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Home Opinion वित्तीय घाटे की बेमतलब चिंता

वित्तीय घाटे की बेमतलब चिंता

वित्तीय घाटे की बेमतलब चिंता

मोहन गुरुस्वामी, अर्थशास्त्री

mohanguru@gmail.com

सरकार के पैकेज के असल में केवल 63 हजार करोड़ रुपये होने की एकमात्र वजह वित्तीय घाटे से जुड़ा जुनून है. इस जुनून के असर में रघुराम राजन जैसे आर्थिक दक्षिणपंथी उदारवादी अर्थशास्त्री भी हैं और उनके शिष्य कृष्णामूर्ति सुब्रमण्यम भी, जो अभी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं. ये लोग खुशी से यह भूल जाते हैं कि घाटे से वित्तपोषित होनेवाली दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका ही है. भारत सरकार के बयानबाजी करनेवाले वित्तीय घाटे को 3.5 फीसदी तक रखने को बड़ी उपलब्धि बताते रहते हैं. यह जादुई सीमा शानदार सूट पहननेवाले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और वॉल स्ट्रीट के लोगों द्वारा निर्धारित की गयी थी. हमने इसे दैवीय वचन के रूप में मान लिया है और यह समझने लगे हैं कि वित्तीय घाटा ही सभी समस्याओं की जननी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और सत्ता में बैठे लोगों के लिए कुछ सच्चाई पेश करना जरूरी है. वित्तीय घाटा क्या है? यह तब होता है, जब सरकार का कुल खर्च राजस्व से होनेवाली उसकी कमाई से अधिक हो जाता है. इसमें उधार ली गयी राशि शामिल नहीं होती है. घाटा कर्ज से अलग है, जो सालाना घाटों का जोड़ होता है. अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कींस का मानना था कि घाटा देशों को आर्थिक मंदी से निकलने में मदद करता है. पर वित्तीय रूढ़िवादी की समझ है कि संतुलित बजट नीति के लिए घाटे से बचना चाहिए. दुनिया में सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं- अमेरिका, चीन, जापान और पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देश, का कर्ज और सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का अनुपात भी सबसे अधिक है.

जीडीपी के 20 फीसदी के हालिया पैकेज से पहले जापान का यह अनुपात 253 फीसदी से अधिक था. चीन में यह अभी 180 फीसदी से ज्यादा है. अमेरिका में यह लगभग 105 फीसदी है. भारत में कर्ज और जीडीपी का अनुपात 62 फीसदी ही है. उधार लेकर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना अपने आप में कोई खराब बात नहीं है. कर्ज का सही इस्तेमाल नहीं होना खराब बात है. देश तभी समृद्ध होते हैं, जब कर्ज का इस्तेमाल समुचित पूंजी व्यय के लिए, जहां फायदा निश्चित होता है तथा सामाजिक खर्च के लिए करते हैं. लेकिन भारत में हम कर्ज लेते हैं सब्सिडी बांटने और सरकार के भारी-भरकम खर्च को छुपाने के लिए. इसे समझने का प्रयास करते हैं.

अगर किसी परिवार के सामने बच्चे की शिक्षा या शराब की आदत के लिए कर्ज लेना है, तो उसका चयन क्या होना चाहिए? यहां तार्किक और सही चुनाव स्पष्ट है. बच्चे की शिक्षा बहुत बाद तक फायदेमंद बनी रहेगी, जबकि शराब का नशा फैसला करनेवाले व्यक्ति को कुछ देर के लिए तुष्टि ही दे सकेगी. पर दुर्भाग्य है कि हमारी सरकारें हमेशा गलत फैसला ही लेती रही हैं. मेरा हमेशा से मानना रहा है कि वित्तीय घाटा समस्या नहीं है, समस्या उधार ली गयी रकम को बर्बाद करना है. यदि कर्ज का उपयोग उत्पादकता के साथ हो रहा है तथा इससे बढ़ोतरी और समृद्धि हासिल हो रही है, तो इसका जरूर स्वागत होना चाहिए. इसलिए हम सरकार से वितीय घाटे के लक्ष्यों के बारे में नहीं, बल्कि आर्थिक वृद्धि, मूल्य संवर्धन, रोजगार और निवेश लक्ष्यों के बारे में सुनना चाहते हैं.

हमारी सरकारें निराशाजनक तौर पर इन लक्ष्यों से भटकती रही हैं और उनका ध्यान घाटे पर ही लगा रहता है. यह एक मूर्खतापूर्ण जुनून है. लेकिन अगर सरकार घाटे के वित्त से यानी रिजर्व बैंक द्वारा अधिक नोट छापकर पैसा नहीं जुटाना चाहती है, तो और क्या विकल्प मौजूद हैं? प्रधानमंत्री मोदी के पास आर्थिक प्रबंधन की कमजोर टीम है और वित्त मंत्री एवं रिजर्व बैंक के गवर्नर के पास अनुभव की कमी है. यदि वे इसका समाधान कर भी लें, तो पैसा कहां से आयेगा? भारत की 480 अरब डॉलर से अधिक संपत्ति विदेश में पड़ी है, जिस पर मामूली ब्याज मिलता है. यदि इसका 10 फीसदी भी लाया जाता है, तो यह राशि 3.2 लाख करोड़ से अधिक होगी. रिजर्व बैंक के पास लगभग 9.6 लाख करोड़ पड़े हैं.

यह राशि आपात स्थिति के लिए है और अभी हम ऐसी ही स्थिति में हैं, जिसका सामना हमने पहले कभी नहीं किया है. इस राशि का एक तिहाई या 3.2 लाख करोड़ मौजूदा योजना से पांच गुना अधिक होते हैं. अगर इच्छाशक्ति और त्याग की भावना हो, तो सरकारी भत्तों में कुछ कटौती की जा सकती है. सरकार बड़े बैंक जमा राशियों से भी निश्चित हिस्सा ले सकती है. देश की दस सबसे बड़ी निजी कंपनियों के पास 10 लाख करोड़ से अधिक का कोष है.

सरकार जीडीपी का पांच फीसदी या करीब 10 लाख करोड़ रिकवरी कोष के लिए निर्धारित कर सकती है. जन-धन खातों में हर माह पांच हजार रुपये, जीएसटी में छूट के लिए धन, ग्रामीण परियोजनाओं का काम शुरू करना तथा इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान देना जैसे उपाय तुरंत होने चाहिए. लॉकडाउन का नुकसान केवल गरीबों को नहीं उठाना चाहिए. पेड़ों पर पैसे तो हैं, पर फल के लिए उन्हें ठीक से हिलाना पड़ेगा.

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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