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निजी स्कूलों में गरीब बच्चे, बच्चों को प्रवेश देना होना चाहिए राष्ट्रीय मिशन

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निजी स्कूलों में गरीब बच्चे, बच्चों को प्रवेश देना होना चाहिए राष्ट्रीय मिशन
निजी स्कूलों में गरीब बच्चे

Supreme Court: निजी स्कूलों में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के प्रवेश में 25 प्रतिशत कोटा लागू करने पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों में गरीब बच्चों को प्रवेश देना राष्ट्रीय मिशन होना चाहिए. अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाने का भी निर्देश दिया. अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक प्रक्रिया शुरू की है कि सभी स्कूल शिक्षा के अधिकार (आरटीइ) कानून के तहत गरीब और वंचित तबके के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटें मुफ्त में आरक्षित करें.

इसने इस संदर्भ में मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक बयान का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि 25 फीसदी वंचित समूह और कमजोर तबके के बच्चे निजी स्कूलों के माहौल में कैसे तालमेल बिठा पायेंगे. शीर्ष अदालत की टिप्पणी थी कि यह चिंता तभी हल हो सकती है, जब शिक्षण प्रक्रिया और शिक्षक इन बच्चों को ज्ञान के स्रोत के रूप में उपयोग करें, ताकि उनका आत्मसम्मान और पहचान बढ़े व उन्हें बराबरी का दर्जा मिले.

अदालत ने यह याद दिलाया कि निजी स्कूलों में वंचित वर्ग के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना कोई अलग कल्याणकारी योजना नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 (ए) और 39 (एफ) में निहित बाल विकास और बंधुत्व के सिद्धांतों को लागू करने का जरिया है. पीठ ने एक व्यक्ति द्वारा जारी विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की, जिनके बच्चों को पड़ोस के एक स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिए प्रवेश नहीं मिला था, जबकि सीटें उपलब्ध थीं.

शीर्ष अदालत का कहना था कि आरटीइ कानून सभी बच्चों को जाति, वर्ग, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव के बिना एक ही स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा देने की बात करता है. इसने कोठारी आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसमें कॉमन स्कूल सिस्टम पर जोर दिया गया था, जहां पर समाज के हर वर्ग के बच्चों को बिना भेदभाव के शिक्षा मिल सके. संविधान के भाईचारे का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है, जब एक रिक्शा खींचने वाले का बच्चा, एक करोड़पति या सुप्रीम कोर्ट के जज के बच्चे के साथ एक ही स्कूल में पढ़े. शीर्ष अदालत के इस फैसले को समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की संवैधानिक भावना को जमीन पर उतारने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

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