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लंबित परियोजनाएं

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लंबित परियोजनाएं

भारत में अनेक परियोजनाएं वर्षों-वर्ष नियमों के बोझ, स्थानीय विरोध, पर्यावरण जैसी वजहों का शिकार बनी रहती हैं. वहीं राजनीतिक कारण, कॉरपोरेट प्रतिद्वंद्विता, भ्रष्टाचार भी बाधक हैं. बीते अगस्त में प्रधानमंत्री मोदी ने इस आशय की एक समीक्षा बैठक की थी, जिसमें चार मंत्रालयों- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन, रेलवे एवं परिवहन व राजमार्ग और कानून एवं न्याय मंत्रालय को कैबिनेट सचिव की निगरानी में समन्वय स्थापित करने का निर्देश दिया गया था, ताकि विभिन्न प्रकार की मंजूरी प्राप्त करने में होनेवाली देरी का समाधान हो सके.

देश में 150 करोड़ और उससे ऊपर की परियोजनाओं की निगरानी सांख्यिकी ए‍वं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय करता है. इसकी हालिया रिपोर्ट बताती है कि 1528 परियोजनाओं में से 423 की लागत निर्धारित सीमा को पार कर चुकी है और 721 परियोजनाएं लंबे अरसे से अटकी हुई हैं. इस प्रकार 1528 परियोजनाओं की कार्यान्वयन लागत 21,59,802.67 थी, लेकिन अनुमानित पूर्णता लागत 26,54,818.05 करोड़ रुपये हो चुकी है.

इस प्रकार, 4,95,015.38 करोड़ की लागत बढ़ चुकी है. यह मूल लागत का 22.92 प्रतिशत है. मई, 2022 तक इन परियोजनाओं पर 13,42,535.22 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जो कि कुल अनुमानित लागत का 50.57 प्रतिशत है. लंबित 721 परियोजनाओं में से 113 एक से लेकर 12 महीनों से, 121 परियोजनाएं 13-24 महीनों से, 350 परियोजनाएं 25-60 महीनों से और 137 परियोजनाएं 61 महीने या उससे ज्यादा समय से लंबित हैं.

इस प्रकार 721 विलंबित परियोजनाओं का औसत समय 43.34 महीने है. दरअसल, विभिन्न विभागों से मंजूरी में देरी, समर्थन के अभाव जैसी वजहें अटकने का कारण बनती हैं. वहीं वित्तपोषण, कार्यक्षेत्र में बदलाव, निविदा में देरी, आदेश एवं उपकरण आपूर्ति में विलंब और कानून-व्यवस्था भी अवरोधक हैं. मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने और लॉजिस्टिक्स लागतों में कमी लाने के उद्देश्य से ‘पीएम गति शक्ति’ की शुरुआत हुई है.

इस डिजिटल प्लेटफाॅर्म से 16 मंत्रालय जुड़े हैं, ताकि परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन सुनिश्चित हो. यह पोर्टल भू-स्थानिक डेटा भी उपलब्ध कराता है. लंबित परियोजनाओं की गंभीरता और जटिलता को समझना होगा, क्योंकि अपेक्षा अनुरूप आर्थिक विकास तब तक नहीं होगा, जब तक नौकरशाही और निवेशकों को विश्वास में नहीं लिया जाता. साथ ही, न्यायिक अड़चनों का भी समाधान जरूरी है.

इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष पीठ बने, जो ढांचागत परियोजनाओं से जुड़ी जनहित याचिकाओं पर ही केंद्रित हो. मामलों के त्वरित निबटारे के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की पीठों को बढ़ाया जाए. परियोजनाओं के नुकसान को रोकने के लिए विभिन्न स्तरों पर सुधार जरूरी हैं, तभी तय लक्ष्य को, तय समय में और तय लागत पर हासिल किया जा सकेगा.

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