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Home Opinion समकालीन हिंदी सिनेमा में हिंसा: मनोरंजन, प्रतिबिंब या मूल्यों का क्षरण?

समकालीन हिंदी सिनेमा में हिंसा: मनोरंजन, प्रतिबिंब या मूल्यों का क्षरण?

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समकालीन हिंदी सिनेमा में हिंसा: मनोरंजन, प्रतिबिंब या मूल्यों का क्षरण?
हिंदी सिनेमा, फोटो AI

डॉ रमन कुमार गरोडिया

मजबूत कथानक के साथ प्रस्तुत की गई यह शैली दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने के साथ-साथ व्यावसायिक रूप से भी अत्यंत सफल हो रही है. ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है. क्या इस प्रकार की हिंसा का चित्रण मानव मूल्यों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, विशेषकर उस समय जब विश्व स्वयं अस्थिरता और संघर्ष के दौर से गुजर रहा है?

सिनेमा समाज के साथ विकसित होता रहा है

एक दृष्टि से देखा जाए तो सिनेमा हमेशा समाज के साथ विकसित होता रहा है. आदर्शवादी नायकों से हटकर अब नैतिक रूप से जटिल और धुंधले चरित्रों की ओर झुकाव दर्शकों की बदलती रुचि को दर्शाता है. आज के दर्शक अधिक यथार्थवादी, तीव्र और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली कहानियों की तलाश में रहते हैं. इस संदर्भ में हिंसा एक सिनेमाई उपकरण के रूप में सामने आती है, जो कथानक को गहराई देने और प्रभाव को तीव्र बनाने का काम करती है. फिर भी, अत्यधिक हिंसा का बढ़ता सामान्यीकरण केवल एक शैलीगत परिवर्तन नहीं माना जा सकता.

हिंसक दृश्यों को देखने से मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ते हैं

बार-बार हिंसक दृश्यों को देखने से मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ते हैं. यह पाया गया है कि ऐसी सामग्री के निरंतर संपर्क से व्यक्ति की संवेदनशीलता कम हो सकती है. जब फिल्म का नायक ही हिंसा को न्यायोचित ठहराकर उसका उपयोग करता है, तो यह संदेश जाता है कि कुछ परिस्थितियों में आक्रामकता स्वीकार्य है. यह स्थिति विशेष रूप से युवाओं के लिए चिंताजनक है.

सिनेमा समाज से अलग नहीं है

विकासशील आयु में मीडिया उनके नैतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करता है. जब प्रतिशोध को महिमामंडित किया जाता है और उसके परिणामों को नजरअंदाज किया जाता है, तो यह सही और गलत के बीच की रेखा को धुंधला कर सकता है. साथ ही, यह समझना भी आवश्यक है कि सिनेमा समाज से अलग नहीं है. आज का विश्व भू-राजनीतिक तनाव, सामाजिक विभाजन और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा है. कई मायनों में हिंसक फिल्में इस वास्तविकता का प्रतिबिंब हैं. वे लोगों की निराशा, आक्रोश और त्वरित समाधान की इच्छा को दर्शाती हैं. कुछ दर्शकों के लिए ये फिल्में भावनात्मक राहत का माध्यम भी बनती हैं. लेकिन यही स्थिति एक चक्र भी बनाती है—समाज सिनेमा को प्रभावित करता है और सिनेमा समाज को. जब दोनों में हिंसा का प्रभाव बढ़ता जाता है, तो यह एक ऐसी संस्कृति को जन्म दे सकता है जिसमें आक्रामकता सामान्य लगने लगती है.

इसलिए मुख्य प्रश्न हिंसा का नहीं, बल्कि उसके चित्रण का है. यदि हिंसा को संदर्भ के साथ, उसके परिणामों और नैतिक द्वंद्व के साथ दिखाया जाए, तो यह सार्थक और विचारोत्तेजक हो सकती है. यह सामाजिक सच्चाइयों को उजागर कर सकती है और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर सकती है. लेकिन यदि हिंसा को केवल आकर्षक और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यह सहानुभूति को कम कर सकती है और खतरनाक सोच को बढ़ावा दे सकती है. इस संदर्भ में जिम्मेदारी केवल फिल्म निर्माताओं की नहीं, बल्कि दर्शकों की भी है. ऐसी फिल्मों की व्यावसायिक सफलता यह दर्शाती है कि उनकी मांग है. यह एक ऐसा चक्र बनाता है जिसमें दर्शकों की पसंद ही सामग्री के निर्माण को प्रभावित करती है.

अंततः, मानव मूल्यों की रक्षा केवल नियंत्रण या प्रतिबंध से नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ से होती है. दर्शकों को यह समझना होगा कि मनोरंजन और वास्तविक जीवन के मूल्यों में अंतर होता है, और उन्हें देखी गई सामग्री पर विचार करना चाहिए.

सिनेमा केवल समाज का प्रतिबिंब नहीं, आकार देने का माध्यम भी है

सिनेमा केवल समाज का प्रतिबिंब ही नहीं, बल्कि उसे आकार देने का माध्यम भी है. यह हमें दिखाता है कि हम क्या हैं, और यह भी प्रभावित करता है कि हम क्या बन सकते हैं. ऐसे समय में, जब वास्तविक और काल्पनिक दोनों ही दुनिया में हिंसा का प्रभाव बढ़ रहा है, हमें सहानुभूति, करुणा और नैतिक स्पष्टता को बनाए रखने का प्रयास करना होगा. चुनौती यह नहीं है कि हम ऐसी फिल्मों को पूरी तरह नकार दें, बल्कि यह है कि हम उन्हें समझदारी और संवेदनशीलता के साथ देखें, ताकि प्रभावशाली कहानी कहने की प्रक्रिया में हम अपने मूल मानवीय मूल्यों को न खो दें.

ये लेखक के निजी विचार हैं

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अरबिंद कुमार मिश्रा वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में एक अनुभवी पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. अप्रैल 2011 से संस्थान का हिस्सा रहे अरबिंद के पास पत्रकारिता के क्षेत्र में बतौर रिपोर्टर और डेस्क एडिटर 15 वर्षों से अधिक का अनुभव है. वर्तमान में वह नेशनल और इंटरनेशनल डेस्क की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. विशेषज्ञता और अनुभव अरबिंद की लेखनी में खबरों की गहराई और स्पष्टता है. उनकी मुख्य विशेषज्ञता इन क्षेत्रों में है. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मामले: वैश्विक राजनीति और देश की बड़ी घटनाओं पर पैनी नजर. खेल पत्रकारिता: झारखंड में आयोजित 34वें नेशनल गेम्स से लेकर JSCA स्टेडियम में हुए कई अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैचों की ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव. झारखंड की संस्कृति: राज्य की कला, संस्कृति और जनजातीय समुदायों की समस्याओं और उनकी जीवनशैली पर विशेष स्टोरीज. पंचायतनामा: ग्रामीण विकास और जमीनी मुद्दों पर 'पंचायतनामा' के लिए विशेष ग्राउंड रिपोर्टिंग. करियर का सफर प्रभात खबर डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अरबिंद ने पत्रकारिता के हर आयाम को बखूबी जिया है. डिजिटल मीडिया की बारीकियों को समझने से पहले उन्होंने आकाशवाणी (All India Radio) और दूरदर्शन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में एंकरिंग के जरिए अपनी आवाज और व्यक्तित्व की छाप छोड़ी है. शिक्षा और योग्यता UGC NET: अरबिंद मिश्रा ने यूजीसी नेट (UGC NET) उत्तीर्ण की है. मास्टर्स (MA): रांची यूनिवर्सिटी के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग से एमए की डिग्री. ग्रेजुएशन: रांची यूनिवर्सिटी से ही मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में स्नातक.
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