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भारतीयता को मजबूती देते भागवत

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भारतीयता को मजबूती देते भागवत
संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत

Mohan Bhagwat : कुछ आवाजें होती हैं, जो घाव देती हैं, जबकि कुछ आवाजें होती हैं, जो मरहम का काम करती हैं. कुछ लोग बोलते हैं, तो आक्रामक हो जाते हैं. जबकि कुछ लोग देश की आत्मा के बारे में बात करने की कोशिश करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत दूसरी श्रेणी में आते हैं, जिनकी शांत मुस्कराहट और स्पष्टवादिता संघ की करीब शताब्दी प्राचीन विशेषताओं-संयम, धरती से जुड़ाव और भारत की ऐतिहासिक सांस्कृतिक निरंतरता- के बारे में बताती हैं. पिछले सप्ताह आरएसएस के सौ वर्ष की यात्रा के उपलक्ष्य में नयी दिल्ली के विज्ञान भवन में अपनी तीन दिवसीय संवाद शृंखला में उन्होंने स्पष्ट किया कि 1925 में डॉ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित यह संगठन कोई खास प्रयोग नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक शक्ति है, जो दूसरी सदी की अपनी यात्रा की तैयारी कर रही है.


संघ के इतिहास में पहली बार इसके प्रमुख ने भाषा, हिंदूवाद, गोपनीयता, जनसंख्या, तकनीक, जातिगत आरक्षण जैसे मुद्दों पर श्रोताओं के दो सौ प्रश्नों के उत्तर दिये. उन्होंने कहा कि वह आरक्षण का समर्थन करते हैं. उनके मुताबिक, हिंदू वह है, जो भारतीयता में विश्वास करता है और जिसकी जड़ भारतीय संस्कृति में है. लेकिन घुसपैठियों को बाहर किया जाना चाहिए. उनके मुताबिक, हर क्षेत्रीय भाषा राष्ट्रभाषा है, जबकि विदेशी भाषा थोपना अस्वीकार्य है. आरएसएस के कार्यालय और शाखाओं के आलोचकों से उन्होंने कहा कि पूर्वाग्रह के बजाय वे खुद वहां जाकर कोई राय बनायें. उन्होंने यह भी कहा कि जनसंख्या के मामले में ‘हम दो-हमारे तीन’ की नीति उदारवादी और सांस्कृतिक रूप से सजग नीति है.

उनका संदेश स्पष्ट था : संघ कोई पहेली या रहस्य नहीं है. या तो इसके अंदर आकर खुद देखिए या फिर गढ़े गये विमर्श को त्याग दीजिए. संघ की इस पहल की टाइमिंग बहुत महत्वपूर्ण है. दरअसल राहुल गांधी 2018 से ही संघ पर हमला कर रहे हैं. राहुल लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि आरएसएस भारत के बहुतलावादी जीवन मूल्यों की अनदेखी कर रहा है. यह हिंदुत्व के अपने वर्चस्ववादी विचार देश पर थोपना चाहता है और भाजपा को नाजायज फायदा पहुंचा रहा है. आरएसएस को भारत के धर्मनिरपेक्ष तंतु के लिए खतरा बताने वाली राहुल की टिप्पणी विपक्ष को, खासकर चुनावों के समय, बड़ी ताकत देती है.


जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे कांग्रेस नेताओं ने कभी आरएसएस की जो आलोचना की थी, समय के साथ धूमिल हो गयी, लेकिन राहुल गांधी के निरंतर हमले ने संघ को सक्रिय और जुझारु रवैया अख्तियार करने के लिए विवश किया. विपक्षी नेताओं को आमंत्रित कर तथा मुस्लिम, ईसाई व बौद्ध अल्पसंख्यक समुदायों को अपने संवाद कार्यक्रम से जोड़कर संघ ने संदेश देने की कोशिश की कि वह समावेशन में विश्वास करता है. संघ की सौ वर्षों की यात्रा को रेखांकित करते इस भव्य आयोजन में लगभग दो हजार लोगों की भागीदारी थी, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के भी प्रतिनिधि थे. आयोजन में भाजपा के सहयोगियों की स्वाभाविक ही मौजूदगी थी. कुछ कांग्रेस नेता भी मौजूद थे, लेकिन राहुल गांधी की अनुपस्थिति बताती थी कि वह संवाद करने की बजाय आरोप लगाने के ज्यादा आग्रही हैं.

दशकों तक संघ अंतर्मुखी तथा अपने स्वयंसेवकों को गढ़ने में व्यस्त रहा. लेकिन अब यह विचारों के वैश्विक बाजार में खुद को एक वार्ताकार के रूप में पेश कर रहा है. मोहन भागवत द्वारा अपनेपन को संघ का मुख्य सिद्धांत बताया जाना ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का ही उदाहरण है. उन्होंने कहा कि हिंदुत्व का विचार संकुचित नहीं, बल्कि वैश्विक है. उन्होंने हिंदुत्व को समावेशी बताया, जिसमें सभी समुदायों के प्रति सम्मान का भाव है. इतिहास हमें बताता है कि संस्थाएं दबाव में विकसित होती हैं. जिस तरह अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद राजकीय शक्ति को नैतिक अधिष्ठान में बदला, उसी तरह संघ खुद को ध्रुवीकरण करने वाले संगठन के बजाय मेल-मिलाप और सामंजस्य वाली संस्था के रूप में पेश कर रहा है. आरएसएस द्वारा पंच परिवर्तन का आह्वान- जिनमें सामाजिक समरसता, पारिवारिक जागरण, पर्यावरणीय सजगता, स्व का बोध और नागरिक कर्तव्य- प्राचीन भारतीय धार्मिक ढांचे का बोध कराते हैं.

पर्यावरणीय सजगता के तहत मौजूदा संकट को सिर्फ प्रौद्योगिकीय चुनौती के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि यह एक धार्मिक जिम्मेदारी है. अमेरिकी टैरिफ के मामले में अपने किसानों के हितों की रक्षा सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह स्वत्व से जुड़ा है, जिसमें विदेशी विचारों या व्यापार के सामने आत्मसमर्पण करने की मनाही है. तमाम दार्शनिक आह्वानों के बावजूद आरएसएस को उसके धर्मनिरपेक्ष शत्रुओं की गहन जांच से गुजरना पड़ता है. राहुल गांधी समेत दूसरे आलोचक इसे एक ऐसा कट्टर राष्ट्रवादी भारतीय संगठन बताते हैं, जो अपने अखंड सांस्कृतिक एजेंडे को मूर्त रूप देने के लिए अल्पसंख्यक समुदायों को हाशिये पर रखता है.


भागवत के विचार सिर्फ आरएसएस के लिए नहीं, भारत के लिए भी महत्वपूर्ण हैं. अगर पहली सदी में संघ का जोर एकत्रीकरण और नियंत्रण पर था, तो दूसरी सदी में शायद वह व्याख्या और संवाद पर जोर दे. अब जब आरएसएस एक सदी की यात्रा पूरी कर दूसरी सदी में प्रवेश कर रहा है, तब इसे अपने समावेशी रुख को बरकरार रखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अल्पसंख्यक आवाजों को न सिर्फ आमंत्रित किया जायेगा, बल्कि उन्हें सुना भी जायेगा. इसे जाति और क्षेत्रवाद जैसे आंतरिक मुद्दों पर बात करनी चाहिए और अपनी सच्ची अखिल भारतीय छवि बनानी चाहिए.

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर यह संगठन युवा पीढ़ी तक अपनी बात पहुंचा सकता है, गलत सूचनाओं का मुकाबला कर सकता है और ‘अपनेपन’ के नजरिये को विस्तार दे सकता है. जब मोहन भागवत ने आलोचकों से संघ की शाखाओं तथा कार्यालयों में आने का आह्वान किया, तो संदेश साफ था- हम भारत हैं और कुछ छिपाते नहीं. इसका पता तो तभी चलेगा, जब बस्तर का एक ग्रामीण, अलीगढ़ का एक छात्र और चेन्नई का एक कामगार आपस में भाईचारा निभाते दिखाई देगा. सवाल यह है कि क्या हम विभिन्नता को खत्म किये बिना एकता स्थापित कर सकते हैं. इस पर आरएसएस का उत्तर न सिर्फ इसका अपना भविष्य, बल्कि भारत की नियति भी तय करेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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