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Home Opinion खेल संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता

खेल संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता

खेल संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता
National Sports Day 2025

National sports day: कुछ दिन पहले संपन्न हुए पेरिस ओलिंपिक में भारत के खाते में छह मेडल आये. मेडल के हिसाब से देखें, तो टोक्यो से प्रदर्शन कमतर ही रहा, हालांकि अनेक खेलों में संभावनाएं भी दिखी हैं. पेरिस में 81 देशों के नाम पदक तालिका में दर्ज हुए, जिनमें हमारा स्थान 71 है. तो, इसका अर्थ है कि हमारी स्थिति नाजुक है. हर दफा ओलिंपिक में जाने से पहले बड़े-बड़े दावे होते हैं, पर उस हिसाब से प्रदर्शन नहीं हो पाता. बहुत छोटे-छोटे देश बहुत अच्छा प्रदर्शन करते रहते हैं. मेरा ख्याल है कि हमें बचपन से ही प्रतिभाओं की पहचान कर उन्हें अच्छा प्रशिक्षण देकर तैयार करना चाहिए. यह जरूरी नहीं है कि हम सभी या बहुत अधिक खेलों में प्रतिस्पर्धा करें, बल्कि हमें उन खेलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिनमें हमारे खिलाड़ियों का प्रदर्शन शानदार है. अफसोस की बात है कि हर ओलिंपिक के बाद यही सब बातें दोहरायी जाती हैं, लेकिन आगे कोई कदम नहीं उठाया जाता.

राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम हर स्तर पर खेलों को बढ़ावा दें और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में नयी छाप छोड़ें. मेरा सुझाव है कि एक ठोस समिति बने, जो देशभर में नयी प्रतिभाओं की खोज करे, उन्हें खंगाले और उनके बेहतर प्रशिक्षण की व्यवस्था करे. ऐसी एक कमिटी है, पर अभी जो स्थापित खिलाड़ी हैं, उन्हीं पर सारा ध्यान दिया जाता है. ऐसे खिलाड़ियों को हर संभव सहयोग तो दिया ही जाना चाहिए परंतु दीर्घकालिक दृष्टि से नयी प्रतिभाओं को सामने लाना और उन्हें तैयार करना बहुत जरूरी है. चाहे राष्ट्रीय कोच हों या विदेशों से बुलाये गये विशेषज्ञ हों, उन्हें पूरे भारत में घूम-घूम कर प्रतिभाओं की पहचान करनी चाहिए. पर इस तरह के प्रयास नहीं हो रहे हैं. जो खिलाड़ी नीचे से ऊपर आ जाते हैं, उन्हीं पर पूरा ध्यान दिया जाता है. जो खिलाड़ी बन चुका है, आप उसमें बहुत अधिक बेहतरी नहीं ला सकते हैं. ओलिंपिक में अनेक स्पर्धाओं में हमारे खिलाड़ी मेडल जीतते-जीतते रह गये. यह देखना जरूरी है कि खिलाड़ी की मानसिक क्षमता अच्छी रहे और वह अंत-अंत तक पूरी ताकत के साथ मुकाबले में बना रहे. इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि आज जो चौथे या पांचवे पायदान पर है, अगली बार वह उससे ऊपर जाए.

यह बहुत दुर्भाग्य की बात है कि हमारे यहां स्कूल या कॉलेज के स्तर पर खेल ना के बराबर है. यही असल में नर्सरी है. जो स्कूल के बच्चे-बच्चियां हैं, वही आगे जाकर खिलाड़ी बनेंगे. इस पर हमारा ध्यान नहीं है. बहुत से स्कूल-कॉलेजों में तो ढंग के मैदान और खेल-कूद की मामूली सुविधाएं तक नहीं हैं. जिन जगहों पर मैदान उपलब्ध हैं, वहां आने-जाने में ही बच्चों का बहुत सारा समय खराब हो जाता है. ऐसे में बच्चा न तो ठीक से खेल पाता है और न ही पढ़ाई कर पाता है. अनेक देशों में जब सप्ताहांत की छुट्टी होती है, पूरा परिवार खेल से संबंधित गतिविधियों में हिस्सा लेता है. इससे खेल संस्कृति को बढ़ावा मिलता है. ऐसी चीजों का अध्ययन कर रणनीति बने, तो आगे चलकर हम भी खेल में एक शक्ति बन सकते हैं. पर लंबे समय से जैसी स्थिति चल रही है, उसे देखते हुए मुझे कोई खास उम्मीद नजर नहीं आती.


अगर मैं अपने दौर को याद करूं, तो कभी भी पूरे साल भर कैंप नहीं लगता था. जो भी खिलाड़ी थे, वे अपने-अपने विभाग या संस्था की ओर से राष्ट्रीय टूर्नामेंटों में खेलते थे. उन्हीं आयोजनों से संभावित 70-80 खिलाड़ियों को चयनित किया जाता था. जब भी इस तरह के टूर्नामेंट होते थे, तो राष्ट्रीय टीम के तमाम खिलाड़ी उनमें भाग ले रहे होते थे. उन्हें खेलते देखने के लिए हजारों लोग आते थे. इससे खेल को भी बढ़ावा मिलता था और नयी प्रतिभाओं का भी उत्साह बढ़ता था. उस दौर में एक खेल संस्कृति हमारे देश में थी. लेकिन अब टीम इंडिया के मुख्य खिलाड़ी कैंप या टूर में व्यस्त रहते हैं. स्थानीय स्तर के टूर्नामेंट में कोई खिलाड़ी नहीं खेलता. ऐस में दर्शकों का भी मोहभंग होने लगा. किसी भी खेल के स्थानीय आयोजनों में आपको दर्शक नहीं दिखते. खेल के नीचे जाने का यह भी एक बड़ा कारक है. यह संस्कृति मैंने केवल भारत में ही देखा कि 365 दिन बच्चे कैंपों में ही रहते हैं. कई देशों में कोच योजना भेज देता है क्योंकि पूरे साल उसके साथ रहना बहुत खर्चीला होता है. फिर भी उनका प्रदर्शन बेहतर रहता है. खेल को बढ़ावा देने में सरकार, समाज, परिवार सबका योगदान होना चाहिए.


(बातचीत पर आधारित)
(अर्जुन अवार्ड एवं पद्मश्री समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हरबिंदर सिंह ने भारतीय हॉकी टीम के सदस्य के रूप में 1964, 1968 और 1972 के ओलिंपिक आयोजन में हिस्सा लिया था. उन्हें हॉकी के महान खिलाड़ियों में गिना जाता है.)

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