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Home Opinion बड़ा कदम है मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाना

बड़ा कदम है मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाना

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बड़ा कदम है मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाना
मलयालम बनायी गयी आधिकारिक भाषा

Malayalam official language : केरल का नाम केरलम् किया जाना और इसके सप्ताह भर बाद ही मलयालम को राज्य की आधिकारिक भाषा की मंजूरी मिलना महज संयोग नहीं है. राज्य विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हो चुकी है. सो इस संदर्भ में राजनीतिक दलों द्वारा इन दोनों कदमों का श्रेय लेने की होड़ मचना स्वाभाविक है. लेकिन भाषा कानून को लेकर केरल की सीमाओं के बाहर सवाल भी उठने शुरू हो गये हैं.

मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग बहुत पुरानी है. इस दिशा में पहला प्रयास करीब दस वर्ष पहले कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) की सरकार ने किया था. वर्ष 2015 में ओमन चांडी सरकार ने इस विधेयक को पारित कराया था. पर तब इस विधेयक पर पड़ोसी कर्नाटक सरकार ने कड़ा एतराज जताया था. जब इस विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया, तो राष्ट्रपति ने इसे 1963 के ऑफिशियल भाषा एक्ट के नियमों को हटाने के सुझाव के साथ वापस भेज दिया था. फिर दस वर्ष बाद मौजूदा वाम मोर्चा की सरकार ने इसे नये रूप में पारित किया.


इस बार भी कर्नाटक इस कानून का विरोध कर रहा है. अब तक केरल में अंग्रेजी के साथ ही मलयालम की आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रतिष्ठा रही है. लेकिन नये कानून के तहत सरकारी और सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कक्षा 10 तक मलयालम को पहली भाषा के तौर पर अनिवार्य रूप से पढ़ाना जरूरी होगा. अदालती फैसलों और कार्यवाही भी अनिवार्य तौर पर मलयालम भाषा में अनूदित की जायेंगी. अब से राज्य विधानसभा में सभी बिल और अध्यादेश मलयालम में पेश किये जायेंगे.

अंग्रेजी में प्रकाशित महत्वपूर्ण केंद्रीय और राज्य कानूनों का भी मलयालम में अनुवाद होगा. नये कानून के तहत सूचना तकनीकी विभाग को मलयालम के प्रभावी इस्तेमाल के लिए ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर और इंस्ट्रूमेंट विकसित करने की जिम्मेदारी दी जा रही है. राज्य सचिवालय के मौजूदा पर्सनल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स (ऑफिशियल लैंग्वेज) विभाग का नाम बदलकर ‘मलयालम भाषा विकास विभाग’ किया जा रहा है. इन कदमों के साथ ही, राज्य में मलयालम भाषा विकास निदेशालय भी गठित किया जायेगा.


भाषाई अस्मिता के लिहाज से देखें, तो केरल का यह कदम बेहद क्रांतिकारी और भारतीय भाषाओं के हित में है. लेकिन कर्नाटक की आपत्तियों को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. केरल के कासरगोड जिले में कन्नड़ भाषी ज्यादा हैं. राज्य में इसी तरह तमिल, तुलु, गुजराती और कोंकणी भाषी भी हैं. उनकी अपनी भाषाओं में पढ़ाई वाले स्कूल भी हैं. हालांकि, मलयालम भाषा कानून का विरोध तमिल मूल के लोगों ने नहीं किया है. पर कर्नाटक सरकार का तर्क है कि यह कानून केरल में रहने वाले कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों की भाषाई अस्मिता के लिए खतरा है. कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण का तर्क है कि कासरगोड और केरल के दूसरे कन्नड़ भाषी क्षेत्रों में भाषायी अल्पसंख्यक अभी स्कूलों में कन्नड़ को पहली भाषा के तौर पर पढ़ते हैं. केरल में स्कूलों में हिंदी भी पढ़ायी जाती रही है.

दिलचस्प यह भी है कि केरल के विद्वान भी इस कानून के पक्ष में तर्क देते वक्त केंद्र सरकार पर केरल में हिंदी थोपने का आरोप लगाने से नहीं हिचक रहे. केरल सरकार ने हालांकि सफाई दी है कि जिनकी मातृभाषा तमिल, कन्नड़, तुलु या कोंकणी है, उनके लिए भी कानून में प्रावधान हैं. मलयालम को आधिकारिक भाषा बनाने का स्थानीय नागरिक स्वागत तो कर रहे हैं, पर कुछ का मानना है कि इस कानून के नाम से ही अलगाववादी और वर्चस्ववादी झलक मिलती है. केरल के बौद्धिकों के एक वर्ग का कहना है कि बेहतर होता कि इस कानून का नाम ‘मलयालम भाषा एक्ट 2025’ की जगह ‘केरल स्टेट लैंग्वेज एक्ट 2025’ होता. इससे समावेशी संदेश जाता. बौद्धिकों का यह भी तर्क है कि कानून में मलयालम की जगह राज्य में प्रयोग में लायी जाने वाली तमिल, कन्नड़, कोंकणी, तुलु और गुजराती का भी जिक्र होता, तो बेहतर होता.


केरल में जंगलों और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों की अपनी भाषाएं भी हैं. इसलिए एक वर्ग का मानना है कि उनकी भाषाओं की अस्मिता की रक्षा का बोध भी इस कानून में होना चाहिए था. बेशक केरल के विधानसभा चुनाव में मलयालम को आधिकारिक दर्जा मिलना बड़ा मुद्दा होगा. राज्य की राजनीति में प्रभावी दखल देने की ताक में बैठी भाजपा, कांग्रेस और वाम मोर्चा, सभी इसका श्रेय लेने की कोशिश करेंगे. पर यहां के बौद्धिक समाज का मानना है कि इस कानून से राज्य में एक भाषा के वर्चस्व का भाव पैदा हो सकता है. सो, भाषा विकास विभाग और निदेशालय को केवल मलयालम भाषा तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि केरल की सभी भाषाओं के लिए सक्रिय होना होगा. इसमें दो राय नहीं कि मातृभाषा से इतर समूहों से आने वाले लोग किसी भी भाषा को अवसरों और जरूरत के लिहाज से सीखते हैं. इस प्रक्रिया में उत्साह जुड़ जाता है, तो भाषाएं समृद्ध होती हैं. आधिकारिक भाषा बनने के बाद मलयालम को लोग उत्साह से सीखें, शायद यही केरल के बौद्धिक चाहते हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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