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Home Opinion सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन में वृद्धि की आस

सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन में वृद्धि की आस

सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन में वृद्धि की आस
ईपीएफओ

Retired-Employees-Pension : अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों में सरकारें सामाजिक सुरक्षा पर काफी खर्च करती हैं, जिसका नतीजा होता है कि नागरिकों का बुढ़ापा अच्छे से कट जाता है. भारत में सामाजिक सुरक्षा एक मिश्रित व्यवस्था है, जिसमें कर्मचारी या अन्य अपनी ओर से योगदान करते हैं तथा सरकार भी उसमें अपनी ओर से योगदान करती है. इससे एक बड़ी रकम उनकी वृद्धावस्था में उन्हें नियमित रूप से मिलती रहती है. लेकिन कुछ ऐसे भी प्रावधान हैं जिनमें कर्मचारी नौकरी के दौरान अपनी ओर से योगदान करता रहता है, लेकिन सरकार की ओर से उसे कोई योगदान नहीं मिलता है. इसका नतीजा होता है कि पेंशन के रूप में दी जाने वाली राशि बहुत कम या नगण्य होती है.


ऐसी ही एक पेंशन योजना चर्चा और कर्मचारियों द्वारा आलोचना का विषय है. वर्ष 1995 में कई निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए ऐसी ही एक योजना शुरू की गयी थी, जिसे इपीएफ 95 का नाम दिया गया था. इसमें कर्मचारी अपनी नौकरी के दौरान योगदान करते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें एक निश्चित राशि, जो बहुत ही कम है, हर महीने दी जाती है. इसे लेकर काफी आंदोलन हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया. बाद में केंद्र सरकार ने इसकी न्यूनतम राशि बढ़ाकर 1,000 रुपये महीना कर दी. पर यह राशि भी काफी कम थी और कर्मचारी अपने-अपने स्तर पर इसे बढ़ाने के लिए आवाज उठाते रहे.

अब संसद की श्रम एवं रोजगार समिति ने कहा है कि इपीएफ 95 स्कीम के तहत 1,000 रुपये की न्यूनतम पेंशन राशि अपर्याप्त है और इसे सम्मानजनक स्तर तक बढ़ाने की जरूरत है. यहां यह बताना भी जरूरी है कि विभिन्न राज्यों में वृद्धावस्था पेंशन हर महीने कम से कम 2,000 रुपये है. दिल्ली में यह राशि 2,500 रुपये तक है और हरियाणा में यह 3,200 रुपये प्रतिमाह है. इसी तरह, विधवा पेंशन की राशि दिल्ली में 2,500 रुपये प्रतिमाह है और ये सभी लाभार्थियों के योगदान के बिना मिलती हैं. सरकार ही इनका सारा खर्च उठाती है. इसी तरह, महिलाओं के लिए बनी सम्मान योजनाओं में, जिन्हें कई नामों से बुलाया जाता है, इसी तरह की राशि हर महीने दी जाती है. ऐसे में, सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ ऐसा व्यवहार आश्चर्यजनक है.


श्रम, वस्त्र एवं कौशल विकास से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की ‘अनुदान मांगों (2026-27)’ पर अपनी 15वीं रिपोर्ट में कहा है कि महंगाई बढ़ने के बावजूद कर्मचारी पेंशन योजना के तहत न्यूनतम पेंशन 1,000 रुपये प्रतिमाह काफी समय से अपरिवर्तित है. समिति ने साक्ष्यों पर गौर करने के दौरान पाया कि पेंशनधारकों, विशेषकर वृद्ध और आर्थिक रूप से कमजोर लाभार्थियों को होने वाली वित्तीय कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम पेंशन में वृद्धि की मांग के साथ अनेक प्रतिवेदन प्राप्त हुए हैं. समिति ने श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के इस प्रतिवेदन पर भी गौर किया है कि भारत सरकार इस योजना के लिए पहले से ही वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है. इसके तहत कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के वर्तमान में कार्यरत सदस्यों के लिए 1.16 प्रतिशत का योगदान और 1,000 रुपये प्रतिमाह की न्यूनतम पेंशन सुनिश्चित करने के लिए प्रदान की गयी बजटीय सहायता शामिल है. संसदीय समिति ने मांग की है कि मंत्रालय कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 के तहत न्यूनतम पेंशन की तत्काल और व्यापक समीक्षा करे. समिति का यह भी सुझाव है कि मंत्रालय योजना के लिए बजटीय सहायता बढ़ाने की संभावना तलाशे, ताकि पेंशनधारकों को वर्तमान जीवन यापन लागत के अनुरूप उचित न्यूनतम पेंशन प्राप्त हो सके और योजना के अंतर्गत आने वाले लाखों सेवानिवृत्त श्रमिकों को अधिक सामाजिक सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता प्रदान की जा सके.


रिपोर्ट के अनुसार, यह देखा गया है कि अनुबंध पर काम करने वाले अनेक श्रमिक नियमित श्रमिकों के समान कार्य करते हैं, लेकिन कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं के बाद राहत और मुआवजा प्राप्त करने में अक्सर देरी का सामना करते हैं. इसे देखते हुए समिति ने सिफारिश की है कि ऐसे श्रमिकों के लिए कर्मचारी राज्य बीमा और कर्मचारी भविष्य निधि जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत समय पर ‘कवरेज’ सुनिश्चित की जाये. समिति ने केंद्र और राज्य सरकारों से अनुपालन की निगरानी और मुआवजे का शीघ्र वितरण सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था स्थापित करने को भी कहा है. वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि काफी समय पहले भारत सरकार के श्रम सचिव ने इसे बढ़ाकर न्यूनतम 2,000 रुपये करने की सिफारिश की थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

इसी तरह, कोश्यारी समिति ने भी 2013 में इसे 3,000 रुपये करने तथा महंगाई के अनुरूप इसे समायोजित करने की अनुशंसा की थी, लेकिन वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति रही. उनका कहना था कि पेंशन फंड में दस लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त जमा हैं और इस पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का खर्च नहीं आयेगा, जबकि इपीएफओ दावा कर रहा है कि इस मद में लाखों करोड़ रुपये खर्च होंगे. उसका यह भी कहना है कि यह सरकार के बजटीय सहयोग के बिना संभव नहीं है. अब मामला केंद्र सरकार के पाले में है, जो इस पर फैसला करेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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