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हिंदी पत्रकारिता और साहित्य का संबंध

हिंदी पत्रकारिता और साहित्य का संबंध

हिंदी की पत्रकारिता और उसके साहित्य का संबंध इतना अन्योन्याश्रित रहा है कि पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित संपादक को सार्वजनिक रूप से यह स्वीकारने में संकोच नहीं हुआ कि इस पत्रकारिता के पास तोप से लड़ने का हौसला साहित्य की मार्फत ही आया. गोरी सत्ता के दौर में मशहूर उर्दू साहित्यकार अकबर इलाहाबादी ने लिखा था- ‘खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो.’

नेपोलियन बोनापार्ट ने भी कहा था कि चार विरोधी अखबारों की मारक क्षमता के आगे हजारों बंदूकों की ताकत बेकार हो जाती है. मैथ्यू आर्नल्ड की मानें, तो पत्रकारिता जल्दी में लिखा गया साहित्य ही है क्योंकि जैसे भावों का भरोसा साहित्य हुआ करता है, तथ्यों का भरोसा पत्रकारिता हुआ करती है. विद्वानों के अनुसार, पश्चिम में पत्रकारिता जरूर आधुनिक विधा के रूप में सामने आयी, लेकिन हिंदी में शुरू से ही मसिजीविता उसका अभिन्न अंग रही. एक वक्त हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के प्रायः सारे संपादक या तो साहित्यकार हुआ करते थे या हिंदी भाषा के बड़े ज्ञाता.

आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी समेत कई नेताओं ने भी पत्रकारिता व संपादन कर्म को अपना हथियार बनाया, लेकिन वह साहित्य व पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतिभाओं की निर्बाध व स्वाभाविक आवाजाही से अलग मामला था. इस आवाजाही की मिसालों पर जायें, तो जिन भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह व भारतीय नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है, उन्होंने अपने बहुआयामी कृतित्व से साहित्य के साथ पत्रकारिता को भी समृद्ध किया ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’, ‘कविवचनसुधा’ और ‘बाल बोधिनी’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर.

महावीर प्रसाद द्विवेदी (जिनके नाम पर हिंदी साहित्य में 1900 से 1920 तक की अवधि का नाम ही ‘द्विवेदी युग’ रख दिया गया) ‘सरस्वती’ के संपादक बने, तो उन्होंने अपनी मेहनत से उसे तत्कालीन हिंदी पत्रकारिता का सबसे सम्मानित नाम बना दिया. उनका यह काम इस मायने में भी बहुत महत्वपूर्ण था कि तब भाषा के तौर पर हिंदी का विकास भी बाल्यावस्था में ही था.

उनके साथ सहायक संपादक रहे गणेश शंकर विद्यार्थी ने जेल में रहते हुए विक्टर ह्यूगो के दो उपन्यासों- ‘ला मिजरेबिल्स’ और ‘नाइंटी थ्री’ का हिंदी में अनुवाद कर डाला था. विद्यार्थी ने 1913 में संस्थापक संपादक के रूप में कानपुर से ‘प्रताप’ का प्रकाशन शुरू किया, तो गोरी सत्ता का भरपूर कोप झेलकर भी विचलित नहीं हुए.

माखनलाल चतुर्वेदी भी एक साथ साहित्यकार और पत्रकार थे. ‘प्रभा’ व ‘कर्मवीर’ जैसे पत्रों का संपादन करते हुए उन्होंने नयी पीढ़ी से गुलामी की जंजीरें तोड़ डालने का आह्वान किया, तो ब्रिटिश साम्राज्य के कोपभाजन बने. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भी, जिन्होंने स्वतंत्रता के पूर्व विद्रोही कवि और बाद में राष्ट्रकवि के तौर पर ख्याति पायी, कवि ही नहीं, निर्भीक पत्रकार भी थे. प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के साक्षात्कार से जुड़ा विवाद अरसे तक चर्चित रहा था.

हिंदी की स्वच्छंदतावादी कविता धारा का प्रतिनिधि स्वर माने जाने वाले बालकृष्ण शर्मा नवीन जीवन भर पत्रकारिता के संसार से जुड़े रहे. सत्तर के दशक में हिंदी की महत्वाकांक्षी समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ का प्रकाशन आरंभ हुआ, तो उसके संस्थापक संपादक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ भी साहित्य के देश के ही नागरिक थे. उस समय इस पत्रिका के प्रायः सारे महत्वपूर्ण पदों पर हिंदी साहित्यकारों का कब्जा था.

अज्ञेय के बाद संपादक बने रघुवीर सहाय भी साहित्यकार ही थे. कवि श्रीकांत वर्मा विशेष संवाददाता और ‘कुआनो का कवि’ कहलाने वाले सर्वेश्वरदयाल सक्सेना उप मुख्य संपादक हुआ करते थे. वहां इनके अलावा प्रयाग शुक्ल, विनोद भारद्वाज और मनोहर श्याम जोशी भी थे.

उसी दौर में धर्मवीर भारती ‘धर्मयुग’ के संपादक बने, तो उनके खाते में इतना यश आया कि तय करना मुश्किल हो गया कि वे पहले संपादक हैं या ‘गुनाहों का देवता’ जैसे उपन्यास के लेखक, कवि और नाटककार. यहां राजेंद्र माथुर का नाम न लेना अनैतिक होगा, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी कलम से वैसे ही चमत्कार किये, जैसे उस्ताद बिस्मिल्ला खां ने अपनी शहनाई से. लेकिन आज न सिर्फ साहित्य व पत्रकारिता के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है, बल्कि उन्हें एक दूजे का विलोम माना जाने लगा है.

कई मीडिया संस्थानों में साहित्यकारों का ‘अकाल’ है. क्या आश्चर्य कि हिंदी पत्रकारिता- प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल- सब में साहित्य की जगहें सिकुड़ती जा रही हैं. कई पत्रकार निजी बातचीत में साहित्यकारों को कुछ इस तरह ‘साहित्यकार है’ कहते हैं, जैसे उसका साहित्यकार होना कोई विडंबना हो. साहित्यकारों को किसी सामग्री को सतही बताना होता है, तो कहते हैं कि वह ‘पत्रकारीय’ है. वे ‘पत्रकारीय लेखन’ को दोयम दर्जे का काम मानते हैं, सो अलग. इससे हिंदी साहित्य और पत्रकारिता दोनों का नुकसान हो रहा है, लेकिन कोई मुंह नहीं खोलता.

साहित्यकार अशोक वाजपेयी के इस कथन के मार्फत जवाब तक पहुंचा जा सकता है कि ‘साहित्य अकेला और निहत्था हो गया है: उसे बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान के अन्य क्षेत्रों से समर्थन और सहचारिता नहीं मिल पा रहे हैं.’ निस्संदेह, साहित्य के बगैर पत्रकारिता निहत्थी भले न हुई हो, अकेली तो वह भी हो गयी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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