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बढ़ेगी हथियारों की होड़

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बढ़ेगी हथियारों की होड़
बराक ओबामा और दिमित्री मेदवेदेव

Russia America: युद्धों और उथल-पुथल भरी दुनिया में अमेरिका और रूस के बीच हथियारों की संख्या सीमित रखने वाली न्यू स्टार्ट संधि का खत्म होना चिंताजनक है. इसके साथ दुनिया में परमाणु हथियारों को सीमित करने वाला आखिरी बड़ा समझौता समाप्त हो गया. वर्ष 2003 में इन दो महाशक्तियों ने स्ट्रेटेजिक ऑफेंसिव रिडक्शन्स ट्रिटी (एसओआरटी) पर दस्तखत किये थे, जिसे मॉस्को संधि के नाम से भी जाना जाता था. वर्ष 2010 में इसकी जगह न्यू स्ट्राट ट्रिटी ने ली. अमेरिका और रूस के तत्कालीन राष्ट्रपतियों बराक ओबामा और दिमित्री मेदवेदेव ने उस पर हस्ताक्षर किये थे. इस संधि के तहत दोनों देशों को अधिकतम 1,550 तैनात परमाणु वॉरहेड और 700 मिसाइलें, बॉम्बर्स और परमाणु पनडुब्बियां जैसी डिलीवरी सिस्टम रखने की अनुमति थी. पारदर्शिता बनाये रखने के लिए संधि में एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों के निरीक्षण और सत्यापन के नियम भी शामिल थे.

इसका मकसद परमाणु हथियारों की होड़ रोकना और वैश्विक स्थिरता बनाये रखना था. पर कोविड-19 के दौरान निरीक्षण और सत्यापन की प्रक्रिया ठप पड़ गई थी. फिर यूक्रेन युद्ध ने अमेरिका-रूस के रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया. वर्ष 2023 में रूस ने यह कहते हुए संधि में अपनी भागीदारी खत्म कर दी कि अमेरिका यूक्रेन का समर्थन कर रहा है, इसलिए यह समझौता उसके हितों के खिलाफ है.

वहीं अमेरिका इस संधि को पुराना मानता था, क्योंकि चीन तेजी से अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ा रहा है. ऐसे में, इस संधि की मियाद खत्म होने तक तो नियमों का पालन किया गया, पर इससे आगे कोई नया समझौता नहीं हो सका. संयुक्त राष्ट्र और हथियार नियंत्रण से जुड़े विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि संधि खत्म होने से वैश्विक सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है और दुनियाभर में हथियारों की होड़ बढ़ सकती है. हथियारों की यह दौड़ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी बोझ डालेगी, क्योंकि परमाणु हथियार विकसित और तैनात करने में अरबों डॉलर खर्च होते हैं.

संधि खत्म होने से दोनों देश एक-दूसरे की परमाणु गतिविधियों पर पहले जैसी नजर नहीं रख पाएंगे. इससे तनाव बढ़ सकता है और हथियार नियंत्रण व्यवस्था कमजोर होने से परमाणु युद्ध का खतरा बढ़ सकता है. इसका असर दूसरे परमाणु देशों पर भी पड़ेगा. भारत, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशों के लिए यह संकेत हो सकता है कि अगर बड़ी ताकतें हथियार बढ़ा रही हैं, तो वे भी ऐसा करें. इसके अलावा ज्यादा परमाणु हथियारों का मतलब पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा है.

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