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Home Opinion प्रदूषण पर गंभीर होने की जरूरत

प्रदूषण पर गंभीर होने की जरूरत

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प्रदूषण पर गंभीर होने की जरूरत

हाल ही में प्रकाशित लांसेट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनियाभर में प्रदूषण से होनेवाली कुल मौतों में एक चौथाई भारत में होती हैं. सभी प्रकार के प्रदूषण को मिला दें, तो भारत प्रदूषण से होनेवाली मौतों के मामले में शीर्ष पर है और चीन दूसरे स्थान पर. हालांकि, वायु प्रदूषण में चीन पहले और भारत दूसरे स्थान पर है. लेकिन, दोनों के बीच अंतर बहुत कम है.

प्रदूषण से होनेवाली मौतों और बीमारी से देश की जीडीपी का एक प्रतिशत नुकसान होता है. अर्थव्यवस्था पर यह बड़ा बोझ है. अगर हम प्रदूषण पर नियंत्रण प्राप्त कर लें, तो हमारी जीडीपी का एक प्रतिशत बच सकता है. प्रदूषण में कमी लाने और प्रदूषण से बचाव करने, दोनों में अंतर है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रदूषण की रोकथाम के लिए टॉवर लगवा दिया.

इससे पानी का छिड़काव किया जाता है. यह नियंत्रण की कोशिश है, बचाव नहीं है. नियंत्रण करने में खर्च बढ़ेगा. वर्तमान में जीडीपी का एक प्रतिशत का नुकसान हो रहा है, अतिरिक्त 0.5 प्रतिशत बढ़ायेंगे, तो कुछ नियंत्रण हो सकता है. लेकिन, अगर हम प्रदूषण से बचाव पर ध्यान दें, तो समाधान स्थायी हो सकता है.

दिल्ली-एनसीआर के लिए क्या व्यवस्था हो, कार्यालयों को कैसे विकेंद्रीकृत करना है, कंस्ट्रक्शन स्थलों के लिए क्या नियम हो, ग्रीन जोन किस तरह से तैयार हों, आदि बचाव से जुड़े प्रश्नों पर विचार करने की जरूरत है. यानी, प्रदूषण होने ही न दो. अगर हमें लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था को बचाना है, तो हमें प्रदूषण से बचाव पर ध्यान देना होगा.

सभी प्रकार के प्रदूषणों पर गौर करें, तो वायु प्रदूषण सबसे गंभीर समस्या है. दूसरी बड़ी समस्या जल प्रदूषण की है. सूक्ष्म कणों का प्रदूषण चिंताजनक है. कंस्ट्रक्शन साइट, सड़कों की मिट्टी, धूल, कूड़े के ढेर से यह प्रदूषण निकल रहा है. वहीं, गाड़ियों से, पराली जलाने और औद्योगिकी गतिविधियों से वातावरण में अतिसूक्ष्म कण पीएम 2.5 का प्रदूषण फैल रहा है.

इससे प्रभावित लोगों को दमा होने का खतरा रहता है. कम उम्र में हार्ट अटैक आना, खासकर ऐसे व्यक्ति में जिन्होंने पहले कभी धूम्रपान नहीं किया है, ऐसे लोगों की संख्या वायु प्रदूषण के चलते बढ़ी है. लंबे समय से प्रदूषण की चपेट में रहने से फेफड़ों के कैंसर हो रहे हैं. प्रदूषण का असर गर्भवती महिलाओं पर होता है, जिससे अस्वस्थ बच्चा पैदा होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2014 की रिपोर्ट में कहा गया था कि प्रदूषण वाले इलाकों में मां के रहने से बच्चे मानसिक तौर पर अक्षम पैदा होते हैं.

वायु प्रदूषण से इस तरह की अनगिनत समस्याएं आ रही हैं. जल प्रदूषण मुख्य रूप से दो तरह का होता है. पहला, जीवाणुओं से संबंधित, जिससे कॉलरा, टाइफाइड आदि बीमारी होती हैं. दूसरा, रसायनों का प्रदूषण, इसमें मुख्य रूप से औद्योगिक प्रदूषण होता है. धातुओं- आर्सेनिक, कैडमियम, मरकरी, लेड आदि से जल प्रदूषण बढ़ रहा है. दूषित जल से तैयार होनेवाली सब्जियां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं. प्रदूषण के कारण महिलाओं में एनीमिया हो जाता है. दूषित पानी से सिंचाई, छिड़काव आदि करने से बीमारियों का जोखिम रहता है. जल प्रदूषण कई से तरह से हमारे जीवन को प्रभावित कर रहा है.

वर्षों से प्रदूषण नियंत्रण की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन संतोषजनक परिणाम नहीं आये, इसका बड़ा कारण है कि हम बचाव पर काम नहीं कर रहे हैं. पानी का छिड़काव करके प्रदूषण को ज्यादा नियंत्रित नहीं किया जा सकता है, यह ठोस समाधान भी नहीं है. शहरों की प्लानिंग पर विचार करने की जरूरत है. इसमें देखा जाता है कि सड़कों के किनारे हरित क्षेत्र होना चाहिए. इससे गाड़ियों के आने-जाने से मिट्टी का कटाव नहीं होता.

इसी तरह कंस्ट्रक्शन को लेकर भी दिशा-निर्देश हैं, लेकिन वे अमल में नहीं लाये जाते. आवासीय, इंडस्ट्रियल, ऑफिस के इलाकों में यह तय होता है कि कितना एरिया ग्रीन होना चाहिए. यह नियम हमारे यहां प्रभावी ढंग से लागू नहीं है. इस मामले में भूटान दक्षिण-पूर्व एशिया में सबसे बेहतर है. वहां 66 प्रतिशत एरिया ग्रीन है, शेष 33 प्रतिशत में कंस्ट्रक्शन की अनुमति होती है.

इस इलाके में निगेटिव कार्बन केवल भूटान का ही है. अन्य देशों के कार्बन का बोझ भी भूटान पर होता है. अगर नीति-निर्धारण बचाव के स्तर पर होगा, तभी उसका प्रभावी समाधान निकलेगा. प्रदूषण की समस्या गंभीर होने पर फैसले लिये जाते हैं. इसके लिए ऑड-इवन लागू करना समाधान नहीं है. प्रदूषण वर्षों से बढ़ रहा है, उस पर गौर नहीं किया गया. वायु गुणवत्ता कभी ऐसी नहीं होती, जो रहने योग्य हो.

देश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता लगातार चिंताजनक बनी ही रहती है. थोड़ा कम होने पर खुशी व्यक्त कर दी जाती है, लेकिन फिर से प्रदूषण बढ़ जाता है. यानी, वातावरण रहने योग्य नहीं है. अगर प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान निकालना है, तो हरित क्षेत्र का विस्तार जरूरी है. कंस्ट्रक्शन साइट से जुड़े नियमों को लागू किया जाए. दिल्ली जैसे बड़े शहरों को विकेंद्रित करने की जरूरत है, क्योंकि ऐसी जगह प्रदूषण होने पर वह काफी समय तक बना रहता है. लोगों की आवाजाही को कम करने की जरूरत है. गुड गवर्नेंस के लिए ऐसे तथ्यों पर विचार करना होगा. (बातचीत पर आधारित).

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