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मैला ढोने की प्रथा अमानवीय व अपमानजनक

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मैला ढोने की प्रथा अमानवीय व अपमानजनक

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा प्राप्त आंकड़े शर्मसार करने वाले भी हैं और चिंताजनक भी. देश के लगभग एक तिहाई जिलों में हाथ से मैला साफ करने की प्रथा अभी भी जारी है. वर्ष 2013 में संसद द्वारा पारित प्रस्ताव, 2014 दिसंबर में कानून की शक्ल में आया. इसके अनुसार, हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन और उनके पुनर्वास संबंधी अधिनियम के तहत बगैर पर्याप्त सुरक्षा उपायों के सीवर या सेप्टिक टैंक के अंदर जाने पर प्रतिबंध है.

सेप्टिक टैंक की सफाई में 21 दिशानिर्देशों का पालन करना आवश्यक होता है. जिसमें विशेष सूट, ऑक्सीजन सिलेंडर, सेफ्टी बेल्ट आदि सुरक्षा उपकरण आवश्यक हैं और अतिरिक्त आपातकालीन सुरक्षा के लिए एंबुलेंस को पहले सूचित करने का प्रावधान भी शामिल है. मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़े ‘स्वच्छता अभियान’ द्वारा एकत्र किये गये हैं.

देश के 766 जिलों में चलाये गये इस अभियान के तहत पाया गया कि केवल 520 जिलों में ही इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सका है. वर्ष 2013 और 2018 में हुए सर्वेक्षण के तहत हाथ से मैला साफ करने के कार्य में 58,098 व्यक्ति संलग्न हैं. इससे अधिक अमानवीय क्या हो सकता है कि जो लोग शुष्क शौचालयों की सफाई में शामिल हैं, वे नंगे हाथों से ऐसा करते हैं और फिर मानव मल को अपने सिर पर रख दूरदराज के स्थानों पर निपटान करते हैं.

वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार गोवा, सिक्किम, केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ और लक्षद्वीप को छोड़कर सभी जगह ऐसे शौचालय मौजूद हैं जहां से मिट्टी को मैनुअली हटाया जाता है. देश में कुल 7,94,390 शुष्क शौचालय हैं. सरकार के पास उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, देशभर में कुछ 11,635 मैला ढोने वाले हैं.

छह दिसंबर, 2013 को संसद द्वारा पारित अधिनियम में कहा गया है कि (1) अस्वच्छ शौचालय समाप्त हों. (2) सीवरों और सेप्टिक टैंक की खतरनाक मैनुअल सफाई पर प्रतिबंध हो. परंतु यह प्रक्रिया अभी भी बेरोकटोक जारी है. एक आंकड़े के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में सफाई के दौरान मुंबई नगर निगम के 2,721 सफाईकर्मियों की मौत हुई है. ऐसी मौतें अन्य शहरों में भी हुई हैं. छोटे-बड़े सभी शहरों के आवासीय-कार्यालय परिसरों के सीवर एवं सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए ठेकेदारों द्वारा अकुशल सफाई कर्मचारियों को बिना बेल्ट, मास्क, टॉर्च और अन्य बचाव उपकरणों के 10-15 मीटर गहरे टैंकों में उतार दिया जाता है.

जहां कई बार जहरीली गैसों से कर्मियों की मौत हो जाती है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हर पांचवें दिन एक सफाई कर्मचारी की मौत होती है. हालांकि सफाई आंदोलन से जुड़े लोगों का मानना है कि मौतों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है. शुष्क शौचालयों की सफाई प्रक्रिया जटिल और अपमानजनक है. आधुनिक शौचालयों में फ्लश की व्यवस्था होती है.

इसके उलट, शुष्क शौचालयों में पानी नहीं होने से मल का निस्तारण खुद नहीं होता, बल्कि हाथों से करना पड़ता है. इसलिए सफाईकर्मी जब किसी सीवर लाइन या सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए उसमें उतरते हैं, तो वहां उन्हें जहरीली गैसों से जलन, सांस, उल्टी, संक्रमण आदि का सामना करना पड़ता है.

हम आजादी के 75 वर्ष के अवसर पर अमृत महोत्सव के राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं. पिछले वर्ष ही हमने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर अनेक स्वच्छता कार्यक्रम आयोजित किये. बापू अपने अंतिम दिनों में अपना अधिक समय वाल्मीकि बस्ती में गुजारना पसंद करते थे. हाथ से मैला साफ करना या मल से भरी टोकरी उठाने का काम सामंती उत्पीड़न की निशानी है.

जातिगत व्यवस्था की मजबूत पकड़ से बंधे ये बेबस लोग समाज में आज भी तिरस्कृत हैं. इसलिए इनकी बेरहम मौतों पर सभ्य समाज में न तो कोई प्रतिक्रिया होती है, न ही इनकी स्मृति में कोई कैंडल मार्च निकलता है. न ही यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनता है. सीवर के अंदर सफाई कर्मचारी की मृत्यु, मृत्यु नहीं बल्कि हत्या है. वर्तमान सरकार पुराने कानूनों को तबदील करने की मुहिम चला रही है, पर सही अर्थों में इसे सफल तभी माना जायेगा जब इस कलंक से देश को मुक्ति मिलेगी.

परंपरागत कलाओं-पेशों पर हुए हमलों, कृषि लगान की भयानक लूट और अकाल ने लाखों लोगों, विशेषकर दलितों को इन अमानवीय कामों के लिए मजबूर किया. विभाजन के समय और उसके बाद से शेष जातियों के हिंदुओं को तो वहां की सरकार ने भारत भेज दिया, परंतु सफाई कर्मचारियों को रख लिया. कारण, वे चले जायेंगे तो सफाई कौन करेगा?

इसी प्रकार, भारत सरकार को पाक में रह गये या आने वाले हिंदुओं की तो चिंता थी, लेकिन सफाई कर्मचारियों की नहीं. अंबेडकर ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर चिंता जतायी थी कि पाकिस्तान ने आवश्यक सेवाओं में शामिल कर उन्हें वहीं रहने को बाध्य कर दिया है और इसमें भारत सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए. पर अंबेडकर के पत्र पर कोई सुनवाई नहीं हो पायी और यही उपेक्षा आज तक बनी हुई है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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