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उचित कदम है अमेरिका से एलपीजी समझौता

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उचित कदम है अमेरिका से एलपीजी समझौता
हरदीप सिंह पुरी

LPG agreement : नयी दिल्ली, वाशिंगटन के साथ तनाव कम करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है. कुछ सप्ताह पहले दोनों देशों ने रक्षा ढांचे के समझौते को 10 वर्ष के लिए और बढ़ा दिया था. अब व्यापार अधिशेष को कम करने तथा वाशिंगटन के साथ तनाव कम करने के प्रयास में, नयी दिल्ली ने अमेरिका से लगभग 10 प्रतिशत तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) आयात करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं. हालांकि, इतनी दूर से एलपीजी आयात करना भारत के लिए शायद सबसे अच्छा विकल्प न हो, पर जिन परिस्थितियों में अमेरिका हर देश पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, उसे देखते हुए यह एक उचित कदम प्रतीत होता है.


अमेरिका वर्तमान में दुनिया में तेल और प्राकृतिक गैस दोनों का सबसे बड़ा उत्पादक है. वर्ष 2024 में अमेरिका का तेल उत्पादन वैश्विक उत्पादन का 22 प्रतिशत था, जो सऊदी अरब और रूस के संयुक्त उत्पादन के बराबर था. इसी प्रकार, अमेरिका ने 1,033 अरब घन मीटर गैस का उत्पादन किया, जो वैश्विक प्राकृतिक गैस उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत है. इसलिए, अमेरिका के लिए आकर्षक बाजारों की तलाश करना स्वाभाविक है. भारत तेल और गैस का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है और आने वाले वर्षों में इसकी मांग कई गुना बढ़ने वाली है. ट्रंप प्रशासन भारत पर अमेरिका से तेल और गैस आयात करने का दबाव बना रहा है. भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से, अमेरिका वित्तीय, सैन्य, कूटनीतिक और तकनीकी साधनों के माध्यम से वैश्विक तेल व्यापार को आकार देने और नियंत्रित करने का प्रयास करता है. संरचनात्मक स्तर पर, वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर अमेरिकी प्रभुत्व, विशेष रूप से तेल मूल्य निर्धारण के लिए डॉलर का उपयोग, वाशिंगटन को लाभ प्रदान करता है.

सैन्य दृष्टि से, फारस की खाड़ी में इसकी अग्रिम तैनाती, नौसैनिक प्रभुत्व और प्रमुख उत्पादकों के साथ सुरक्षा साझेदारी इसे आपूर्ति मार्गों को प्रभावित करने में सक्षम बनाती है. इसके अतिरिक्त, अमेरिका सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य प्रमुख उत्पादकों के साथ गहरे संबंध बनाये रखता है, जबकि प्रतिस्पर्धी तेल प्रवाह को प्रतिबंधित करने के लिए ईरान, वेनेजुएला और रूस पर प्रतिबंधों का उपयोग करता है. उसने ईरान और रूस पर कड़े से कड़े प्रतिबंध लगा दिये हैं और अब वह वेनेजुएला पर आक्रमण करने की कोशिश कर रहा है.


भारत के लिए ईरान एक अच्छा विकल्प होता, पर ट्रंप के पहले कार्यकाल में लगाये गये प्रतिबंधों के कारण, नयी दिल्ली ने 2019 में ईरान से तेल आयात बंद कर दिया. हाल के वर्षों में, रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया है, जो 2024 में उसके कुल आयात का लगभग 34 प्रतिशत था. हालांकि, ट्रंप के प्रतिबंधों के बाद, भारत रूस से अपने आयात को सीमित करने की कोशिश कर रहा है और पिछले कुछ महीनों में रूस से आयात में 10 प्रतिशत की गिरावट आयी है. विडंबना यह है कि जिन देशों के पास तेल और गैस है, उन सभी पर या तो प्रतिबंध लगा दिये गये हैं या वे अमेरिका के प्रभाव में हैं. यह अमेरिका को वैश्विक तेल और गैस बाजार पर कब्जा करने का एक बड़ा अवसर देता है.

नवीनतम समझौते के अनुसार, भारत अमेरिका से 22 लाख टन एलपीजी खरीदेगा. यह भारत के बाजार के लिए अमेरिकी एलपीजी का पहला व्यवस्थित समझौता है. इस समझौते पर भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों द्वारा हस्ताक्षर किये गये हैं, जो इस सौदे में सरकार की भूमिका को रेखांकित करता है. वर्ष 2024-25 में, भारत का एलपीजी का वार्षिक आयात लगभग 14.5 अरब डॉलर का था. इसमें अमेरिका का योगदान केवल 0.5 प्रतिशत था, पर नये अनुबंध के साथ यह बढ़ कर 10 प्रतिशत हो जायेगा. एलपीजी के लिए भारत कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब पर निर्भर रहा है. भारत में एलपीजी की अत्यधिक मांग है, क्योंकि इसका उपयोग खाना पकाने और गर्म करने के लिए किया जाता है.
भारत द्वारा अमेरिका के साथ एलपीजी अनुबंध पर हस्ताक्षर को दोनों देशों के बीच टैरिफ के मुद्दे पर चल रही तनातनी की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए.

ट्रंप प्रशासन ने भारतीय आयातों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया था. दोनों पक्ष समझौते पर बातचीत करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है. हालांकि, प्रतिबंधों का असर भारत के अमेरिका को निर्यात पर पड़ने लगा है. यह एलपीजी समझौता व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसे ट्रंप प्रशासन को शांत करने के लिए भारत द्वारा एक सद्भावनापूर्ण कदम के रूप में देखा जा सकता है. चूंकि अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है, इसलिए अमेरिका से दुश्मनी मोल लेना भारत के हित में नहीं है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में, भारत और अमेरिका के बीच कुल व्यापार 131.84 अरब डॉलर का था. भारत का निर्यात 86.51 अरब डॉलर था, जबकि आयात 45.33 अरब डॉलर था. भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष लगभग 41.18 अरब डॉलर था. सरकारी रिपोर्टों के अनुसार, अक्तूबर 2025 में अमेरिका को भारत का निर्यात पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में 8.6 प्रतिशत घट गया. यह गिरावट ट्रंप द्वारा भारत के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के कारण आयी.


टैरिफ से सबसे अधिक प्रभावित श्रम प्रधान और निर्यात उन्मुख क्षेत्र हैं, विशेष रूप से कपड़ा, रत्न, समुद्री भोजन, चमड़ा, रसायन और धातु, जिससे विशेष रूप से छोटी फर्मों में, बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म हो सकती हैं. भारत के अमेरिकी निर्यात पर टैरिफ के प्रभाव के बारे में विशेषज्ञों का अनुमान सात प्रतिशत से 37 प्रतिशत तक है. विभिन्न क्षेत्रों पर प्रतिबंधों के वास्तविक प्रभाव का आकलन करने में समय लगेगा. हालांकि, यह भारत को वैकल्पिक बाजारों की आक्रामक रूप से तलाश करने का अवसर देता है. वर्तमान अमेरिकी प्रशासन पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है. असली सवाल यह है कि क्या यह एलपीजी सौदा भारत को चल रही व्यापार वार्ताओं में मदद करेगा. इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘हां’ है. यह वार्ता के लिए अनुकूल माहौल तैयार करेगा और ट्रंप को कुछ हद तक शांत करने में मदद करेगा. भारतीय वार्ताकारों की टीम अमेरिका को यह दिखा सकती है कि वे रूस से अपने तेल आयात को धीरे-धीरे कम करने की कोशिश कर रहे हैं और व्यापार अधिशेष को कम करने के लिए अमेरिका से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करने के इच्छुक हैं. हालांकि, यह भी सच है कि अंतिम समझौता होने तक अनिश्चितताएं बनी रहेंगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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