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अदालतों में बहस की समयसीमा तय होनी चाहिए

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अदालतों में बहस की समयसीमा तय होनी चाहिए
अदालतों में बहस की समयसीमा तय होनी चाहिए

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि बीमार व्यक्ति को मेडिकल इमरजेंसी के अनुसार जल्द इलाज मिलता है. उसी तरह अदालतों में वंचितों और गरीबों को सतत न्याय मिलने की प्रणाली बननी चाहिए. कई लोग भारत में जजों की संख्या बढ़ाकर मुकदमों के जल्द निपटारे का नुस्खा देते हैं. परंतु अदालती समय के सही इस्तेमाल से वर्तमान जजों की संख्या के माध्यम से भी न्यायिक व्यवस्था दुरुस्त हो सकती है. तीन वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कौल ने वकीलों की लंबी बहस के बढ़ते प्रचलन को रोकने के लिए सख्त चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि इंग्लैंड, अमेरिका और दुनिया के किसी भी प्रगतिशील देश में वकीलों को असीमित बहस की इजाजत नहीं मिलती है.

अमेरिका में आधे घंटे से ज्यादा बहस के लिए वकील को जजों से विशेष इजाजत लेनी पड़ती है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जजों को बताया कि जार्ज बुश और अल गोर के चुनाव मामले में 2000 में अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को बहस के लिए 45 मिनट का समय दिया था. न्यायिक पुनरावलोकन के बारे में 1803 में मलबरी बनाम मैडिसन का फैसला महज 24 पेज का था. समलैंगिकता को आपराधिक बनाने के लॉरेंस बनाम टेक्सास के मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 43 पेज का निर्णय दिया था. उसी विषय पर भारत में 2018 में नवतेज सिंह जौहर मामले में जजों ने 493 पेज का फैसला दिया था. अनेक चेतावनियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में सीनियर वकीलों की लंबी बहस का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है. लंबी बहस के कारण बड़े और जटिल फैसले आते हैं.

वर्ष 1973 में केशवानंद भारती के ऐतिहासिक मामले में 68 दिनों की सुनवाई के बाद 700 पेजों का फैसला आया था. वर्ष 2018 में निजता के अधिकार वाले पुट्टुस्वामी मामले में 1,448 पेज का फैसला आया था. अयोध्या विवाद में 40 दिनों की सुनवाई के बाद 2019 में 1,045 पेज का फैसला आया था. तमिलनाडु में विधेयकों को राज्यपाल की मंजूरी वाले दो जजों का फैसला 415 पेज का था. उसके खिलाफ अनुच्छेद-143 के तहत केंद्र सरकार के संदर्भ पर 10 दिन से ज्यादा सुनवाई के बाद 111 पेज का फैसला आया.

तीन वर्ष पहले जस्टिस संजय किशन कौल ने तीन पेज की सिनॉप्सिस देने का चलन शुरू किया था. सुप्रीम कोर्ट की नयी मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में उसे संस्थागत बनाने का प्रयास किया गया है. उसके अनुसार रेगुलर मामलों में सुनवाई के तीन दिन पहले पांच पेज की समरी नोट के साथ सुनवाई के एक दिन पहले वकीलों को बहस के अनुमानित समय का विवरण देना होगा. इसका प्रमुख उद्देश्य अदालतों का प्रभावी प्रबंधन, कार्य घंटों का समान वितरण, त्वरित न्याय एवं न्यायिक प्रशासन को सफल बनाना है. कोर्ट की इस पहल को सफल बनाने के लिए पांच पहलुओं को समझना जरूरी है.

पहला, सुप्रीम कोर्ट में मामलों की जल्द सुनवाई के लिए मेंशनिंग की व्यवस्था है. पूर्ववर्ती अनेक चीफ जस्टिस ने कहा था कि सीनियर वकीलों को अपने रुतबे का गलत इस्तेमाल करके वीआइपी और कॉरपोरेट मामलों की जल्द सुनवाई का आग्रह नहीं करना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट में वीआइपी सिंड्रोम खत्म करने के लिए नया सर्कुलर जारी हुआ है. संविधान के अनुसार, आम जनता को न्याय सुनिश्चित करने के लिए ऐसे प्रशासनिक आदेशों को सुप्रीम कोर्ट के नियमों में शामिल करने की जरूरत है. एसओपी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के नियमों में भी लिखित तौर पर बदलाव हो.

दूसरा, बीते वर्ष सुप्रीम कोर्ट में 1,400 फैसले हुए और मुकदमों की निस्तारण दर 87 फीसदी रही. इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में 92,000 मामले लंबित हैं. नयी एसओपी केवल नोटिस जारी होने के बाद होने वाली नियमित सुनवाई और रेगुलर मामलों में ही लागू होगी. मिसलेनियस, जमानत और अन्य मामलों में भी सीनियर वकीलों की बहस की समयसीमा निर्धारित करने की जरूरत है.

तीसरा, सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत है. कई जजों के अनुसार, संवैधानिक व्याख्या की बजाय जमानत, दहेज और मुकदमों के स्थानांतरण जैसे मामलों में सर्वोच्च अदालत का अधिकांश समय खराब होता है. इसके लिए जिला अदालतों और हाईकोर्ट की न्यायिक व्यवस्था को सशक्त बनाने की जरूरत है.

चौथा, अदालतों में लंबित कुल 5.41 करोड़ मामलों में जिला अदालतों में 4.76 करोड़ मामले हैं. उनमें से 3.65 करोड़ लंबित आपराधिक मामलों में भारी-भरकम आरोप पत्र और स्थगन का मर्ज बढ़ गया है. नये आपराधिक कानूनों के प्रावधानों को पुराने मामलों में भी लागू किया जाये, तो जिला अदालतों के लंबित मामलों का समयबद्ध निपटारा हो सकेगा.

पांचवां, सुप्रीम कोर्ट के जज एचआर खन्ना ने रिटायरमेंट के बाद 1985 में व्याख्यान देते हुए कहा था कि जजों को साहित्यिक उपमाओं और लंबे फैसलों से थीसिस लिखने की बजाय तर्क आधारित कानून सम्मत छोटे फैसले देने चाहिए. बहस के लिए वकीलों को निर्धारित समयसीमा का हर मामले में कड़ाई से पालन हो और तर्कसंगत छोटे फैसले लिखे जायें, तो न्यायिक अनुशासन बढ़ने के साथ लंबित मामलों के निपटारे और मुकदमेबाजी में भी कमी आ सकती है.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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