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Home Opinion प्लास्टिक से बर्बाद होती दुनिया

प्लास्टिक से बर्बाद होती दुनिया

प्लास्टिक से बर्बाद होती दुनिया

प्लास्टिक अब भगवान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है. पहले कहावत थी कि हर पत्थर के नीचे भगवान मिलेंगे, पर अब बात बदल गयी है. आज हर पत्थर के नीचे प्लास्टिक है. भारत ही नहीं, सारी दुनिया में प्लास्टिक ने जैसे आक्रमण किया है, उसमें शायद प्रभु के लिए भी अब जगह नहीं बची. पिछली सदी का यह चमत्कार आज हमारे गले की हड्डी बन चुका है. पिछली सदी में आये प्लास्टिक ने सारी दुनिया में या तो पहाड़ बना लिये हैं या नदियों को भर दिया. समुद्र को भी सबसे ज्यादा यही बर्बाद करने पर तुला है. विडंबना यह है कि इसके सबसे बड़े दोषी हम स्वयं हैं.

अगर हम भारत को ही देखें, तो यहां प्लास्टिक उद्योग को भारी सब्सिडी दी जाती है. ऐसी नीतियां आने वाले समय में शायद हमें ही हमारे अंत तक ले जाने का रास्त बना सकती हैं. भारत में 2010 में जहां हर दिन पानी की करीब 700 बोतलें बिका करती थीं, आज इसकी संख्या 12 लाख हो चुकी है, यानी हम ऐसे हालात में पहुंच गये हैं, जहां पानी जैसी चीज, जिसे प्रकृति ने हमें सेवा के रूप में दिया है, हमने उसे बाजार का उत्पाद बना दिया है.

फिर पानी की एक बोतल बिकती है, तो आप यह न समझें कि आपने केवल 20 रुपये दिये, बल्कि यदि आप सब्सिडी या टैक्स छूट का हिसाब लगाएं, तो वे भी आपकी ही जेब से जाता है, यानी यदि कहा जाए कि प्लास्टिक उद्योगों के फलने-फूलने में आपका भी योगदान है, तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता.

दुनिया में प्लास्टिक उत्पादन में कहीं कमी नहीं आई है. चीन सबसे बड़ा उत्पादक है, जहां हर महीने करीब छह से आठ मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है. वहीं अमेरिका प्लास्टिक का सबसे बड़ा उपभोक्ता माना जाता है, जहां हर साल करीब 800 अरब डॉलर तो केवल प्लास्टिक से होने वाली बीमारियों पर खर्च होते हैं. विडंबना ये है कि प्लास्टिक पर तमाम तरह के अंकुश लगाये जा चुके हैं, पर प्लास्टिक में कमी नहीं आयी.

इसके लिए सरकारें जितनी दोषी हैं, आम लोग उससे कम दोषी नहीं हैं. आज अगर हम ही इसके उपयोग से इनकार कर दें, तो यह बाजार से क्या, कायनात से गायब हो जायेगा, पर ये हो नहीं रहा, क्योंकि ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ पर 2022 में सरकार के प्रतिबंध के बावजूद ये आज भी धड़ल्ले से हर छोटे-बड़े बाजार में मिल रहा है.

मगर ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि इसे लेकर गंभीरता नहीं आयी है. युवा पीढ़ी कम से कम इसके प्रति सचेत दिखती है. कुछ उद्योग भी हैं, जो पहल कर रहे हैं. डाबर ने स्वयं को प्लास्टिक वेस्ट न्यूट्रल कंपनी के रूप में स्थापित कर लिया है. वे अपने उत्पाद में जो भी प्लास्टिक का उपयोग करती है, उसे रिसाइकल कर फिर से उपयोग में लाती है. सरकार ने भी यही उपाय सुझाया है कि जो भी कंपनियां अपने उत्पाद प्लास्टिक में बेचती हैं, वो उन्हें जुटाने की व्यवस्था करे और उन्हें भटकने के लिए न छोड़ दे, लेकिन प्लास्टिक कचरे को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई देती.

पहले तो यह कचरा शहरों तक सीमित था, लेकिन अब गांव के पोखर, पहाड़ सब प्लास्टिक से ढके हुए दिखाई देते हैं. हम इसकी गंभीरता नहीं समझ पा रहे कि हम जो कुछ भी आज कर रहे हैं, वह आने वाले कल के हर रास्ते को बंद कर देगा. इसका उदाहरण दुनिया में आ भी चुका है. समुद्र में जाने के बाद प्लास्टिक माइक्रो प्लास्टिक में बदल जाता है, जिसे समुद्री जीव भोजन रूप में ग्रहण कर हमारी ही आहार श्रृंखला का हिस्सा बन जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ उन खेतों में, जहां हमारी फसलें उगती हैं, वहां भी प्लास्टिक उत्पादन पर विपरीत असर डाल रहा है. गौ माता जो राष्ट्र की गरिमा हैं, उसकी आंतों में भी अब प्लास्टिक नजर आता है. ऐसे में आत्ममंथन तो होना ही चाहिए.

हालात इस हद तक पहुंच चुके हैं कि हम इस बात से भी भयभीत नहीं हैं कि प्लास्टिक हमारे शरीर के अंगों को भी प्रभावित कर रहा है, तो फिर इसे एक अंत की शुरुआत ही समझ लेना चाहिए. यह आज की सबसे बड़ी चुनौती भी मानी जा सकती है कि हम प्लास्टिक से कैसे मुक्त हों. यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस बार पर्यावरण दिवस की थीम ही इस समस्या पर केंद्रित की है.

उसकी चिंता है कि ‘प्लास्टिक और पर्यावरण संकट से हम कैसे निपट सकते हैं’, लेकिन सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पहलू यही है कि प्लास्टिक के प्रति हमारा रवैया गंभीर नहीं है. सरकारें तो कानून बनाकर नियमों को लागू करा सकती हैं, लेकिन देश के नागरिक होने के नाते हम उसको कितना अपनाते हैं और उसका पालन करने में कितने खरे उतरते हैं, यही सबसे बड़ा सवाल है. प्लास्टिक से मुक्त होना है, तो हमें अपनी पूरी जीवन शैली और व्यवहार को बदलना पड़ेगा, ताकि हम आने वाले समय और भावी पीढ़ी को प्लास्टिक मुक्त भारत दे सकें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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