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Home Opinion शटडाउन से अमेरिकी व्यवस्था की कमजोरी उजागर

शटडाउन से अमेरिकी व्यवस्था की कमजोरी उजागर

शटडाउन से अमेरिकी व्यवस्था की कमजोरी उजागर
डोनाल्ड ट्रंप

Shutdown in America : अमेरिकी सरकार का शटडाउन विगत एक अक्तूबर से चल रहा है और चार नवंबर को इसने 2018 के 35 दिनों के शटडाउन को पीछे छोड़ते हुए नया रिकॉर्ड बनाया है. अक्तूबर से अमेरिकी सरकार का कामकाज लगभग ठप हो गया है. लगभग 9,00,000 संघीय कर्मचारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया है, और अन्य 20 लाख को बिना वेतन के काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. केवल स्वास्थ्य सेवा, स्वास्थ्य सहायता और परिवहन सुरक्षा प्रशासन जैसी आवश्यक सेवाएं ही अपवाद हैं. अमेरिकी इतिहास में यह 11वां शटडाउन है. इससे पहले सबसे लंबा शटडाउन 2018-19 में हुआ था, जो ट्रंप के पिछले कार्यकाल में था, हालांकि वह पूर्ण सरकारी शटडाउन नहीं था. अगर ऐसा शटडाउन भारत में होता, तो दुनियाभर में, खासकर अमेरिका में, भारतीय संविधान और व्यवस्था की आलोचना करते हुए ढेरों लेख लिखे जाते. पर अमेरिका में हुई इतनी बड़ी घटना की बहुत कम रिपोर्टिंग हो रही है.


राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी से हैं. रिपब्लिकन द्वारा संचालित सदन ने एक वित्त पोषण विधेयक पारित किया, लेकिन सीनेट में इसे समर्थन नहीं मिला. डेमोक्रेटिक पार्टी का दावा है कि स्वास्थ्य बीमा सब्सिडी (खासकर अफोर्डेबल केयर एक्ट से संबंधित) बजट में शामिल नहीं हैं. इसके अलावा कांग्रेस ने शिकायत की है कि राष्ट्रपति प्रशासन बजट प्रक्रिया में कांग्रेस की शक्तियों का अतिक्रमण कर रहा है. कांग्रेस को डर है कि बिना शर्त बजट अनुमोदन से कांग्रेस की शक्तियों का हनन होगा. शटडाउन ने न केवल सरकारी कामकाज को ठप कर दिया है, बल्कि इससे चार करोड़ से ज्यादा लोगों के लिए खाद्य सहायता, खासकर पूरक पोषण सहायता कार्यक्रम (स्नैप) के बंद होने का भी खतरा पैदा हो गया है. कुछ विभागों ने सैन्यकर्मियों को वेतन सुनिश्चित करने के लिए निजी क्षेत्र से भी धन जुटाया है. हालांकि डेमोक्रेट्स अड़े नहीं हैं, उन्होंने अपनी मांग घटाकर केवल 20 अरब डॉलर कर दी है, जो उनकी पिछली मांग से काफी कम है, फिर भी समाधान दूर की कौड़ी है. मौजूदा मामले में संघर्ष सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं है, बल्कि रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद है.


अमेरिका में तीन नवंबर, 2026 को बड़े पैमाने पर चुनाव होने वाले हैं. इस मध्यावधि चुनाव में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और अमेरिकी सीनेट की 100 में से 35 सीटों के लिए चुनाव होंगे, जिससे 120वीं संयुक्त राज्य कांग्रेस का गठन होगा. उनतीस राज्य और क्षेत्रीय गवर्नर के चुनाव, साथ ही कई राज्य के और स्थानीय चुनाव भी लड़े जायेंगे. अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनाव वास्तव में सरकारी बंद के त्वरित या स्थायी समाधान में बाधा बन रहे हैं. अमेरिका में लगातार जारी बंद केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि अमेरिकी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था की गहरी संरचनात्मक और वैचारिक कमजोरियों का भी लक्षण है. इतना लंबा शटडाउन अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था के प्रतिस्पर्धी हितों, खासकर राजकोषीय विवेक और राजनीतिक लोकलुभावनवाद के बीच सामंजस्य बिठाने में असमर्थता को दर्शाता है. बजट को मंजूरी देने या ऋण सीमा बढ़ाने में विफलता एक खंडित लोकतंत्र को दर्शाती है, जो निहित स्वार्थों के हाथों बंधक बना हुआ है, जहां अल्पकालिक राजनीतिक लाभ दीर्घकालिक राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर भारी पड़ रहे हैं.

इस शटडाउन ने उजागर किया है कि कैसे अमेरिकी आर्थिक मॉडल लगातार उधार लेने का आदी हो गया है, और राजनीतिक नेता राजकोषीय अनुशासनहीनता के परिणामों का सामना करने को तैयार नहीं हैं. अमेरिकी नीति निर्माताओं के दोहरे मापदंड पूरी तरह उजागर हो गये हैं, क्योंकि अमेरिका आइएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से विकासशील देशों को राजकोषीय जिम्मेदारी का उपदेश देता है, लेकिन घरेलू स्तर पर इसका पालन करने में बुरी तरह विफल रहता है. शटडाउन और बार-बार ऋण सीमा संकट अमेरिकी वित्तीय प्रणाली में वैश्विक विश्वास को कमजोर कर रहे हैं. यह दुनिया में डॉलर-विमुद्रीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा दे रहा है और भारत में अस्थिर पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर निर्भर रहने के बजाय आत्मनिर्भर वित्तीय तंत्र बनाने के विश्वास को मजबूत कर रहा है. शटडाउन उपभोग आधारित आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है, जो लोगों की तुलना में बाजारों को प्राथमिकता देता है. बिना वेतन वाले सरकारी कर्मचारी, सेवाओं में देरी और सामाजिक असुरक्षा स्पष्ट रूप से इस नव उदारवाद की विफलता का संकेतक है.


पश्चिमी मीडिया और खासकर अमेरिका भारतीय संस्थानों को कमजोर दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता. शटडाउन उस कहानी को ध्वस्त कर रहा है, क्योंकि पश्चिमी आर्थिक प्रणाली की तुलना में भारत में कहीं बेहतर संस्थागत स्थिरता है. अमेरिका में शटडाउन उभरती अर्थव्यवस्थाओं, खासकर भारत के लिए आत्मनिर्भरता, संतुलित व्यापार और सहकारी संघवाद पर आधारित नये वैश्विक आर्थिक नेतृत्व को स्थापित करने का एक अवसर है. जब पश्चिम अपने विरोधाभासों के बोझ तले लड़खड़ाता है, तब भारत को अपने मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए, पश्चिम के उधार लिये गये मॉडलों के आधार पर नहीं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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