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Home Opinion देश को एकता के सूत्र में जोड़ेगा त्रिभाषा फॉर्मूला

देश को एकता के सूत्र में जोड़ेगा त्रिभाषा फॉर्मूला

देश को एकता के सूत्र में जोड़ेगा त्रिभाषा फॉर्मूला
त्रिभाषा फॉर्मूला का महत्व

Three-Language Formula : विविधता में एकता की संस्कृति वाले अपने देश की नयी पीढ़ी को एकता की सीख देने की दिशा में त्रिभाषा फॉर्मूला कारगर साबित हो सकता है. वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आयी ‘नयी शिक्षा नीति, 2020’ ने एक बार फिर त्रिभाषा फॉर्मूले को अपनाने पर जोर दिया है. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसइ एक जुलाई से शुरू हो रहे नये सत्र में नौवीं से लेकर बारहवीं तक में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने जा रही है, पर अतीत की तरह इस बार भी इसका विरोध शुरू हो गया है, जबकि देश को एकता के सूत्र में जोड़ने वाले इस कदम का स्वागत होना चाहिए. इसे लेकर शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों का एक समूह देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंच गया है और सीबीएसइ के इस निर्णय को मनमाना बताया है. इससे छात्रों, अध्यापकों और स्कूलों पर दबाव बढ़ने की बात कही जा रही है. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक तो नहीं लगायी है, अलबत्ता केंद्र सरकार और सीबीएसइ को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब जरूर मांग लिया है.


त्रिभाषा फॉर्मूला सबसे पहले कोठारी आयोग के प्रमुख दौलत सिंह कोठारी ने दिया था. दौलत सिंह कोठारी कोई मामूली व्यक्ति नहीं थे. वे रक्षा अनुसंधान एवं अध्ययन संगठन यानी डीआरडीओ के संस्थापक थे और महान ब्रिटिश वैज्ञानिक लॉर्ड रदरफोर्ड के शिष्य. उनका मानना था कि भारतीय एकता के सूत्र को और मजबूत करने में त्रिभाषा फॉर्मूला बेहद कारगर होगा. इसलिए उन्होंने छात्रों को पहली भाषा के रूप में मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, दूसरी भाषा के रूप में हिंदीभाषी क्षेत्रों में अंग्रेजी या कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा और गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों में हिंदी या अंग्रेजी पढ़ाने का सुझाव दिया था. कोठारी आयोग ने तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी और कोई अन्य भारतीय भाषा, जो पहली या दूसरी भाषा के रूप में शामिल न हो, पढ़ाने का प्रावधान करने की सलाह दी थी. तब देश को आजादी मिले बहुत दिन नहीं हुए थे. हालांकि हिंदी को लेकर तमिलनाडु में विरोध जारी था. इसके बावजूद तकरीबन पूरे देश ने इस त्रिभाषा फॉर्मूले को स्वीकार कर लिया. वर्ष 1968 में आयी पहली शिक्षा नीति में इसे शब्दश: अपना लिया गया. वर्ष 1986 में आयी नयी शिक्षा नीति में भी इस फॉर्मूले को जारी रखा गया.


इस फॉर्मूले को हिंदीभाषी क्षेत्रों में तो अपना लिया गया, पर तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों ने इसे नहीं अपनाया. वर्ष 2020 में आयी नयी शिक्षा नीति ने भी इसे अपना लिया है. इसके बाद से तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन ही नहीं, कर्नाटक की राजनीति के एक हिस्से ने भी इसे स्थानीय संस्कृति और भाषा की अस्मिता पर चोट बताने में देर नहीं लगायी है. सीबीएसइ के आदेश को नयी शिक्षा नीति, 2020 का कार्यान्वयन कहा जा सकता है, जिसके तहत पहली जुलाई से नौवीं कक्षा में तीन भाषाएं पढ़ायी जायेंगी, जिनमें दो भारतीय भाषाओं का होना अनिवार्य होगा. इस आदेश के अनुसार, यदि पहली भाषा अंग्रेजी है, तो दूसरी भाषा हिंदी या स्थानीय क्षेत्र विशेष की मातृभाषा होगी और तीसरी भाषा के रूप में संविधान की आठवीं अनुसूची की कोई भी भाषा चुनी जा सकेगी. इस कार्यान्वयन का उद्देश्य देश में बहुभाषिकता को बढ़ावा देना है. नयी शिक्षा नीति के तहत इस फॉर्मूले को राज्यों में भी लागू किया जाना है. कुछ राज्यों, मसलन महाराष्ट्र आदि ने इस दिशा में कदम उठाया तो सही, पर स्थानीय अस्मिता के कथित संरक्षकों के विरोध के कारण इस नीति में ढिलाई देनी पड़ी.

त्रिभाषा फॉर्मूले के विरोध में दक्षिण के राज्यों का आरोप रहा है कि उत्तर भारत के राज्यों में उनकी भाषाओं को सीखने के प्रति कभी उत्साह नहीं दिखा. उत्तर के राज्यों ने इस फॉर्मूले को अपनाया, लेकिन तीसरी भाषा के रूप में किसी अन्य भारतीय भाषा की बजाय संस्कृत को अपना लिया. इसका उद्देश्य एक तरह से भारतीय भाषाओं, विशेषकर दक्षिण की भाषाओं को किनारे करना था. सीबीएसइ के नये आदेश में इसकी गुंजाइश ही नहीं है. रही बात छात्रों पर दबाव बढ़ने की, तो यह सवाल फिजूल है. महानगरों के ज्यादातर पब्लिक स्कूलों में ग्यारहवीं-बारहवीं में हिंदी पढ़ने-पढ़ाने का विकल्प ही नहीं है. पर उनके यहां विदेशी भाषाओं को पढ़ाने की व्यवस्था जरूर है.


सीबीएसइ के नये आदेश के परिप्रेक्ष्य में उत्तर भारत के विद्यालयों को चाहिए कि वे अपने यहां तीसरी भाषा के रूप में दक्षिण की भाषाएं पढ़ने-पढ़ाने का विकल्प चुनने की कोशिश करें. इससे गैर हिंदीभाषी राजनीति को यह कहने का अवसर ही नहीं मिल सकेगा कि हिंदीभाषियों में उनकी भाषा को लेकर स्नेह नहीं है. मानवशास्त्री और समाज विज्ञानी मानते हैं कि किसी भी विविधरंगी संस्कृति को जोड़ने वाले धागों में भाषाओं का स्थान महत्वपूर्ण है. भाषाएं सिर्फ स्थान और क्षेत्र विशेष के संचार का जरिया ही नहीं होतीं, वे अपनी सभ्यता की ऐतिहासिक यात्रा और सांस्कृतिक रस-गंध की अभिव्यक्ति का जरिया भी होती हैं. भारत जैसे बहुलवादी देश में जब आधुनिक शिक्षा नहीं थी, तब भाषाएं ही वह तंतु थी, जिनसे उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम जुड़ता था. विद्वानों के बीच भौगोलिक दूरियों के बावजूद संचार का साधन संस्कृत जरूर रही, पर संचार के लिए अन्य भारतीय भाषाएं भी गंभीर भूमिका निभाती थीं. त्रिभाषा फॉर्मूले से पढ़कर निकले छात्र उसी भूमिका को आधुनिक तौर पर और आगे बढ़ायेंगे. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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