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क्या अमेरिका भारत और चीन को एआई के जरिए देगा मात और बनेगा लीडर?

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क्या अमेरिका भारत और चीन को एआई के जरिए देगा मात और बनेगा लीडर?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

Artificial intelligence : क्या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत और चीन जैसे देशों के सामने एक बड़ी चुनौती है? यह सवाल इसलिए क्योंकि अबतक इन दोनों ही देशों ने अपने श्रमबल की बदौलत दुनिया पर राज किया है. लेकिन अब अमेरिका ने एआई तकनीक के जरिए श्रमबल की जरूरतों को ही खारिज करना शुरू कर दिया है. 20वीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण श्रम लागत के अंतर पर आधारित था. भारत जैसे देशों ने सस्ते श्रमिकों की बड़ी संख्या उपलब्ध कराकर विकास किया.निर्माण उद्योग चीन चला गया, जबकि सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाएं भारत को मिलीं. इससे दशकों तक तेज जीडीपी वृद्धि, रोजगार सृजन और वैश्विक प्रभाव देखने को मिला.लेकिन अब यह पुरानी रणनीति अप्रासंगिक होती जा रही है.

21वीं सदी एआई की है

21वीं सदी में यह खेल ऑटोमेशन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा फिर से लिखा जा रहा है.और एक बार फिर, अमेरिका इस बदलाव का नेतृत्व कर रहा है — इस बार श्रम निर्यात से नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता के निर्यात के जरिए.अब देखिए क्या हो रहा है:-

शेन्झेन, चीन में फॉक्सकॉन का पूरी तरह से स्वचालित कारखाना तीन वर्षों में मानवीय श्रम को 60% तक घटा चुका है. इसी तरह के “लाइट्स-आउट” कारखाने अब अमेरिका और जापान में चल रहे हैं, जहां रोबोट अंधेरे में 24/7 काम करते हैं.”लाइट्स-आउट” निर्माण अब कोई कल्पना नहीं, बल्कि हकीकत है. रोबोट को न तो छुट्टी चाहिए, न घर, न ही वेतन.

सबसे तेजी से बढ़ने वाला उपभोक्ता ऐप बना चैट जीपीटी

ओपनएआई का ChatGPT इतिहास का सबसे तेजी से बढ़ने वाला उपभोक्ता ऐप बना और यह पहले ही ग्राहक सेवा, कंटेंट निर्माण, और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के कुछ हिस्सों को बदल रहा है. टेस्ला के टेक्सास और नेवाडा स्थित गीगाफैक्ट्रियां अत्यधिक स्वचालित हैं और पारंपरिक ऑटो संयंत्रों की तुलना में प्रति यूनिट उत्पादन पर कम श्रमिकों की जरूरत होती है.

  • अमेरिका के पास स्वचालित फैक्ट्रियां लगाने के लिए जमीन है
  • अमेरिका के पास इंजीनियरिंग कौशल है
  • अमेरिका के पास पूंजी है और वह भविष्य की AI कार्यबल तैयार कर रहा है

भारत और चीन के हितों का क्या होगा

अमेजन के गोदामों में अब 7,50,000 से अधिक रोबोट कार्यरत हैं, जबकि 2014 में यह संख्या केवल 15,000 थी — यह मैनुअल श्रम पर निर्भरता को घटाते हुए भी संचालन का दायरा बढ़ा रहे हैं. Nvidia, Microsoft और Salesforce जैसी कंपनियां अब ऐसे AI एजेंट्स का प्रयोग कर रही हैं जो पहले जूनियर विश्लेषकों, डेवलपर्स और डिजाइनरों का काम करते थे. और अब बात यहां और दिलचस्प हो जाती है:

अमेरिका के पास 2.27 अरब एकड़ से अधिक भूमि है जो ऑटोनोमस फैसिलिटी और ऊर्जा-गहन कंप्यूट क्लस्टर्स के लिए पर्याप्त है. विश्व के सबसे गहरे पूंजी बाजार, अब AI स्टार्टअप्स में अरबों डॉलर निवेश कर रहे हैं. वहीं Stanford, MIT और Berkeley जैसे संस्थान लगातार नई खोजों का नेतृत्व कर रहे हैं. इस परिस्थिति में बड़ा सवाल यह है कि भारत और चीन के हितों का क्या होगा जब-

  • सॉफ्टवेयर खुद लिखे जाने लगें
  • फैक्ट्रियां बिना मानव के चलें
  • AI एजेंट आउटसोर्स की गई टीमों की जगह ले लें
  • और बुनियादी ढांचा मजदूरों के पास नहीं, बल्कि बाजार के पास बने?

विश्व का सिरमौर बनने की राह पर अमेरिका

अगर इस तरह के हालात बनते हैं तो बहुत संभव है कि अगले 20 वर्षों में, अमेरिका सिर्फ प्रासंगिक बना न रहे, बल्कि उन उद्योगों को फिर से हासिल कर ले, जो उसने कभी खो दिए थे? अमेरिका यह सबकुछ संभव कर सकेगा, नौकरियां निर्यात करके नहीं,बल्कि बुद्धिमत्ता निर्यात करके.ज्यादा लोगों को काम पर रखकर नहीं,बल्कि तेजी से ऑटोमेट करके. इस स्थिति में भारत और चीन जैसे देश को यह सोचना होगा कि उनका हित कैसे सुरक्षित बचेगा. इसके लिए भारत जैसे देश अपनी सोच को कम लागत से रचनात्मकता की ओर लेकर जाना होगा और ट्रेंड का पीछा करने की बजाय ट्रेंड बनाना होगा. हमें नए प्रयोग करने होंगे और नवाचार को ग्रहण करना होगा. यह सबकुछ जबतक भारत और चीन नहीं करते हैं, तबतक तब तक पश्चिम न केवल अपनी बढ़त बनाए रख सकता है, बल्कि उन उद्योगों को भी फिर से हासिल कर सकता है जो वे पहले खो चुके थे. यह स्थिति एक बार फिर पश्चिम को विश्व का सिरमौर बना सकती है.

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