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फिल्म पाइरेसी पर रोक

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फिल्म पाइरेसी पर रोक

फिल्मों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया है. सिनेमैटोग्राफ संशोधन विधेयक में फिल्म प्रमाणन और फिल्म पाइरेसी को लेकर कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये हैं. दरअसल, सिनेमा मनोरंजन का एक सशक्त माध्यम है जिसका जनमानस पर गहरा असर पड़ता है. स्वाधीनता से पूर्व ऐसी फिल्मों की बड़ी ख्याति होती थी जिनमें देशभक्ति, सामाजिक कुरीतियों पर चोट करने वाली तथा एक आदर्श समाज की स्थापना के संदेश होते थे.

सिनेमा की इसी ताकत को समझते हुए आजादी के बाद यह विचार आया कि फिल्मों को भारतीय समाज की मर्यादाओं के दायरे में रहकर बनाया जाना चाहिए. इसी उद्देश्य से संसद ने 1952 में एक कानून बनाया, जिसका नाम सिनेमैटोग्राफ एक्ट था. इसी के तहत केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड का गठन किया गया और किसी भी फिल्म के लिए सिनेमाघरों या टीवी पर प्रदर्शन से पहले सेंसर बोर्ड की मंजूरी लेना जरूरी हो गया.

मगर बदलते समय के हिसाब से एक्ट में संशोधन की जरूरत महसूस की जा रही थी. भारत में अभी तक फिल्मों को चार तरह के सर्टिफिकेट दिये जाते हैं – यू, यू/ए, ए और एस. यू सर्टिफिकेट की फिल्मों पर कोई पाबंदी नहीं है. यू/ए फिल्में 12 साल से कम उम्र के बच्चे अपने माता-पिता की सहमति के बाद देख सकते हैं. ए फिल्में केवल वयस्कों के लिए तथा एस सर्टिफिकेट वाली फिल्में विशेष वर्ग के लोग देख सकते हैं, जैसे डॉक्टर, वैज्ञानिक आदि. संशोधित एक्ट में यू/ए कैटेगरी को 12 साल की जगह तीन आयु वर्गों में बांट दिया गया है – सात, 13 और 16 साल.

इसके अलावा, अब ए या एस फिल्मों के टीवी या किसी अन्य माध्यम पर प्रदर्शन के लिए अलग-अलग सर्टिफिकेट लेने होंगे. साथ ही, पहले जहां यह प्रमाणपत्र 10 वर्ष के लिए ही जारी होता था, वहीं अब यह प्रमाण पत्र हमेशा के लिए वैध माना जायेगा. नये एक्ट में फिल्म पाइरेसी की समस्या को लेकर अहम प्रावधान किया गया है. पाइरेसी, यानी फिल्मों के अनधिकृत प्रदर्शन पर रोक के लिए फिल्म जगत लंबे समय से मांग करता रहा है.

सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा है कि पाइरेसी से फिल्मोद्योग को हर साल 22 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है. संशोधित कानून में फिल्मों की अनधिकृत रिकॉर्डिंग के लिए तीन महीने से तीन साल तक की सजा, या फिल्म की लागत का पांच प्रतिशत जुर्माना, या एक साथ दोनों दंड देने का प्रावधान किया गया है. फिल्मों से जुड़े ये बदलाव समय की जरूरत हैं. फिल्मों के प्रदर्शन और उनके कारोबार की सुचारु व्यवस्था फिल्म जगत और समाज दोनों के हित में है.

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