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बाबासाहेब को पढ़ें, जपें नहीं

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बाबासाहेब को पढ़ें, जपें नहीं

डॉ रतन लालप्राध्यापक

दिल्ली विश्वविद्यालय

lalratan72@gmail.com

आधुनिक भारत के अग्रणी निर्माताओं में शुमार बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के विचारों और संदेशों की प्रासंगिकता निरंतर बढ़ती जा रही है. दुर्भाग्य से उन्हें पढ़ने और गुनने की जगह उनके नाम के जपने की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है, जो कि उनकी शिक्षा और राजनीति के विपरीत है. उन्होंने संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए बहुत से मसलों पर व्यापक स्तर पर लिखा और बोला है. उनके विचार वर्तमान और भविष्य की समस्याओं के समाधान के लिए कुंजी हैं. उदाहरण के लिए, बाबासाहेब का एक संबोधन विचारणीय है, जो 24-25 अप्रैल, 1948 को संयुक्त प्रांत के शिड्यूल कास्ट फेडरेशन की पांचवीं बैठक में लखनऊ में दिया था. डॉ आंबेडकर ने 25 अप्रैल को सम्मेलन को संबोधित किया था. उनके इस भाषण को मूलतः तीन प्रश्नों के इर्द-गिर्द पढ़ा व समझा जा सकता है- कैबिनेट मिशन के जाने के बाद वे क्यों चुप रहें? वे कांग्रेस सरकार में क्यों शामिल हुए? और, भविष्य के बारे में उनके सुझाव क्या हैं?

पहले प्रश्न के स्पष्टीकरण उन्होंने कहा कि फेडरेशन राजनीतिक सुरक्षा चाहती थी, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण पृथक निर्वाचन का मुद्दा था. लेकिन इस मांग को कैबिनेट मिशन ने अस्वीकार कर दिया और सिर्फ हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों को ही सत्ता हस्तांतरण के लिए चिह्नित किया. उन्होंने बताया कि संगठन की असफलता के दो मुख्य कारण थे- पहला, मुस्लिम और सिख समुदाय की तुलना में वह एक कमजोर दल था, और दूसरा, उनका आंदोलन खुद पांच धड़ों में बंटा हुआ था. ऐसी स्थिति में बगैर राजनीतिक संरक्षण के अनुसूचित जातियों के हितों की सुरक्षा असंभव थी. उन्होंने कहा कि उनके सामने पूर्ण रूप से अंधेरा था, इसलिए वे चुप रहे. यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पूना पैक्ट के बाद कैबिनेट मिशन के आने तक पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग उठती रही थी. दूसरे प्रश्न का उत्तर पहले प्रश्न और उसके उत्तर से जुड़ा हुआ है- कैबिनेट मिशन द्वारा झटका दिया जाना और आपसी विखंडन. सरकार में शामिल होने के दो कारण थे- पहला, यह बिना शर्त था और दूसरा सरकार से बाहर रहने की अपेक्षा अंदर रह कर ही अनुसूचित जातियों के हितों की रक्षा की जा सकती थी. उन्होंने कहा, ‘मैं कांग्रेस के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि कांग्रेस के निमंत्रण पर सरकार में शामिल हुआ. किसी भी समय मैं सरकार छोड़ सकता हूं.’

उन्होंने इस बात पर बल दिया कि हर समय लड़ते रहना रणनीतिक रूप से ठीक नहीं है और अन्य विकल्पों को भी तलाशना पड़ता है. बाबासाहेब ने स्पष्ट कहा था, ‘यह सत्य है कि मैं कांग्रेस का विरोधी और आलोचक रहा हूं. लेकिन साथ-साथ मैं विरोध के लिए विरोध के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता. सहयोग की भावना भी होनी चाहिए, जिससे हम कुछ प्राप्त कर सकें. यदि हमें सब कुछ नहीं मिला, तो बहुत कुछ जरूर मिला. इस संदर्भ से समझा जाना चाहिए कि शुद्धतावाद और जटिलता से घर नहीं चल सकता, सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन तो दूर की बात है. राजनीतिक विकल्प के प्रश्न पर विश्लेषण करते हुए बाबासाहेब ने कहा था कि सामाजिक प्रगति की कुंजी राजनीतिक शक्ति है और राजनीतिक शक्ति के रूप में संगठित हुए बगैर अनुसूचित जाति की मुक्ति संभव नहीं है.

लोकशाही और तानाशाही पर बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘लोकशाही में विपक्षी दल का होना जरूरी है, अन्यथा सरकार तानाशाह हो जाती है.’ उस सम्मेलन में 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के सरकारी निर्णय के विरुद्ध प्रस्ताव पारित हुआ था. इस मामले का उल्लेख करते हुए भी बाबासाहेब ने संगठित होने का आह्वान किया था, ताकि अपने अधिकारों को सुनिश्चित किया जा सके. उस सम्मलेन में पिछड़े वर्ग के नेता भी मौजूद थे. उनके आग्रह पर अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्ग की एकता के प्रश्न पर बोलते हुए बाबासाहेब ने कहा था, यह दुखद है कि इन दोनों वर्गों के हित साझा हैं, फिर भी वे संगठित नहीं हो रहे हैं. संयुक्त मोर्चा बनाने का यह आह्वान मौजूदा भारतीय राजनीति के लिए बहुत प्रासंगिक है.सरकारों, पार्टियों और संगठनों द्वारा बाबासाहेब का बस नाम लेने और उनके विचारों को किनारे कर देने से हमारा बहुत अहित हो सकता है. ऐसा कर हम एक न्यायपूर्ण और समावेशी लोकतंत्र बनने के अपने राष्ट्रीय उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकेंगे. आज इस महापुरुष की जयंती पर हमें उनको याद करते हुए अपना आत्ममंथन करना चाहिए.

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