाद कोलकाता में कट्टरपंथियों ने 21 नवंबर, 2007 को तसलीमा को भारत से निकालने की मांग करते हुए हिंसक प्रदर्शन किया, तो पश्चिम बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेकते हुए तसलीमा को अपने राज्य से बाहर किया. उसके पहले उसी सरकार ने तसलीमा की आत्मकथा के तीसरे खंड ‘द्विखंडित’ पर रोक लगाकर लेखिका से दूरी बरत ली थी. तसलीमा कोलकाता से जयपुर और फिर दिल्ली ले जायी गयीं. वहां उन्हें महीनों नजरबंद रखा गया. तसलीमा के लिए तभी से कोलकाता छूटा हुआ है.


फिर भी तसलीमा पितृसत्ता और धर्मांध ताकतों से संघर्षरत हैं. उनका संघर्ष एक अकेली स्त्री का संघर्ष नहीं, बल्कि समूची स्त्री जाति का संघर्ष है. अपने जीवन को भी दांव पर लगाकर तसलीमा यह संघर्ष करती जा रही हैं. उनकी रचनाओं में सर्वत्र स्त्री-पुरुष विषमता और कट्टरता के प्रति प्रतिरोध है. कदाचित इसीलिए वे प्रतिरोध की नायिका हैं. अनवरत प्रतिरोध की ताकत ने ही उन्हें बेबाकी दी है. उनकी कलम जब स्त्री के शोषण, दोहन, दमन व उत्पीड़न और यहां तक कि पुरुष जाति की हठधर्मी कामुकता के प्रति आक्रोश जताती है, धर्मांधता फैलानेवाली शक्तियों के खिलाफ युद्ध का निनाद करती है और समता, मानवतावाद और मानवाधिकार के पक्ष में आवाज उठाती है, तो पितृसत्ता और कट्टरपंथियों का गुस्सा उबल पड़‌ता है, जो कभी हमले के रूप में, कभी पुस्तकों पर प्रतिबंध के रूप में, कभी फतवों के रूप में प्रस्फुटित होता है. पर तसलीमा ने दृढ़तापूर्वक जता दिया है कि वे मौत के फतवों और किताबों पर प्रतिबंध का दंड सह सकती हैं, किंतु साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में किसी धर्म, संप्रदाय या देश का हस्तक्षेप उन्हें कतई कबूल नहीं है.


स्वतंत्र विचारों का जवाब प्रतिबंध, फतवा या मृत्युदंड नहीं है. विचारों से असहमति है, तो विचारों को विचारों से काटा जाए. तसलीमा के शब्दों के जवाब शब्दों में दिये जाएं. हमले या फतवे से विचार नहीं खत्म किये जा सकते. लेखक या कलाकार किसी देश, धर्म या काल की सीमा में नहीं बंधते. उनका सृजन समूची दुनिया के लिए होता है. तसलीमा सिर्फ बांग्लादेश या बांग्ला की लेखिका नहीं हैं. उनकी प्रसिद्धि पूरी दुनिया में है. पर यह भी सही है कि सभी के एक-दो आत्मीय होते हैं, घर-गृहस्थी होती है, घर-वापसी भी होती है. तसलीमा के जीवन में यह सब नहीं है. निर्वासित जीवन में निःसंगता उनके लिए एक कठोर, भयावह, भोगा हुआ यथार्थ है और ध्यान देने योग्य यह है कि निर्वासन के बावजूद तसलीमा अपने देश के सुखी रहने की कामना करती हैं. उनकी आत्मकथा के पांचवें खंड का शीर्षक है ‘आमी भालो नेई, तुमी भालो थेको प्रिय देश’. इसी शीर्षक से उनकी एक कविता भी है, जिसका हिंदी रूपांतर है- ‘देश तुम कैसे हो? मेरा दिल तड़पता है तुम्हारे लिए, तुम्हारा नहीं तड़पता? मेरा जीवन छीज रहा है तुम्हें याद करते हुए, और तुम्हारा? खोई रहती हूं सपनों में, तुम? अपने घाव, दुख, आंसू छिपाये रखती हूं गोपन में. गोपन में छिपाये रखती हूं उड़ते बाल, फूल, गहरी सांस. मैं कुशल नहीं हूं, तुम सकुशल रहना प्रिय देश.’ अपने देश से निर्वासित होकर कोई कुशलपूर्वक कैसे रह सकता है?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel