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शिक्षा की विसंगति

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शिक्षा की विसंगति
शिक्षा की विसंगति

Union Ministry of Education : केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का यह आंकड़ा चौंकाने वाला है कि देश में 1,04,125 स्कूल ऐसे हैं, जहां पढ़ाने वाले एक ही शिक्षक हैं. इन स्कूलों में 33,76,769 बच्चे पढ़ रहे हैं. यानी ऐसे हर स्कूल में औसतन 34 छात्र-छात्राएं हैं. जबकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत प्राथमिक स्कूलों में हर 30 बच्चों पर एक शिक्षक और उच्च प्राथमिक स्तर पर हर 35 बच्चों पर कम से कम एक शिक्षक का होना अनिवार्य है. एक शिक्षक वाले इन स्कूलों की संख्या आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा 12,912 है. जबकि ऐसे 9,508 स्कूलों के साथ उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर और 9,172 स्कूलों के साथ झारखंड तीसरे स्थान पर है. इन स्कूलों में नामांकन के मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है. वहां 6.2 लाख बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ते हैं. दूसरे स्थान पर झारखंड है, जहां एक शिक्षक वाले स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या 4.36 लाख है.

ऐसे स्कूल देश के ग्रामीण इलाकों में ही ज्यादा हैं. शिक्षा मंत्रालय के शैक्षणिक वर्ष 2024-25 का आंकड़ा बताता है कि 2022 में इस तरह के स्कूल 1,18,190 थे, जबकि 2023 में ऐसे स्कूलों की संख्या 1,10, 971 थी. यानी पिछले दो वर्षों में इन स्कूलों की संख्या में छह प्रतिशत की गिरावट आयी है, पर शिक्षक-छात्र अनुपात अब भी अधिक बना हुआ है. हालांकि चीजें बेहतर भी हो रही हैं. जैसे, माध्यमिक स्तर पर 10 साल पहले 26 छात्रों पर एक शिक्षक थे, जबकि अब 17 छात्रों पर एक शिक्षक हैं. ड्रॉपआउट रेट भी घटा है. माध्यमिक स्तर पर 2023-24 में यह 10.9 प्रतिशत था, जो 2024-25 में घटकर 8.2 फीसदी रह गया है.

ऐसे ही, माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट रेट 5.2 प्रतिशत से घटकर 3.5 प्रतिशत और प्राथमिक स्तर पर यह 3.7 प्रतिशत से घटकर 2.3 प्रतिशत रह गया है. हालांकि राज्य स्तर पर असमानता बनी हुई है. जैसे, हायर सेकेंडरी स्तर पर झारखंड के स्कूलों में एक शिक्षक को औसतन 47 छात्रों को पढ़ाना पड़ता है, जबकि सिक्किम में यह आंकड़ा सात है. शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने की सरकार की कोशिशों के बावजूद एक शिक्षक वाले स्कूलों का अब भी इतनी बड़ी संख्या में होना हर बच्चे की शिक्षा तक पहुंच में बाधक तो है ही, यह शिक्षा की गुणवत्ता में गहरी असमानता को भी उजागर करता है. अच्छी बात यह है कि इस विसंगति को दूर करने के लिए सरकार उन स्कूलों का एकीकरण कर रही है, जिनमें नामांकन बहुत कम हैं, ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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