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Home Opinion क्या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति पर बंगाल में पूर्ण विराम लगेगा

क्या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति पर बंगाल में पूर्ण विराम लगेगा

क्या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति पर बंगाल में पूर्ण विराम लगेगा
विक्रम उपाध्याय का आलेख

West Bengal Election: अब इसमें कोई शक नहीं कि देश से तुष्टीकरण की राजनीति की विदाई लगभग हो चुकी है. देश अब लगातार राष्ट्रवाद और विकास के नाम पर वोट कर रहा है. हाल के चुनावों में पहले बिहार विधान सभा के और महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों के चुनावों में जो परिणाम आए हैं वे यही बताते हैं कि जनता विकास चाहती है और  भाषा या संप्रदाय के नाम पर विभाजित करने वाली शक्तियों का बायकॉट करना चाहती है. जहां एक ओर मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं के खिलाफ साजिश का आरोप झेल रही ममता बनर्जी की पार्टी है और दूसरी तरफ राष्ट्र प्रथम एवं सबका साथ सबका विकास की अवधारणा के साथ सत्ता चला रहे नरेंद्र मोदी की पार्टी बीजेपी है. एक का कमांड खुद ममता बनर्जी संभाल रही हैं तो दूसरे का कमांड, प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के हाथ में है, जिनके साथ बीजेपी संगठन की बड़ी शक्ति काम कर रही है.

बंगाल के चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा मुद्दा वहाँ से हिंदुओं के लगातार पलायन और बंगाल को एक मुस्लिम राज्य में बदल देने की ममता सरकार की कोशिश के खिलाफ जनजागरण है तो ममता के लिए बंगाल अस्मिता और केंद्र के बेवजह दखल के खिलाफ संघर्ष ही मुद्दा है. टीमसी के लिए यह चुनाव उसके अस्तित्व से भी जुड़ा है. उसके हर कार्यकर्ता के मन में अब एक ही सवाल है कि ममता 2026 में बंगाल की सीएम होंगी या नहीं? टीएमसी के लिए सत्ता में बने रहने का एक ही समीकरण है कि पहले की तरह मुस्लिम वोट एकमुश्त उसे मिल जाए और हिंदुओं के वोट में विभाजन हो जाए. बंगाल में इसी तरीके से सीपीएम ने तीस साल राज किया अब ममता 15 साल से शासन कर रही हैं.

2011 में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद ममता बनर्जी ने कट्टर इस्लामवादियों को खुश करने के कई प्रयोग एक साथ कर दिए. मुसलमानों के लगभग 30 प्रतिशत वोटर पर अधिकार जमाने के के उद्देश्य से उन्होंने मदरसों को ग्रांट देना शुरू किया, हज सब्सिडी बढ़ा दी, मुस्लिम मौलवियों को वित्तीय सुविधाएं बढ़ दी गई और उनको महत्वपूर्ण राजनीतिक और वित्तीय पदों से भी नवाजा गया. सत्ता का शह प्राप्त कर कट्टरपंथियों ने उत्तर बंगाल के बड़े इलाकों पर अपना दबदबा कायम कर लिया, जहां राज्य सरकार और पुलिस को भी प्रशासन चलाने में कठिनाइयां आने लगी. माना जा रहा है कि इस समय मुर्शिदाबाद जिले में मुस्लिम संख्या 66 प्रतिशत, मालदा जिले में 52 प्रतिशत, दिनाजपुर में 48 प्रतिशत और बीरभूम में 38 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम जनसंख्या है. सुजापुर चुनाव क्षेत्र में तो 90 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है. मुस्लिम आबादी में यह बढ़ोतरी मुख्य कारण बांग्लादेश से आए गैरकानूनी घुसपैठिये हैं और ये ही बीजेपी के चुनावी मुद्दे भी हैं. सत्ताधारी पार्टी टीएमसी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि अपने वोट के खातिर उसने देश और बंगाल पर खतरे को नजरअंदाज क्यों किया.

2026 के चुनाव से ठीक पहले भारतीय मुस्लिम मतदाता भी यह सवाल करने लगे हैं कि क्यों उनकी जायदाद और बहन बेटियों का सौदा बांग्लादेशी मुसलमानों के हाथों किया जा रहा है. यही कारण है कि मुस्लिम इस समय कई धड़ों में बँटे हुए हैं. अब टीएमसी से ज्यादा मुस्लिम अन्य मजहबी पार्टियों से जुड़ रहे हैं, कई मुस्लिम नेता बीजेपी में भी शामिल हुए हैं. अमित शाह ना सिर्फ घुसपैठ के मुद्दे को कोर इशू बना रहे हैं, बल्कि भारतीय मुसलमानों को भी इस मुद्दे से जोड़ रहे हैं. इधर मोदी सरकार भी मुस्लिम महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं के साथ कारण उनके बीच पैठ बना चुकी है.

पश्चिम बंगाल देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है, जहां विधान सभा में 294 सीटें हैं और लोक सभा में 42 सीटें. केंद्र की सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी नेतृत्व बंगाल के महत्व को ठीक से समझता है. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की सत्ता में बीजेपी पुनर्स्थापित करने का श्रेय भी अमित शाह के पास ही है. महाराष्ट्र भी अब पूरी तरह से भाजपामय है. अब अमित शाह चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी पूर्ण बहुमत प्राप्त कर वहां न सिर्फ अपनी सरकार बनाई जाए, बल्कि बंगाल से भी तुष्टीकरण की राजनीति समाप्त कर सर्व वर्ग के हित के लिए काम किया जाए.  

गृह मंत्री अमित शाह पार्टी की असली ताकत बूथ लेवल के कार्यकर्ताओं में जोश भरने में लग गए हैं, पिछले महीने बंगाल की तीन दिन के दौरे में उन्होंने ज्यादातर बूथ लेवल कार्यकर्ताओं से बंद कमरे में बात की. चुनाव की तैयारियों में पार्टी के तमाम नेताओं को झोंक दिया गया है. बंगाल में संघ से जुड़े बीजेपी नेता और ज़मीनी कार्यकर्ताओं को जोड़ने की जिम्मेदारी वरिष्ट नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व संगठन मंत्री सुनील बंसल को दी गई है. चुनाव जीतने वाली टीम को अमित शाह ने बंगाल में भी पूरी तरह ऐक्टिव कर दिया है. अमित शाह जिस भी विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी लेते हैं, वहाँ सबसे पहले संगठन को कसने से ही शुरुआत करते हैं. विधायकों, सांसदों के साथ साथ नगर निगम पार्षदों तक के साथ लगातार बंद कमरे में बात करते हैं और कहीं भी किसी गफलत की गुंजाइश नहीं छोड़ते हैं.  बिहार में भी उन्होंने इसी पद्धति से तमाम बागी बीजेपी नेताओं को पुनः पार्टी के काम मे लगाया था और उसका सुखद परिणाम भी सामने आया था.

अमित शाह अपने प्रतिस्पर्धियों की कमजोरियों को भी ठीक से पहचानते हैं और उससे जुड़े मुद्दों को चिन्हित कर उसपर रणनीति तैयार करवाते हैं. पश्चिम बंगाल में भी अमित शाह ने ममता सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार, चिट फंड घोटाला, नौकरी घोटाला, कोयला घोटाला, आरजी कर दुष्कर्म मामला, दुर्गापुर दुष्कर्म  कांड, संदेशखाली कांड और पशु तस्करी समेत दर्जनों मुद्दे चिन्हित कर लिए हैं और उसमें संलिप्त तृणमूल कांग्रेस के नेताओं और मंत्रियों के नाम भी उजागर कर दिए हैं. राज्य के कई मंत्रियों के भ्रष्टाचार में शामिल होने के कारण जेल जाने की घटनाएं लोगों के दिमाग में पहले से ही अंकित है. लगातार तीन बार सत्ता में रही टीएमसी सरकार के खिलाफ लोगों में जबरदस्त गुस्सा है. बीजेपी चाहे तो इसका पूरा फायदा अकेले उठा सकती है. बंगाल में काँग्रेस धरती पकड़ चुकी है, माकपा में भी कोई आग नहीं बची है. हताश टीएमसी कार्यकर्ता पार्टी के लिए मेहनत करने के बजाय बीजेपी में शामिल हो रहे हैं.

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