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नेपाल के हित में होगी भारत से नजदीकी

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नेपाल के हित में होगी भारत से नजदीकी
बालेन शाह

Nepal- India relations : बालेन शाह के नेतृत्व में नेपाल की नयी सरकार को सत्ता में आये हुए अभी लगभग एक महीना ही हुआ है. परंतु इसके सामने एक के बाद एक समस्या घरेलू और विदेशी मोर्चे पर लगातार आ रही है. इस सरकार को अपने पहले ही महीने में दो प्रमुख मंत्रियों के इस्तीफे के कारण अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है. गृह मंत्री सुदन गुरुंग को वित्तीय लेन-देन और निवेश से संबंधित आरोपों के बीच और श्रम मंत्री दीपक कुमार साह को अपनी पत्नी को सरकारी बोर्ड में नियुक्त करने के कारण पद से हटना पड़ा है. यह स्थिति इसलिए बेहद चिंताजनक है, क्योंकि बालेन शाह का सत्ता में आना युवाओं के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रेरित था.

ऐसे में, उनके मंत्रिमंडल में कदाचार के किसी भी आरोप से उनके सुधार एजेंडे की विश्वसनीयता स्वाभाविक ही कम हो जाती है. बढ़ती अस्थिरता के बीच नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने विशेष कारणों का हवाला देते हुए संसद के दोनों सदनों का आज, यानी 30 अप्रैल को होने वाला सत्र स्थगित कर दिया है, जो नये नेतृत्व के कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही राजनीतिक संकट का संकेत देता है.


हाल के वैश्विक तनावों, विशेष रूप से पश्चिम एशिया संकट, ने कच्चे तेल की आपूर्ति शृंखला को बाधित किया है, जिससे नेपाल में पेट्रोल की कीमत में भारी उछाल आया है. नेपाल उन दक्षिण एशियाई देशों में है, जहां पेट्रोल की कीमत बहुत अधिक है. इससे परिवहन, वस्तुओं और सेवाओं की लागत में वृद्धि हुई है, नतीजतन मुद्रास्फीति बढ़ी है. इस मुश्किल दौर में नेपाल ईंधन आपूर्ति के लिए लगभग पूरी तरह से भारत पर निर्भर है और पेट्रोल की उपलब्धता में व्यवधान की स्थिति कई बार अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है. अपनी सरकार में भ्रष्ट लोगों की शिनाख्त करती और सड़कों पर अपनी आलोचना झेलती नयी सरकार को ईंधन की खपत कम करने के लिए दो दिन के सप्ताहांत जैसे आपातकालीन उपाय भी लागू करने पड़े हैं. ये कदम संकट की गंभीरता और दैनिक जीवन तथा आर्थिक गतिविधियों पर इसके प्रभाव को उजागर करते हैं.

पेट्रोल और डीजल महंगा होने के कारण सीमावर्ती जिलों से काफी संख्या में लोग भारत आकर तेल ले रहे हैं. वैश्विक संकट के कारण भारत भी कच्चे तेल के संकट से अछूता नहीं है, फिर भी मुश्किल के समय पड़ोसी नेपाल और उसके लोगों की मदद की जा रही है. यह भारत की ‘नेबर फर्स्ट’ की नीति के अनुरूप ही है, जिसका सबूत कोरोना संकट के समय भी देखने को मिला था. हाल ही में, बालेन शाह सरकार ने 100 रुपये से ज्यादा के मूल्य पर कोई सामान विदेश से लाने पर ड्यूटी लगा दी है. भारत-नेपाल की खुली सीमा होने से हजारों लोग रोजाना अपनी जरूरत का सामान लेने के लिए सीमा पर आसपास के बाजारों का उपयोग करते हैं. जनता पहले से ही महंगाई और महंगे पेट्रोल से तंग थी. अब इस नये नियम के कारण सरकार लोगों के निशाने पर है.

नेपाल के लिए, जो ईंधन और विनिर्मित वस्तुओं सहित अपनी वस्तुओं का एक बड़ा हिस्सा भारत से आयात करता है, शुल्क संरचनाएं खुदरा कीमतों को काफी हद तक प्रभावित करती हैं. भारत पर अत्यधिक आर्थिक निर्भरता के कारण नेपाल में इन परिवर्तनों का व्यापक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा, नेपाल की घरेलू उत्पादन क्षमता की कमी इस समस्या को और भी गंभीर बना देती है.


दूसरी तरफ, नेपाल सरकार अपने बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं, खासकर चीन से जुड़ी परियोजनाओं का पुनर्मूल्यांकन कर रही है. इनमें से कई परियोजनाएं चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) से जुड़ी हैं, जिनमें सड़कें, जलविद्युत संयंत्र और व्यापार गलियारे शामिल हैं. बालेन शाह सरकार ने चूंकि पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर दिया है, इस कारण मौजूदा समझौतों की गहन जांच शुरू हो गयी है. खासकर ऋण स्थिरता, परियोजना की व्यवहार्यता और दीर्घकालिक आर्थिक लाभों को लेकर चिंता जतायी गयी है और कुछ परियोजनाओं की समीक्षा यह सुनिश्चित करने के लिए की जा रही है कि वे राष्ट्रीय हितों के अनुरूप हों और वित्तीय बोझ न डालें.

बेशक चीन और भारत के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने का प्रयास भी नेपाल कर रहा है. चीन जहां नेपाल में निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास की पेशकश करता है, वहीं भारत नेपाल का प्रमुख आर्थिक साझेदार बना हुआ है. यह नाजुक संतुलन नेपाल की विदेश नीति का केंद्रबिंदु है. नेपाल-चीन परियोजनाओं की नयी सरकार द्वारा समीक्षा विकास के प्रति एक व्यावहारिक दृष्टिकोण का संकेत देती है- ऐसा दृष्टिकोण, जो आर्थिक व्यवहार्यता, पारदर्शिता और भू-राजनीतिक संतुलन को प्राथमिकता देता है. विगत 10 अप्रैल को भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मॉरीशस के पोर्ट लुइस में आयोजित नौवें हिंद महासागर सम्मेलन में नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल से मुलाकात की थी. उस मुलाकात में भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति के तहत उच्च स्तरीय सहयोग जारी रखने पर जोर दिया गया था और दोनों ने सहयोग बढ़ाने और साझेदारी की गति को बनाये रखने पर चर्चा की थी. इसी कड़ी में विदेश सचिव विक्रम मिसरी के अगले महीने उच्च स्तरीय वार्ता के लिए नेपाल दौरे पर जाने की संभावना है. माना जा रहा है कि वह आधिकारिक तौर पर बालेन शाह के भारत आने का प्रधानमंत्री मोदी का न्योता लेकर जायेंगे.


भारत और नेपाल सदियों से न सिर्फ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, बल्कि एक-दूसरे की सहायता से दक्षिण एशिया में सहयोग-भागीदारी की नयी कहानी लिखने को तैयार हैं. लीक से हटकर एक स्वतंत्र नेता की अपनी छवि के बावजूद प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत के साथ घनिष्ठ संबंध बनाये रखने की इच्छा जतायी है, जो कूटनीति के प्रति उनके व्यावहारिक दृष्टिकोण का संकेत है. यह भी तथ्य है कि भारत दौरे के लिए औपचारिक तौर पर उन्होंने हामी भर दी है, जो मजबूत द्विपक्षीय संबंध बनाये रखने की उनकी सरकार की उच्च प्राथमिकता को दर्शाती है. नयी दिल्ली हालांकि अभी ‘प्रतीक्षा करो और देखो’ का नजरिया अपना रही है, लेकिन नये सिरे से सहयोग और विकास को लेकर वह भी आशावादी है. भारी बहुमत वाली बालेन शाह सरकार के लिए यह ऐतिहासिक अवसर है कि वह भारत के साथ संबंधों को नयी ऊंचाइयों पर ले जाये. वैश्विक संघर्षों के युग में शांति और सहयोग दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बना सकते हैं. नेपाल को अपने आर्थिक विकास और स्थिरता के लिए भारत के साथ अपने संबंध प्रगाढ़ करने होंगे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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