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अमेरिका ने ईरान को कम करके आंका

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अमेरिका ने ईरान को कम करके आंका
अमेरिका-ईरान युद्ध

Iran War : ईरान में चल रहे युद्ध को लेकर भारी अनिश्चितता, भय और चिंता का माहौल है. सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई सहित शीर्ष नेतृत्व, हमले की पहली लहर में ही खत्म हो गया. अब ईरान के सुरक्षा प्रमुख और प्रभावी नेता अली लारीजानी भी मारे गये हैं. इन परिस्थितियों में हर किसी के मन में तीन अहम सवाल हैं : पहला, क्या अमेरिका ईरान में सत्ता परिवर्तन में सफल होगा, दूसरा, युद्ध और तबाही कब तक जारी रहेगी, और तीसरा, युद्ध के क्षेत्रीय और भू-राजनीतिक प्रभाव क्या होंगे.

ईरान पर इस्राइल और अमेरिका के आक्रमण का स्पष्ट उद्देश्य ईरानी शासन को पंगु बनाना और ईरान में लंबे समय से विरोध कर रहे असंतुष्टों की मदद से एक कठपुतली सरकार स्थापित करना था. अमेरिका द्वारा ईरान की परमाणु क्षमता को नष्ट करने के लिए दिया गया बहाना एक छल और ध्यान भटकाने वाली चाल थी. वास्तव में, इस्राइल अपने सबसे बड़े दुश्मन को नष्ट करना चाहता है, जबकि अमेरिका पश्चिम एशिया और उसके संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण करना चाहता है.


इस्राइल के दृष्टिकोण से, हमले का समय अनुकूल था, क्योंकि ईरान आंतरिक विरोध का सामना कर रहा था और उसके बाहरी नेटवर्क काफी कमजोर हो चुके थे. ईरान ने फिलिस्तीन में हमास, यमन में हूती और लेबनान में हिजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी संगठनों को बढ़ावा देकर व्यापक बाहरी नेटवर्क विकसित किये थे. इस्राइल की लगातार बमबारी ने इन नेटवर्कों को कमजोर कर दिया है. सीरिया में बशर अल-असद का शासन बहुत पहले ही समाप्त हो चुका है. इसके अलावा, रूस सैन्य सहायता प्रदान करने की स्थिति में नहीं है, और चीन ईरान को बचाने के लिए अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को खतरे में नहीं डालेगा.

इन परिस्थितियों में, ईरान काफी हद तक अलग-थलग पड़ गया, और उधर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को ईरान की कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए राजी कर लिया. लेकिन, इस्राइल और अमेरिका दोनों ने ईरानी शासन और उसकी सेना की शक्ति का गलत आकलन किया. वेनेजुएला में राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ने में मिली सैन्य सफलता से उत्साहित होकर अमेरिका ने सोचा कि ईरान के सर्वोच्च नेता की हत्या से अन्य नेता आतंकित होंगे और शासन आत्मसमर्पण कर देगा.

अमेरिका अयातुल्ला अली खामेनेई और कई अन्य शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेताओं को मारने में सफल रहा, लेकिन ईरानी नेतृत्व ने लड़ाई जारी रखने के लिए असाधारण दृढ़ संकल्प और क्षमता का प्रदर्शन किया है. उसने न केवल आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया, बल्कि पश्चिम एशिया के 12 से अधिक देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों और बुनियादी ढांचे पर हमला किया है. इसलिए, शीर्ष नेता की हत्या करने और सत्ता परिवर्तन की अमेरिका-इस्राइल की रणनीति स्पष्ट रूप से विफल रही है. मारे गये अयातुल्ला खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई अब नये सर्वोच्च नेता हैं और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड की सेना प्रतिरोध और जवाबी कार्रवाई जारी रखे हुए है.


विशुद्ध रणनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाये, तो ईरानी शासन कई रणनीतियों पर काम कर रहा है. अमेरिकी हस्तक्षेप की सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक लागत को तेजी से बढ़ाना, द्विपक्षीय संघर्ष को क्षेत्रीय संघर्ष में बदलना, और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करना, जिससे तेल और गैस की कीमतें बढ़ेंगी और अमेरिकी दुस्साहस के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय एकजुट होगा. फिलहाल, ईरान की रणनीति सफल होती दिख रही है. पश्चिम एशिया में ईरान के हमलों ने अमेरिकी सैन्य ढांचे को व्यापक रूप से नुकसान पहुंचाया है, लगभग एक दर्जन अमेरिकी सैनिक शहीद हुए हैं और अमेरिका को राजनीतिक और सैन्य रूप से भारी नुकसान उठाना पड़ा है.

अपनी विशाल सैन्य क्षमता के बल पर अमेरिका ने ईरान की सेना और उसके बुनियादी ढांचे के एक बड़े हिस्से को नष्ट कर दिया है, लेकिन वह शासन को पूरी तरह से खत्म करने के करीब भी नहीं है. ईरान काफी समय से इस युद्ध की तैयारी कर रहा था. इस हमले की आशंका में ईरान ने अपने ड्रोन और मिसाइल लॉन्चरों का एक बड़ा हिस्सा छिपा रखा है. उसने एक विकेंद्रीकृत रणनीति अपनायी है और उसके सैन्य संसाधन बिखरे हुए हैं. इसलिए, अमेरिका और इस्राइल के लिए लक्ष्यों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना आसान नहीं है.

दूसरा, ईरान ने जानबूझकर दहशत फैलाने और अमेरिकी सैन्य संसाधनों को अत्यधिक दबाव में डालने के प्रयास में पूरे क्षेत्र को संघर्ष में घसीट लिया है. पश्चिम एशिया के लोगों का मानना है कि यह युद्ध इस्राइल द्वारा उन पर थोपा गया है और उन्हें डर है कि अमेरिका अपनी मिसाइल प्रणालियों के माध्यम से उनकी रक्षा करने में असमर्थ है. वे अपने देशों पर ईरानी हमलों का कड़ा विरोध करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी डर है कि ईरानी शासन के पतन से उनकी सुरक्षा में कोई सुधार नहीं होगा, क्योंकि इस्राइल इस क्षेत्र में एकमात्र तानाशाह के रूप में उभरेगा.


इस क्षेत्र में संघर्ष कुछ समय तक जारी रहने की संभावना है. यह एक सच्चाई है कि अमेरिका बातचीत के जरिये या झूठी जीत की घोषणा करके इस संघर्ष से बाहर निकलना चाहता है. अमेरिका में युद्ध विरोधी भावना बढ़ रही है. लेकिन इस स्तर पर युद्ध से बाहर निकलना अमेरिका के लिए एक बड़ी आपदा साबित होगी, क्योंकि इससे उसके सहयोगी देशों का उस पर से भरोसा उठ जायेगा. यदि युद्ध लंबा खिंचता है, तो आर्थिक और भू-राजनीतिक संकट न केवल इस क्षेत्र के लिए, बल्कि वैश्विक समुदाय के लिए भी बहुत गंभीर हो सकता है. ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गयी है और गैस एवं उर्वरक की कीमतें भी बहुत बढ़ गयी हैं.

मुद्रास्फीति के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी आयेगी. इस युद्ध ने एक बहुत गलत संदेश भी दिया है. शक्तिशाली देश अपनी मनमानी करेंगे और कमजोरों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. जहां तक भारत की बात है, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अपने प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और तेल, गैस एवं उर्वरक की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना है. इसके अलावा, चूंकि ईरान ब्रिक्स का सदस्य है और भारत इस वर्ष शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, इसलिए नयी दिल्ली को दो काम करने चाहिए. ब्रिक्स सदस्यों के साथ मिलकर अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनाने के लिए ठोस कदम उठाना और तेल तथा गैस की सुरक्षित आपूर्ति के लिए ब्रिक्स के भीतर तंत्र विकसित करना. ये दोनों ही संभव हैं और इससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत होगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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