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परमाणु पनडुब्बियों से बढ़ती रक्षा क्षमता

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परमाणु पनडुब्बियों से बढ़ती रक्षा क्षमता
anti submarine warfare

Nuclear Submarine : भारत के नौसैनिक बेड़े में परमाणु पनडुब्बियों की संख्या में बढ़ोतरी उत्साहजनक है क्योंकि भारत को समुचित संख्या में रणनीतिक प्लेटफॉर्मों की जरूरत है. चौथे परमाणु-चालित बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बी का हालिया परीक्षण इस दिशा में एक अहम कदम है. बीते अगस्त में दूसरी परमाणु-चालित बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बी आइएनएस अरिघात को नौसेना में शामिल किया गया है. अगले साल आइएनएस अरिधमान के शामिल किये जाने की योजना है. आइएनएस अरिहंत पहले से ही सेवा में है. कुछ अन्य पनडुब्बियों का निर्माण कार्य भी चल रहा है. ऐसे रणनीतिक प्लेटफॉर्मों की जरूरत इसलिए होती है कि ये ठोस डिटेरेंस का काम करती हैं. इनसे किसी हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता में भी बढ़ोतरी होती है. यह भी समझा जाना चाहिए कि इन परमाणु पनडुब्बियों से केवल नौसैनिक क्षमता ही बेहतर नहीं होती है, बल्कि समूची राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती मिलती है. यह भारत की राष्ट्रीय रणनीतिक क्षमता का एक हिस्सा है. पनडुब्बियों के संचालन समेत अन्य पेशेवर आयामों का जिम्मा जरूर नौसेना का होता है, पर इनसे पूरी सामरिक शक्ति को बल मिलता है.


सेवानिवृत मेजर जनरल बीसी खंडूरी की अध्यक्षता में रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने 2018 में संसद को एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें रेखांकित किया गया था कि सामरिक क्षमता के मामले में तीनों सशस्त्र सेनाओं में अनेक कमियां हैं. रिपोर्ट में नौसेना की कमियों को विशेष रूप से उल्लिखित किया गया था. उसमें कहा गया था कि नौसेना के पास समुचित संख्या में पनडुब्बियां नहीं हैं और रणनीतिक चुनौतियों को देखते हुए इस कमी को जल्दी दूर किया जाना चाहिए. तो अभी जो किया जा रहा है, वह उसी कमी को पाटने का प्रयास है. भारत ने 2001-02 में एक योजना बनायी थी, जिसमें आगामी तीस वर्षों के लिए कार्यक्रम प्रस्तावित किये गये थे. उस कार्यक्रम को कभी भी ठीक से न तो बजट आवंटित हुआ और न ही मंजूरी मिली. अब धीरे-धीरे उस दिशा में कुछ-कुछ प्रयास हो रहे हैं. बहरहाल, जब ये पनडुब्बियां पूरी तरह से सेवारत हो जायेंगी, तो चीन के बरक्स एक डिटेरेंट के रूप में हिंद महासागर क्षेत्र में बड़े दायरे में, या जहां जरूरत होगी, अपनी गतिविधियां कर सकेंगी. लेकिन अभी जो पनडुब्बियों की प्रस्तावित संख्या है, उसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है. भविष्य में कितनी पनडुब्बियां नौसैनिक बेड़े में शामिल की जायेंगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाने के लिए क्या प्राथमिकताएं निर्धारित करता है.


परमाणु या अन्य क्षमताओं से लैस पनडुब्बियों की संख्या बढ़ाने के लिए जरूरी है कि भारत के पास आवश्यक तकनीकी और निर्माण क्षमता हो. यह सराहनीय है कि देश में साजो-सामान के उत्पादन के क्षेत्र में विकास हो रहा है तथा पनडुब्बियों में घरेलू चीजों का अधिक इस्तेमाल संभव हो रहा है, लेकिन अभी भी हमारी क्षमता बहुत कम है. भारत क्वाड समूह का सदस्य है, जिसमें अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया भी हैं. यह समूह व्यापक मायनों में चीन की ओर से आने वाले खतरे का सामना करने में मददगार हो सकता है, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत अमेरिका या किसी अन्य क्वाड सदस्य देश का सैन्य सहयोगी नहीं है. ऐसे में उन देशों से मिलने वाली या मिल सकने वाली सैन्य मदद सीमित होगी. खैर, चीन की आक्रामकता को देखते हुए पनडुब्बियों को बेड़े में शामिल किया जाना देश के रणनीतिक हिंद-प्रशांत फ्रेमवर्क में महत्वपूर्ण कदम है. भारत के अलावा केवल पांच देशों- अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन- के पास परमाणु-चालित बैलेस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां हैं. भारत 2018 में इस समूह का हिस्सा बना. भारत द्वारा ऐसी पनडुब्बियों के निर्माण पर पड़ोसी देशों की नजर जरूर होगी.


चीन की नौसैनिक क्षमता, खासकर पनडुब्बी क्षमता, भारत से बहुत अधिक है, लेकिन परमाणु पनडुब्बियों से भारत की सेकेंड-स्ट्राइक क्षमता बढ़ेगी. इस क्षमता को आवश्यक स्तर पर ले जाने के लिए हमें अधिक पनडुब्बियों को बेड़े में शामिल करना होगा. इसी महीने सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी ने दो पनडुब्बियों के निर्माण को मंजूरी दी है, जिनका डिजाइन और निर्माण देश में ही होगा. इन्हें विशाखापट्टनम में बनाया जायेगा. यह एक बड़ा नीतिगत निर्णय है और महत्वाकांक्षी भी. पारंपरिक डीजल-बिजली चालित पनडुब्बी के डिजाइन और निर्माण की समुचित क्षमता भारत के पास नहीं है, फिर भी परमाणु अस्त्र से लैस परमाणु पनडुब्बियों के निर्माण की ओर भारत का रुख करना महत्वपूर्ण है. लगभग 17 साल पहले ऐसी पनडुब्बियों को लाने का विचार हुआ था, जो अब फलीभूत होता दिख रहा है. अब इस मंजूरी के साथ समुचित बजट आवंटन की दरकार है. तकनीकी रूप से परमाणु पनडुब्बी एक जटिल प्लेटफॉर्म है, इसलिए इस क्षेत्र में हमारी यात्रा लंबी, कठिन और खर्चीली होगी. बहरहाल, तमाम साजो-सामान, प्रणाली और मिसाइलों के साथ जब यह पनडुब्बियां समुद्र में उतरेंगी, तो दूसरी नौसेनाओं को गतिविधियां करते समय उनका संज्ञान लेना ही पड़ेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
(बातचीत पर आधारित)

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