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हमारी हिंदी का संकीर्ण समाज

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हमारी हिंदी का संकीर्ण समाज
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हिंदी संसार को प्रसन्न करने वाली दो बड़ी बातें हाल में हुई हैं- पहली, गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ और उसके अंग्रेजी अनुवाद ‘टूम्ब ऑफ सैंड’ को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार का मिलना और दूसरी, संयुक्त राष्ट्र महासभा में कुछ और भाषाओं के साथ हिंदी का भी पहली बार संयुक्त राष्ट्र संबंधित गतिविधियों और सूचनाओं को प्रसारित करने के लिए उल्लेख किया जाना.

दोनों उपलब्धियों को लेकर हिंदी वालों में खासे रोचक विभ्रमों की स्थिति बनी रही. कई लोगों ने बुकर मिलने को हिंदी उपन्यास ‘रेत समाधि’ का नहीं, उसके डेजी रॉकवेल के अंग्रेजी अनुवाद का सम्मान माना. लेखन की भाषा में शैली, प्रवाह, प्रयोग के स्तर पर अनूठे नवाचार करने वाले इस उपन्यास के कुछ पन्नों को सामाजिक मीडिया में प्रसारित करके उपहास किया गया.

प्रधानमंत्री, राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जिम्मेदार गृहमंत्री, विदेश मंत्री, शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री, सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष सहित हिंदी प्रदेशों के भाजपा मुख्यमंत्रियों में से किसी ने भी इस पुरस्कार का स्वागत करने की जरूरत नहीं समझी और न ही लेखिका को बधाई देने की. स्मरण रहे कि ये वे शक्तिशाली महापुरुष हैं, जो हर मौके पर अपना हिंदी प्रेम दिखाना नहीं भूलते.

दूसरी ओर, एक वर्ग मानता है कि इस पुरस्कार ने विश्व साहित्य में हिंदी के लिए एक अभूतपूर्व व ऐतिहासिक जगह बनायी है. जब किसी अंतरराष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार की बात होती है, तो उसमें यह तथ्य अनिवार्यतः रहता ही है कि ऐसे पुरस्कार का चयन बिना अनुवाद के नहीं हो सकता. अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार तो दो शर्तों के साथ ही किसी गैर-अंग्रेजी पुस्तक को जाता है- पहली, मूल पुस्तक किसी भी भाषा की हो, उसका अंग्रेजी अनुवाद जरूरी है और दूसरी, प्रकाशक इंग्लैंड या आयरलैंड का हो.

यह इस पुरस्कार की प्रशंसनीय विशिष्टता है कि वह लेखक और अनुवादक दोनों को बराबर का सम्मान और बराबर की पुरस्कार राशि देता है. ‘रेत समाधि’ भले ही बिक्री का कीर्तिमान बना चुकी हो, भले ही मुख्यतः अंग्रेजी किताबों से सुशोभित रहने वाली दूकानें उसे प्रमुख जगह दे रही हों, भले ही ऑनलाइन विक्रेताओं की सूची में यह पहले स्थान पर हो, हमारे राष्ट्रवादी हिंदी साहित्य जगत, सरकारी संस्थाओं और शासकीय विभूतियों ने उसे एक मौन राजकीय समाधि दे दी है.

अब दूसरी उपलब्धि की बात कर लें. पहले तो कई हिंदी अखबारों, अज्ञात कुल-वय-शील पोर्टलों और चैनलों ने खूब उत्साह से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनने की घोषणा कर दी. पर कुछ विघ्नसंतोषियों ने जरा ध्यान से खबरों को पढ़ने की गुस्ताखी कर दी. पता चला कि पुर्तगाली, स्वाहिली, बांग्ला, उर्दू और फारसी भी इस सूची में शामिल हैं.

हम हिंदी वाले झुनझुनों पर बच्चों की तरह खुश होना छोड़ें और तथ्यों की कड़ी जमीन पर खड़े होकर अपने और अपनी भाषा को उसकी संपूर्ण पारिस्थितिकी और संदर्भों में रख कर देखना शुरू करें. जब से इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में विश्व हिंदी सम्मेलनों की नींव रखी गयी, तब से यह संकल्प बार-बार दोहराया गया है कि भारत हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने का पूरा प्रयास करे. साल 2007 के विश्व हिंदी सम्मेलन का तो उद्घाटन ही न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के सभागार में तत्कालीन महासचिव बान की मून द्वारा हुआ था.

इस बारे में सबसे ठोस प्रयास विदेश मंत्री के रूप में सुषमा स्वराज ने किये थे, यह बात असंदिग्ध रूप से कही जा सकती है. उन्होंने हिंदी के प्रमुख संपादकों के साथ एक विशेष बैठक में बताया था, इस काम की दो अनिवार्य आवश्यकताएं हैं- संयुक्त राष्ट्र के दो तिहाई सदस्य देश यानी 128 देश इस प्रस्ताव का समर्थन करें और सभी 193 सदस्य देश इस पर होने वाले व्यय को आनुपातिक रूप से वहन करने को तैयार हों. यह टेढ़ी खीर है.

एक समझौते के तहत भारत सरकार लगभग आठ लाख डॉलर प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र को देती है, जिससे संयुक्त राष्ट्र कार्यालय सोशल मीडिया, वेबसाइट, इंटरनेट रेडियो के माध्यम से हिंदी में समाचार उपलब्ध कराता है. संयुक्त राष्ट्र समाचार की मोबाइल एप का एक हिंदी एक्सटेंशन भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशी दौरों में लगभग हर जगह हिंदी में ही बोलते हैं और इस तरह हिंदी को वैश्विक राजनय के उच्चतम स्तर पर प्रतिष्ठित कर रहे हैं.

हिंदी के लिए ये जो दो द्वार खुले हैं, इनका सापेक्ष आकलन हम कैसे करें? इस लेखक की विनम्र राय यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी का उल्लेख होने से कई गुना ज्यादा बड़ा द्वार गीतांजलि श्री की ‘रेत समाधि’ ने खोला है. बांग्ला में लिखी ‘गीतांजलि’ को नोबेल पुरस्कार दिलवाने में दो प्रतिष्ठित अंग्रेजी साहित्यकारों- विलियम बट्लर येट्स और थॉमस स्टरजी मूर- ने सहायता की थी. जिन तीन-चार अन्य लेखकों की पुस्तकों के साथ ‘रेत समाधि’ की टक्कर थी, वे पहले से ही बहुत प्रतिष्ठित वैश्विक लेखक थे. यदि चयनकर्ताओं ने हिंदी उपन्यास को सर्वश्रेष्ठ माना, तो यह असाधारण उपलब्धि है.

यह लेखक के साथ उसकी भाषा, संस्कृति और देश को एक विशिष्ट सम्मान और स्थान दिलाती है. गीतांजलि श्री को मिला पुरस्कार उनके अपने औदार्यपूर्ण शब्दों में ‘भारतीय भाषाओं में लेखन की सुदीर्घ परंपरा की नींव पर खड़ा हुआ है.’ इस पर प्रश्न खड़े करना केवल अपना अज्ञान, बौद्धिक संकीर्णता, दुराग्रह और ओछापन प्रकट करना है.

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