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Home Opinion हमारी संवेदनशीलता को प्रभावित कर रहा है स्मार्टफोन

हमारी संवेदनशीलता को प्रभावित कर रहा है स्मार्टफोन

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हमारी संवेदनशीलता को प्रभावित कर रहा है स्मार्टफोन
स्मार्टफोन

Smartphones : उठते-बैठते, सोते-जागते दीवानगी की हद तक हमने जिसे अपना साथी बना लिया है, उस साथी को ‘फबिंग’ कहा जाता है. ‘फबिंग’ या ‘फोन स्नबिंग’, उन लोगों की बात सुनने के बजाय अपने फोन का इस्तेमाल करने की क्रिया है, जिनके साथ आप शारीरिक रूप से मौजूद हैं. यह आपके आसपास के लोगों के प्रति घोर अनादर और उदासीनता का प्रतीक है, और यह संकेत देता है कि सोशल मीडिया देखना या किसी और को मैसेज के जरिये जवाब देना आसपास के लोगों को देखने से ज्यादा जरूरी है. ‘फबिंग’ से भी अधिक अलगावकारी हैं वायरलेस ईयरफोन और आपके आसपास के लोगों से आपकी दूरी.


किसी कॉलेज परिसर में घूमते हुए, किसी सार्वजनिक वाहन में बैठे हुए या मेट्रो में सफर करते हुए हम अक्सर देखते हैं कि हर कोई अपनी छोटी-सी दुनिया में डूबा हुआ है. सामने या आसपास खड़े किसी व्यक्ति की तरफ देखने या उससे बातें करने की जरूरत भी नहीं समझते हैं अब लोग. माइकल बुल अपनी किताब ‘साउंड मूव्स’ में तर्क देते हैं कि ‘आइपॉड जैसे उपकरणों की बदौलत, शहरी जगहें कई मायनों में सार्वजनिक जगहें नहीं रह गयी हैं, वे खंडित और निजीकृत हो गयी हैं, हर व्यक्ति अपने-अपने दायरे में सिमट गया है.’ हमें नहीं भूलना चाहिए कि बातचीत ही वह माध्यम है, जिसके जरिये हम न केवल अपने विचार साझा करते हैं, बल्कि दूसरों के मन को भी समझते हैं.

यही वे क्षण होते हैं जब संवेदनशीलता, अपनापन और सच्चे संबंध जन्म लेते हैं. ये रिश्ते चाहे कुछ पल के लिए ही क्यों न बने हों, कभी न भूलने वाली स्मृतियां दे जाते हैं. अजनबियों से बातें करते हुए या उन्हें देखते हुए हम जाने-अनजाने वो सब कुछ सीख जाते हैं, जान जाते हैं, जो हमें एक परिपक्व और संवेदनशील मनुष्य बनाने में कारगर भूमिका निभाते हैं. यह दुखद है कि सामान्य से प्रतीत होने वाले इस स्मार्टफोन ने हमसे मानव होने की उस विशेषता को भी छीन लिया है, जहां हम केवल आंखों को देखकर किसी व्यक्ति के दुख, उल्लास, अकेलेपन को महसूस कर पाने की क्षमता रखते थे. ‘थे’ शब्द का प्रयोग इसलिए जरूरी हो जाता है कि स्मार्टफोन की स्क्रीन से हमारे नेत्र जब हटने को ही तैयार नहीं, तो हम अनुभूति के संसार को कैसे अपनायेंगे. इसी कारण आज हमारी अनुभूतियों का संसार सिकुड़ रहा है.


डिजिटल संस्कृति ने आज मानवीय संबंधों का ताना-बाना बदल दिया है. अब हम हर जगह बातचीत से बचने लगे हैं. शैरी टर्कल अपनी किताब ‘रीक्लेमिंग कन्वर्सेशन: द पावर ऑफ टॉक इन ए डिजिटल एज’ में कहती हैं कि ‘बातचीत से दूर भागना हमारे संबंधों, रचनात्मकता और उत्पादकता को कमजोर करता है. आमने-सामने की बातचीत को पुनः अपनाना हमें खोई हुई मानवीय गहराई वापस पाने में मदद कर सकता है.’ स्मार्टफोन की दुनिया हमें जादुई लगती है. पर एक महान जादू की तरह यह हमारा ध्यान अपनी ओर खींचकर काम करती है और हमें जादूगर के अलावा कुछ भी नहीं देखने देती. ये तकनीकें हमें खामोश कर रही हैं और यह खामोशी धीरे-धीरे हमारे भीतर की संवेदनशीलता, सहानुभूति और मानवता को खत्म कर रही है.

अध्ययनों से पता चलता है कि हम अपने फोन से जितना ज्यादा जुड़े रहते हैं, हमारे लिए उतनी ही गहराई से, ध्यान से और वैचारिक रूप से सोचना मुश्किल होता है. स्मार्टफोन ने बुनियादी मानवीय शालीनता को भी खत्म कर दिया है. समस्या इतनी ही भर नहीं है. दिसंबर 2021 के ‘जर्नल ऑफ एडोलसेंस’ में प्रकाशित शोध ‘वर्ल्डवाइड इंक्रीजेज इन एडोलसेंट लोनलीनेस’, में बताया गया है कि जैसे-जैसे स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ी, किशोरों का अकेलापन भी बढ़ता गया. वे एक-दूसरे संग कम समय बिताने लगे. इसी दौरान, किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के अन्य संकेतक भी प्रभावित होने लगे, अवसाद और आत्महत्या की दरें बढ़ने लगीं.


स्मार्टफोन एक बुरी आदत बनने के लिए नहीं बनाया गया था, लेकिन यह हमारी सबसे बुरी लतों में से एक बन गया है. एक और सत्य है जिसे शायद हम नहीं जानते, और वह यह है कि स्मार्टफोन ने हमें दूसरों से बात करने से तो रोक ही दिया है, इसके चलते हमने स्वयं से भी संवाद करना बंद कर दिया है. हमारे सपने, हमारी सोच, हमारी इच्छाएं, हमारी खुशियां, सब कुछ स्मार्टफोन में कैद होकर रह गयी हैं, अब हम अपने बारे में जानना ही नहीं चाहते, क्योंकि स्वयं को जानने के लिए कुछ देर अकेले रहना भी जरूरी है. यह मान कर चलिए कि यदि हमें हर पल अपने पास स्मार्टफोन चाहिए, तो एक दिन वह भी आयेगा, जब हम और भी अकेले हो जायेंगे. बातचीत केवल दूसरों से नहीं, बल्कि अपने आप से भी संवाद करने में मदद करती है और यही आत्मचिंतन हमारी विकास यात्रा की नींव बनती है, जो पूरे जीवन चलती रहती है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसे साथी बनाकर हम अपने हाथ में दिन-रात रखते हैं, वह किसी हार, हताशा, असहायता में हमारी पीठ थपथपाकर यह नहीं कहेगा कि ‘चिंता मत करो, सब कुछ ठीक हो जायेगा.’ अंत में, हम जो देते हैं, वही लौट कर हमारे पास आता है. हमने दूसरों को अपना समय, अपना स्नेह, ममत्व, अपनत्व देना बंद कर दिया है, तो स्वाभाविक है कि वह हमारे पास भी लौट कर नहीं आयेगा. 
 (ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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