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Home Opinion आर्थिक चुनौती के समय जरूरी सुधार

आर्थिक चुनौती के समय जरूरी सुधार

आर्थिक चुनौती के समय जरूरी सुधार
भारतीय रिजर्व बैंक

economic challenge : बेशक भारतीय अर्थव्यवस्था ने 2026 की जनवरी-मार्च तिमाही में 7.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की और पूरे वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही. फिर भी भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने नवीनतम अनुमानों में 2026-27 के लिए जीडीपी वृद्धि दर को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है. एक स्तर पर यह अपेक्षित था. होर्मुज जलडमरूमध्य में गतिरोध बना हुआ है और युद्ध के समाधान की कोई संभावना नहीं दिख रही.

नतीजतन वैश्विक आपूर्ति शृंखला, खासकर तेल, गैस और ऊर्जा क्षेत्रों में गंभीर व्यवधान उत्पन्न हुआ है, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. थोक मूल्य सूचकांक में वृद्धि हो रही है, जिसका मुख्य कारण तेल, गैस की बढ़ती कीमतें हैं. आगे यह मुद्रास्फीति उपभोक्ता या खुदरा क्षेत्र तक भी फैल सकती है. कमजोर व्यावसायिक माहौल का असर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश के शेयर तथा अन्य वित्तीय बाजारों से बाहर निकलने के रूप में दिखाई दे रहा है. रुपये में गिरावट स्थिति को और जटिल बना रही है.


रिजर्व बैंक ने कर छूट से लेकर निःशुल्क हेजिंग तक कई नये उपायों की जो अब घोषणा की है, इनका मुख्य उद्देश्य विदेशी पूंजी के लिए भारतीय जमा योजनाओं और बॉन्डों को अधिक आकर्षक बनाना है. अर्थव्यवस्था को पूंजी की जरूरत है. साथ ही, इन उपायों से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों में रुपये को स्थिरता और मजबूती मिलने की उम्मीद है. भारत के पास पर्याप्त नीतिगत गुंजाइश, संस्थागत विश्वसनीयता और व्यापक आर्थिक सुरक्षा कवच मौजूद हैं. सही रणनीति घबराने की नहीं, बल्कि स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए. ऊर्जा सुरक्षा, मूल्य अनुशासन, बाहरी वित्तपोषण और विकासोन्मुख सुधारों को जारी रखना जरूरी है.

वर्तमान व्यवधान एक बाहरी झटका है. इसमें ऊर्जा लागत में वृद्धि, शिपिंग परिस्थितियों का कठिन होना, पूंजी प्रवाह में कमी और रुपये पर बढ़ता दबाव शामिल है. ऐसे समय में मुख्य उद्देश्य झटके के असर को मुद्रास्फीति, व्यापार और वित्तीय बाजारों तक नियंत्रित रूप से पहुंचने देना होना चाहिए. भारत की हालिया नीतिगत प्रतिक्रियाएं, खासकर पूंजी आकर्षित करने और बाजारों में व्यवस्था बनाये रखने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा उठाये गये कदम इसी का संकेत देते हैं. ऊर्जा स्थिरता सबसे जरूरी है, क्योंकि तेल वह पहला माध्यम है, जिसके द्वारा यह झटका अर्थव्यवस्था में प्रवेश करता है. इसलिए नीति निर्माताओं को रणनीतिक भंडार बढ़ाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने और जरूरत पड़ने पर ईंधन मूल्यों में चरणबद्ध समायोजन जारी रखना चाहिए. उचित मूल्य वृद्धि ऊर्जा दक्षता को प्रोत्साहित करती है और समय के साथ अपव्यय को कम करती है.

एक व्यावहारिक उदाहरण यह हो सकता है कि रणनीतिक भंडार बढ़ाने के साथ परिवहन और औद्योगिक ईंधन दक्षता उपायों को भी मजबूत किया जाये, ताकि अर्थव्यवस्था केवल ऊंची कीमतों के माध्यम से नहीं, कम खपत के माध्यम से भी झटके को सहन कर सके. मुद्रास्फीति पर नियंत्रण जरूरी है. जब आयातित ऊर्जा की कीमतें बढ़ती हैं, तब उनका प्रभाव माल ढुलाई, खाद्य पदार्थों, उर्वरकों और निर्मित वस्तुओं तक फैल सकता है. इसलिए लॉजिस्टिक्स, भंडारण प्रबंधन और चुनिंदा आपूर्ति-पक्षीय राहत उपायों पर समय रहते कार्रवाई महत्वपूर्ण हो जाती है. मुद्रास्फीति और विकास पर निकट निगरानी रखते हुए रिजर्व बैंक की वर्तमान नीति इसी दृष्टिकोण के अनुरूप है.


नीति निर्माता आपूर्ति शृंखला में गैर-ऊर्जा लागतों को कम करने के लिए बंदरगाहों पर देरी घटाने, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं को तेज करने और देश के भीतर माल परिवहन में बाधाओं को कम करने पर भी कार्य कर सकते हैं. कमजोर रुपया हमेशा आर्थिक कमजोरी का संकेत नहीं होता. वैश्विक झटकों के समय कुछ समायोजन स्वाभाविक है. मुख्य उद्देश्य अव्यवस्थित उतार-चढ़ाव को रोकना होना चाहिए. रिजर्व बैंक संकेत दे चुका है कि वह किसी निश्चित विनिमय दर को लक्ष्य बनाये बिना अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप करेगा. हालिया पैकेज के तहत दीर्घकालिक सरकारी प्रतिभूतियों तक पहुंच बढ़ाई गयी है, कुछ विदेशी पोर्टफोलियो निवेश प्रतिबंधों में ढील दी गयी है. इन उपायों से पूंजी प्रवाह और बाजार की गहराई बढ़ सकती है. सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर विदेशी निवेशकों को कर राहत प्रदान करने का सरकारी निर्णय भी भारतीय ऋण बाजार को अधिक आकर्षक बनाता है.

सामूहिक रूप से ये कदम भुगतान संतुलन को स्थिर करने, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने और रुपये आधारित परिसंपत्तियों में विश्वास बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. यदि बाहरी वातावरण कमजोर बना रहता है, तो विकास को घरेलू मांग, स्थिर निवेश और निर्यात की मजबूती से समर्थन देना होगा. सबसे प्रभावी रणनीति सार्वजनिक पूंजीगत व्यय को जारी रखना है, खासकर लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा अवसंरचना, रेल, बंदरगाह और भंडारण क्षेत्रों में. ये निवेश न केवल भविष्य की कमजोरियों को कम करते हैं, बल्कि अल्पकालिक मंदी के जोखिम को भी घटाते हैं. निर्यात विविधीकरण तेज करना, मजबूत बाजारों के साथ संबंध गहरे करना और उन क्षेत्रों को समर्थन देना जिनमें घरेलू मूल्य संवर्धन अधिक है, भी लाभदायक होगा. यह तब उपयोगी है, जब व्यापार मार्ग और शिपिंग लागत अनिश्चित हो जायें, जैसा होर्मुज के व्यवधान में देखा जा रहा है.


नीति निर्माता स्पष्ट संवाद, पूर्वानुमेय नियमों और निरंतर सुधारवादी दृष्टिकोण के माध्यम से निवेशकों का विश्वास मजबूत कर सकते हैं. इससे यह संदेश जायेगा कि भारत एक खुली, स्थिर और निवेश योग्य अर्थव्यवस्था बना हुआ है. ऋण बाजार तक पहुंच, दीर्घकालिक प्रतिभूतियों और विदेशी निवेशकों की आसान भागीदारी से संबंधित हालिया नीतिगत पैकेज इसी सोच का उदाहरण है. आने वाली कुछ तिमाहियों के लिए रणनीति तीन स्तरों पर आधारित होनी चाहिए. पहला, ऊर्जा सुरक्षा, भंडार और बाजार प्रबंधन के माध्यम से झटके को अवशोषित करना. दूसरा, आपूर्ति-पक्षीय दक्षता और लक्षित सहायता के माध्यम से मुद्रास्फीति के प्रभाव को सीमित करना. तीसरा, निवेश, निर्यात और पूंजी बाजार सुधारों के माध्यम से विकास की गति को पुनः मजबूत करना. भारत ने अतीत के वैश्विक संकटों में दिखाया है कि संस्थागत समन्वय से समर्थित संतुलित नीतियां व्यापक आर्थिक स्थिरता की रक्षा करते हुए विकास की राह को बनाये रख सकती हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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