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Home Opinion महिलाओं ने बदल दी बिहार चुनाव की तसवीर

महिलाओं ने बदल दी बिहार चुनाव की तसवीर

महिलाओं ने बदल दी बिहार चुनाव की तसवीर
बिहार विधानसभा चुनाव में महिलाएं

Bihar elections : बिहार चुनाव में एग्जिट पोल से पहले तक एनडीए और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही थी. ऐसे कयास भी लगाये जा रहे थे कि शायद बिहार की जनता परिवर्तन के नाते नीतीश कुमार के स्थान पर तेजस्वी यादव को सत्ता सौंप सकती है. नीतीश कुमार की आयु, एंटी-इनकंबेंसी, तेजस्वी यादव की लोकप्रियता आदि जैसे तर्क भी दिये जा रहे थे. पर, चुनाव में जब महागठबंधन की करारी हार हुई, तो चुनाव विश्लेषक सोचने पर मजबूर हो गये कि आखिर इस परिणाम के पीछे क्या कारण रहा? चुनाव विश्लेषक एनडीए की जीत का बड़ा श्रेय महिलाओं को दे रहे हैं. यह सच है कि इस चुनाव में महिलाओं ने अभूतपूर्व ढंग से मतदान किया है. वर्ष 2024 के संसदीय चुनाव में 59.4 प्रतिशत महिलाओं ने और 53.3 प्रतिशत पुरुषों ने वोट डाला था. लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने 71.8 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग की, जबकि पुरुषों का वोट प्रतिशत 63 रहा. यानी लगभग नौ प्रतिशत बिंदु का अंतर. विभिन्न विधानसभा क्षेत्र में तो यह अंतर कई स्थानों पर 10 सेे 21 प्रतिशत का भी रहा.


चूंकि महिलाओं द्वारा पूर्व की तुलना में भारी संख्या में वोट डाले गये, तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि इसका क्या कारण रहा होगा? विपक्षी दल इसके पीछे एनडीए सरकार द्वारा मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 75 लाख महिलाओं को 10,000 रुपये की राशि अंतरित करने को कारण मानते हैं. हालांकि, इसे झुठलाया नहीं जा सकता. परंतु केवल 10,000 की राशि का अंतरण ही महिलाओं द्वारा समर्थन दिये जाने का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि महागठबंधन ने भी तो चुनाव प्रचार में महिलाओं को पैसे देने का वादा किया था. हमें इस संबंध में महिला सशक्तिकरण और कल्याण के संदर्भ में नीतीश सरकार के लगभग 20 वर्षों के कामकाज का और बिहार के आर्थिक विकास तथा रोजगार सृजन के प्रयासों का आकलन करना होगा.

लालू शासन में सामान्य जनता लचर कानून-व्यवस्था से त्रस्त थी. तब बलात्कार, अपहरण और फिरौती, हत्याएं तथा अन्य प्रकार के अपराध बिहार में सामान्य बात थी. इन अपराधों की त्रासदी अधिकांशतः महिलाओं को ही झेलनी पड़ती थी. महिलाओं को यह डर सता रहा था कि यदि तेजस्वी यादव चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनते हैं, तो जंगलराज की वापसी हो सकती है. महिलाओं ने नीतीश शासन में महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था में बेहतरीन सुधार का स्वाद चख लिया था. ऐसे में वे लालू शासन के जंगलराज की पुनरावृत्ति नहीं होने देना चाहती थीं. इतना ही नहीं, नीतीश सरकार के दौरान लागू शराबबंदी ने जिन्हें सर्वाधिक सुकून दिया, वे महिलाएं ही थीं. महिलाओं को यह भी लगता था कि किसी अन्य दल के सत्ता में आने से शराबबंदी का कानून निरस्त हो सकता है.


यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब पूरे देश में जीडीपी छह से आठ प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी, तब लालू यादव के शासनकाल में बिहार की जीडीपी में प्रतिवर्ष एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज हो रही थी. विकास के अभाव में पलायन जोरों पर था. ऐसे में नीतीश सरकार ने आकर बिहार की जनता को न केवल बेहतर शासन दिया, बल्कि विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत भी की. नीतीश कुमार के पहले 10 वर्ष के कार्यकाल में तो विकास, सुशासन और कल्याणकारी योजनाओं के चलते बिहार की जनता को राहत मिली ही थी, 2014 में केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में एनडीए की सरकार आने के बाद तो कल्याणकारी योजनाएं व्यवस्थागत रूप धारण कर गयीं. जनधन खातों का खुलना, सीधे लाभ हस्तानांतरण (डीबीटी), शौचालय का निर्माण, प्रधानमंत्री ग्रामीण, शहरी आवास योजना के तहत घरों का निर्माण, 100 प्रतिशत बिजली की पहुंच और विद्युत आपूर्ति की निरंतरता, हर घर नल से जल के माध्यम से पेयजल की पहुंच, आयुष्मान भारत योजना, आंगनबाड़ी सुविधा, उज्ज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडरों का मुफ्त वितरण जैसे उपायों से आम बिहारी के जीवन में बड़ा बदलाव आया. डबल इंजन की सरकार के दौरान लखपति दीदी, ड्रोन दीदी, आशा और आंगनबाड़ी में बेहतर वेतन और महिला स्वयं सहायता समूहों जैसी योजनाओं ने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया.


कहा जाता है कि बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरण हावी रहते हैं. चुनाव में जाति और बिरादरी के आधार पर वोट डाले जाते हैं. राजनीति को जातिगत समीकरणों के आधार पर आंका जाता है. कहा जा रहा था कि तेजस्वी यादव, यादव और मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण से जीत हासिल कर सकते हैं. लेकिन, इस बार महिला वोटरों ने ही नहीं, पुरुष वोटरों ने भी जातिगत विचार से इतर विकास और सुशासन पर वोट डाला है और सत्ता पुनः एनडीए को सौंप दी है. बिहार चुनाव में वोटिंग का बढ़ना जाति की बजाय मुद्दों के आधार पर मतदान, महिलाओं की चुनाव में बढ़ती भागीदारी सब भारत में मजबूत होते लोकतंत्र के द्योतक हैं. विपक्षी दलों के लिए यह एक चेतावनी है कि वे किसी वर्ग विशेष के तुष्टीकरण, मुफ्त योजनाओं के वादे, जातिगत समीकरणों के आधार पर चुनाव जीतने की रणनीति से बाहर आकर सुशासन, जन कल्याण और विकास की राजनीति करें, तो उनके लिए संभावनाएं बेहतर हो सकेंगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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