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ई-फार्मेसी पर विचार

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ई-फार्मेसी पर विचार

भारत समेत दुनिया में ऑनलाइन कारोबार तेजी से बढ़ रहा है और इससे अर्थव्यवस्था का विकास भी हो रहा है. ऐसे कारोबार में ई-फार्मेसी भी है, जिसके जरिये लोग अन्य चीजों की तरह घर बैठे दवाइयां मंगाते हैं. खबरों की मानें, तो हमारे देश में दवाओं के इस कारोबार पर पाबंदी लगायी जा सकती है. सरकारी सूत्रों के हवाले से समाचार एजेंसी पीटीआई ने बताया है कि स्वास्थ्य मंत्रालय डाटा की निजता व सुरक्षा, कदाचार और दवाओं की मनमानी बिक्री को लेकर जतायी जा रही चिंताओं पर विचार कर रहा है.

उल्लेखनीय है कि दवाओं, चिकित्सा उपकरण और सौंदर्य प्रसाधनों से जुड़े एक विधेयक के प्रारूप पर विभिन्न मंत्रालयों के बीच चर्चा हो रही है. इस प्रारूप में दवाओं की ऑनलाइन बिक्री के नियमन का प्रावधान भी है, जिसमें कहा गया है कि ऐसे कारोबार के लिए निर्धारित नियमों के तहत लाइसेंस लेना होगा. यह प्रस्ताव पारित होने के बाद 1940 के कानून की जगह लेगा, जिसमें बदलते समय के अनुसार संशोधन की जरूरत बहुत लंबे समय से महसूस की जा रही है. दवाओं की ऐसी बिक्री के संदर्भ में सबसे बड़ी चिंता रोगियों के डाटा की सुरक्षा से संबंधित है.

आम लोगों के विचार जानने के लिए विधेयक के प्रारूप को पिछले साल जुलाई में सार्वजनिक किया गया था. ई-फार्मेसी के नियमन की जरूरत इसलिए भी है कि कई बार लोग बिना डॉक्टर की सलाह के भी दवा खरीदते हैं, जिससे कई समस्याएं पैदा होती हैं. कुछ दवाओं का इस्तेमाल नशे के रूप में भी किया जाता है और उन्हें ऑनलाइन हासिल करना आसान होता है. पिछले महीने ही भारत के दवा महानियंत्रक ने ई-फार्मेसी के 20 कारोबारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है.

इन पर मौजूदा नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोप हैं. महानियंत्रक की ओर से मई और नवंबर 2019 में सभी राज्य सरकारों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन को समुचित कार्रवाई करने और नियमों का अनुपालन सुनिश्चित कराने को कहा था. ऐसा ही निर्देश इस वर्ष फरवरी के शुरू में भी भेजा गया है. अध्ययनों के मुताबिक, भारत में 2021 में ई-फार्मेसी का बाजार लगभग 345 मिलियन डॉलर था और भविष्य में इसके 40-45 प्रतिशत सालाना औसत से बढ़ाने का अनुमान है. संभावनाओं से भरे ऐसे बाजार पर पाबंदी लगाने या नियमन करने का कोई भी निर्णय गंभीर सोच-विचार के बाद ही लिया जाना चाहिए.

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