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गलत है बगराम पर नियंत्रण की अमेरिकी जिद

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गलत है बगराम पर नियंत्रण की अमेरिकी जिद
बगराम एयरबेस

Bagram : अफगानिस्तान फिर वैश्विक रणनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा बगराम एयरबेस पर पुनः नियंत्रण पाने की मांग ने पूरे क्षेत्र में चिंता और असहमति को जन्म दिया है. वर्ष 2021 में अमेरिकी सैनिकों की जल्दबाजी में हुई वापसी के बाद अमेरिका ने इस अति-महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने को छोड़ दिया था. अब ट्रंप की यह कोशिश केवल अमेरिका की सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का प्रयास नहीं है, बल्कि चीन को नियंत्रित करने और मध्य तथा दक्षिण एशिया में अमेरिकी प्रभाव को पुनः स्थापित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है. पर भारत, चीन, रूस, ईरान, यहां तक कि पाकिस्तान जैसे देशों के लिए यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में देखा जा रहा है.


वर्ष 2020 में ट्रंप प्रशासन द्वारा तालिबान के साथ दोहा समझौते पर हस्ताक्षर अमेरिका की लंबी और महंगी अफगान लड़ाई के अंत का संकेत था. पर 2020 का चुनाव हारने के बाद जब बाइडेन राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने अमेरिकी सैनिकों की वापसी का काम पूरा किया. उसी के साथ बगराम एयरबेस, जो ‘वार ऑन टेरर’ के दौरान अमेरिकी अभियानों का मुख्य केंद्र था, अमेरिकी नियंत्रण से बाहर चला गया. चार साल बाद, ट्रंप बार-बार ‘बगराम वापस चाहिए’ जैसी बातें कर रहे हैं. पिछले महीने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर उन्होंने लिखा, ‘अगर अफगानिस्तान ने बगराम वापस नहीं दिया, तो बुरे नतीजे होंगे’. तालिबान की प्रतिक्रिया तत्काल और स्पष्ट थी. उन्होंने कहा कि अफगान भूमि का एक इंच भी किसी विदेशी शक्ति को नहीं सौंपा जायेगा. बगराम का भू-सामरिक महत्व असंदिग्ध है. यह काबुल से करीब 50 किलोमीटर उत्तर में स्थित है और चीन के पश्चिमी प्रांत शिंजियांग से महज एक घंटे की उड़ान दूरी पर है, जहां चीन की परमाणु और रक्षा परियोजनाएं स्थित हैं.

अमेरिकी दृष्टिकोण से देखें, तो बगराम पर पुनः नियंत्रण पाना चीन की गतिविधियों पर निगरानी रखने, मध्य एशिया में प्रभाव बनाये रखने और क्षेत्र में शक्ति संतुलन स्थापित करने का साधन बन सकता है. यह ठिकाना ट्रंप की ‘नये शीतयुद्ध’ जैसी रणनीति का केंद्र हो सकता है. पर वर्तमान क्षेत्रीय परिस्थितियां 20वीं सदी के शीतयुद्ध जैसी नहीं हैं. कभी अमेरिकी अभियानों में सहयोगी रहा पाकिस्तान अब चीन के साथ अपने गहरे सामरिक संबंधों के कारण अमेरिका को ऐसी कोई सुविधा नहीं दे सकता. मध्य एशिया के देश रूस व चीन के प्रभाव में हैं, इसलिए वे भी अमेरिकी उपस्थिति का समर्थन नहीं करेंगे. खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकाने हैं, पर वे बहुत दूर हैं और पश्चिमी चीन या मध्य एशिया के लिए उपयोगी नहीं. ट्रंप की इस योजना के खिलाफ क्षेत्र में असामान्य एकता देखने को मिली है.

हाल ही में मास्को में आयोजित सातवें मास्को फॉर्मेट कंसल्टेशन ऑन अफगानिस्तान में भारत, चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों ने एक संयुक्त बयान जारी किया कि ‘अफगानिस्तान या उसके पड़ोसी देशों में किसी विदेशी शक्ति का सैन्य ढांचा अस्वीकार्य है’. यद्यपि बयान में अमेरिका या बगराम का नाम नहीं लिया गया, पर संकेत स्पष्ट था. यह उल्लेखनीय है कि उस भारत ने भी, जो हाल के वर्षों में अमेरिका का निकट रणनीतिक साझेदार रहा है, तालिबान और चीन के साथ इस मुद्दे पर एक स्वर में विरोध दर्ज किया. यह क्षेत्रीय असंतोष की गहराई और बदलते सुरक्षा समीकरणों को दर्शाता है. भारत की आपत्ति उसके सिद्धांतों पर आधारित है. नयी दिल्ली हमेशा अफगानिस्तान की संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया का समर्थन करती रही है. वह ‘अफगान नेतृत्व वाले, अफगान स्वामित्व वाले’ समाधान की पक्षधर है. भारत को भय है कि यदि अमेरिकी सैन्य ढांचा लौटता है, तो अफगानिस्तान पुनः महाशक्तियों के संघर्ष का अखाड़ा बन जायेगा, जिससे आतंकवाद, अस्थिरता और चरमपंथ को बढ़ावा मिलेगा. यह न केवल भारत की सुरक्षा के लिए खतरा होगा, बल्कि उसके विकास और संपर्क परियोजनाओं- जैसे ईरान के चाबहार बंदरगाह या अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे- पर भी प्रतिकूल असर डालेगा.


चीन का विरोध उसकी सुरक्षा चिंताओं से प्रेरित है. बगराम से चीन के पश्चिमी क्षेत्रों की निगरानी आसानी से की जा सकती है, जो बीजिंग के लिए अस्वीकार्य है. उसे आशंका है कि अमेरिका इस ठिकाने का उपयोग उइगुर उग्रवाद या अन्य असंतोषी समूहों को समर्थन देने के लिए कर सकता है. रूस और ईरान इसे अमेरिकी सैन्य घेराबंदी की पुरानी रणनीति के पुनरुत्थान के रूप में देखते हैं. पाकिस्तान भी इस विचार से असहज है, क्योंकि वह न तो चीन को नाराज करना चाहता है, न अपने यहां किसी नये राजनीतिक संकट को जन्म देना चाहता है. ट्रंप और उनके सलाहकारों के लिए बगराम अमेरिकी शक्ति का प्रतीक है. इसके दो लंबे रन-वे बड़े विमानों के लिए उपयुक्त हैं, और इसका स्थान पूरे मध्य और दक्षिण एशिया पर निगरानी रखने के लिए रणनीतिक रूप से आदर्श है. किंतु अब भू-राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है. अमेरिका का प्रभाव इस क्षेत्र में कम हुआ है, जबकि क्षेत्रीय देश अपनी संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप की नीति पर एकमत हो रहे हैं. वर्ष 2021 में काबुल से वापसी ने अमेरिका की रणनीतिक अधीरता और असंगत नीति को उजागर किया था. यदि अब वह पुनः बगराम में लौटने की कोशिश करता है, तो यह न केवल अफगान संप्रभुता का उल्लंघन होगा, बल्कि अमेरिका की विश्वसनीयता को भी और कमजोर करेगा. वर्तमान समय जब क्षेत्रीय सहयोग विकास, संपर्क और स्थिरता पर आधारित हो रहा है, तब सैन्य दबाव की वापसी प्रतिकूल परिणाम ही लायेगी.


बगराम विवाद इस व्यापक प्रश्न को भी सामने लाता है कि क्या अमेरिका अब भी सैन्य शक्ति को ही अपना प्रमुख उपकरण मानता है? चीन के साथ प्रतिस्पर्धा में केवल सैन्य साधनों से जीत नहीं मिल सकती. आज की प्रतिस्पर्धा कूटनीति, तकनीक, अर्थव्यवस्था और वैश्विक नेतृत्व में है. ट्रंप की बगराम के प्रति जिद घरेलू राजनीति के लिए उपयोगी हो सकती है, पर क्षेत्र के लिए यह अस्थिरता के एक नये चक्र की शुरुआत होगी. बगराम पर ट्रंप की महत्वाकांक्षा ने एक दुर्लभ क्षेत्रीय सहमति को जन्म दिया है- भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान और तालिबान इस मुद्दे पर एक साथ खड़े हैं. यह कोई वैचारिक एकता नहीं, व्यावहारिक समझ है कि अफगानिस्तान की स्थिरता ही क्षेत्रीय शांति की कुंजी है. यदि इतिहास से कोई सीख मिलती है, तो वह यह कि इस क्षेत्र में शांति की राह बगराम के रन-वे से नहीं, कूटनीति, संप्रभुता के सम्मान और वास्तविक क्षेत्रीय सहयोग से होकर गुजरती है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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