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महामारी बदल देगी हमारी जिंदगी

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महामारी बदल देगी हमारी जिंदगी

डॉ. ललित कांत

पूर्व प्रमुख, महामारी एवं संक्रामक रोग विभाग, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर)

कोरोना संक्रमण का गंभीर होता संकट भविष्य में क्या रूप लेगा, यह कहना मुश्किल है. इस महामारी के एसिम्टमेटिक मरीजों की बढ़ती संख्या से इसके बड़े स्तर फैलने का खतरा बढ़ गया है. एसिम्टमेटिक ऐसे कोरोना संक्रमित हैं, जिनमें कोरोना का कोई लक्षण जैसे- खांसी, तेज बुखार, सांस फूलना आदि दिखायी नहीं देते, लेकिन वे इस वायरस से संक्रमित होते हैं. कई शोध-पत्रों के अनुसार, अभी विश्व भर में कुल कोरोना संक्रमितों में से 80 प्रतिशत मरीज ऐसे हैं, जो इस श्रेणी में हैं. इनसे महामारी के फैलने का खतरा इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि जब तक किसी व्यक्ति में लक्षण दिखायी नहीं पड़ते, तब तक वह स्वयं को संक्रमित नहीं समझता, जिस कारण जो लोग उसके संपर्क में आते हैं, वे भी संक्रमित हो जाते हैं. एसिम्टमेटिक संक्रमितों में लक्षण न दिखने का प्रमुख कारण उनकी बेहतर प्रतिरोधक क्षमता को माना जा सकता है, जो संक्रमित होने के बावजूद शरीर में कोरोना के लक्षण पनपने नहीं देती. जिन व्यक्तियों की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उनके एसिम्टमेटिक होने की संभावना कम होती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ-साथ अन्य कई स्वास्थ्य संगठन भी कोविड-19 वायरस की वैक्सीन तैयार करने में लगे हुए हैं. अभी कुछ वैक्सीन मानव परीक्षण के चरण तक पहुंच चुकी हैं. लेकिन इन सभी प्रक्रियाओं के बाद भी वैक्सीन को तैयार करने में एवं आम जनता तक पहुंचने में कम से कम 18 महीने का समय लग सकता है. अत: 2022 से पहले किसी भी वैक्सीन के उपलब्ध होने की संभावना बहुत कम है. वर्तमान में बचाव के लिए ज्यादातर देशों में अभी भी लॉकडाउन लगा हुआ है, इसके बावजूद इस महामारी के प्रसार में कुछ खास कमी नहीं आयी है. आज महामारी से बचाव के लिए ‘हर्ड इम्युनिटी’ की भी चर्चा हो रही है.

यदि दुनियाभर में इसे निर्बाध रूप से फैलने दिया जाये और 60 फीसदी से भी अधिक लोग इससे संक्रमित हो जाते हैं और वे अपनी प्रतिरोधक क्षमता के बल पर इस संक्रमण को हरा देते हैं, तो उन्हें संक्रमण के प्रति इम्यून कहा जाता है. जब इम्यून लोगों की संख्या बहुत बढ़ जाती है, तब यह वायरस संक्रमण नहीं फैला पाता. इस सामूहिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को ‘हर्ड इम्युनिटी’ कहते हैं. ‘हर्ड इम्युनिटी’ को वैक्सीन के माध्यम से भी बढ़ाया जा सकता है. भारत में पोलियो के उन्मूलन के लिए ‘हर्ड इम्युनिटी’ का इस्तेमाल किया गया था. अगर अभी कोरोना संक्रमण नहीं रुकता है, तो यह जल्दी ही विश्व की 60 प्रतिशत आबादी को संक्रमित कर देगा, तब लोगों में अपने आप ही ‘हर्ड इम्युनिटी’ आ जायेगी, जो इस संक्रमण को फैलने से रोक देगी. लेकिन इस दौरान बड़े स्तर पर जनहानि की संभावना भी अधिक होगी. अभी भारत समेत कई देशों में इस वायरस का मौन संक्रमण फैल रहा है.

मौन संक्रमण से तात्पर्य है कि आप किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आये बिना ही आप संक्रमित हो रहे हैं. देश में जब पोलियो संक्रमण फैला था, तब मुंबई शहर में सीवर के पानी में पोलियो संक्रमित बच्चों के मल के कारण संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ गयी थी. कोरोना संक्रमण में भी 80 प्रतिशत मामले ऐसे हैं जिन्हें अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं होती. पता चला है कि इन संक्रमितों में से 25 प्रतिशत मरीजों के मल में तीन दिन तक कोविड-19 वायरस मौजूद रहता है. अत: यदि हम सीवरों के पानी की जांच करें, तो शायद यह पता लगा सकते हैं कि उस इलाके में कोरोना संक्रमण की उपस्थिति अधिक है अथवा नहीं. एसिम्टमेटिक मरीजों की बढ़ती संख्या के मद्देनजर यह तरकीब मददगार साबित हो सकती है.

ठीक हो जाने के बाद भी लोगों से संक्रमण के खतरे पर कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन ऐसे मरीज, जो गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं. उनके ठीक हो जाने अर्थात उनका कोरोना टेस्ट निगेटिव आने के बाद भी यह संभावना रहती है कि वे 14 दिनों तक संक्रमण को फैला सकते हैं. युवा वर्ग के संक्रमितों में एक हफ्ते, बुजुर्गों में दो हफ्ते एवं बच्चों में तीन हफ्ते तक यह संभावना रहती है. अनेक इलाकों से कोरोना संक्रमितों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें भी सामने आ रही हैं. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. यदि हम कोरोना संक्रमण से उबर चुके लोगों एवं संभावितों को सामाजिक रूप से नहीं अपनायेंगे, तो इससे लोगों में भय का संदेश जायेगा और वे सामाजिक बहिष्कार से बचने के लिए कोरोना संक्रमित होने पर भी सामने आने से घबरायेंगे. इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जायेगा.

इसलिए आज यह बहुत जरूरी है कि हम किसी समुदाय या व्यक्ति को संक्रमण के लिए जिम्मेदार न ठहरायें और किसी भी कोरोना संक्रमित या संभावित के साथ भेदभाव न करें, क्योंकि यह किसी भी रूप में मानवता के लिए हितकर नहीं होगा. आनेवाले समय में यह महामारी हमारी जीवन-शैली को बड़े स्तर पर प्रभावित करने वाली है. भविष्य में लोग हाथ मिलाने से ज्यादा नमस्ते करने का प्रयास करेंगे. बचाव के लिए हमें मास्क का प्रयोग करते रहना होगा, क्योंकि ऐसा नहीं होगा कि एकदम से यह महामारी पूरी तरह से देश से गायब हो जायेगी. (येे लेखक के निजी विचार हैं)

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