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Technology Impact: तकनीक सुविधा ही नहीं, जरूरी भी

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Technology Impact: तकनीक सुविधा ही नहीं, जरूरी भी

बहुत तेज गति से बदलाव हो रहे हैं. हाल यह है कि पुराने बदलाव समझ नहीं पाते कि नये आ जाते हैं. नयी-नयी चुनौतियां हैं. अध्यापकों से पूछो, तो बताते हैं कि बच्चे एसाइनमेंट लिख लाते हैं चैट जीपीटी की मदद से. गुरुजी को चैट जीपीटी बाद में समझ आती है, बच्चों को पहले आ गयी. चैट जीपीटी से होमवर्क हो जाता है. वही बच्चे बाद में इम्तहान में फेल हो जाते हैं. गुरुजी को बाद में समझ में आता है कि मूल मसला चैट जीपीटी का है. एसाइनमेंट चैट जीपीटी की मदद से लिखा जा सकता है, पर इम्तहान में चैट जीपीटी की इजाजत नहीं है. गुरुजी को बाद में समझ में आता है कि चूक कहां से हो रही है. अच्छा टीचर होने के लिए अब चैट जीपीटी समेत तमाम नयी तकनीकों का ज्ञान जरूरी है. उधर भूतपूर्व ट्विटर और वर्तमान ग्रोक पर भी ज्ञान बरस रहा है. बच्चे इधर से, उधर से नकल मार रहे हैं. अध्यापकों के सामने चुनौती है कि कैसे निपटें नये हालात से. कुल मिला कर अच्छी-खासी अनिश्चितता मची हुई है कई क्षेत्रों में.

इस नये माहौल में वे लोग बुरी तरह पिछड़ जायेंगे, जो तकनीक के प्रति जागरूक नहीं हैं. कई लोगों को लगता है कि यह अनिवार्य नहीं है कि हर तकनीक जानी-समझी जाए. कोई समझते हैं कि तकनीक थोड़ी अतिरिक्त सुविधा का मसला है. तकनीक आ जाए, तो सुविधा थोड़ी ज्यादा हो जायेगी, पर अब तकनीक सुविधा का नहीं, अनिवार्य समझ का मुद्दा है. हर पत्रकार, हर वकील को पता होना चाहिए कि नयी तकनीकों का क्या असर उनके काम पर पड़नेवाला है.

पुराने प्रोफेसर, पुराने पत्रकार, पुराने शोधकर्ता बता सकते हैं कि पहले उनके वक्त का बड़ा हिस्सा आंकड़े वगैरह के संग्रह में जाता था. अब बहुत आंकड़े ऑनलाइन मिल जाते हैं. आंकड़ों का प्राथमिक विश्लेषण भी तकनीक कर देती है. सवाल यह है कि हम ऐसा क्या कर रहे हैं, जो तकनीक नहीं कर सकती. जरा सोचिए, कुछ दशक पहले तक बैंकों में उस कर्मचारी की बहुत इज्जत होती थी, जो तेज गति से बड़े-बड़े कैलकुलेशन कर लेता था. अब तेज गति से कैलकुलेशन के कौशल की कोई कदर नहीं बची. कैलकुलेटर, कंप्यूटर बड़े से बड़ा कैलकुलेशन बहुत तेज गति से कर देते हैं. एक स्मार्टफोन के जरिये दिल का ईसीजी लिया जा सकता है. यानी तकनीक अब उन क्षेत्रों में जा चुकी है, जहां पहले उच्च स्तर के प्रशिक्षण की आवश्यकता थी. तकनीक अब बहुत कुछ कर सकती है, कर रही है. विदेशों में ड्राइवर विहीन वाहन चल रहे हैं, वाहन खुद को ही चला रहे हैं. ऐसे में, हरेक के लिए यह सवाल खास हो चला है कि हम ऐसा क्या कर रहे हैं, जो तकनीक नहीं कर सकती.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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