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Home Opinion परंपरा के विपरीत ओली की चीन यात्रा, पढ़ें डॉ धनंजय त्रिपाठी का खास लेख

परंपरा के विपरीत ओली की चीन यात्रा, पढ़ें डॉ धनंजय त्रिपाठी का खास लेख

परंपरा के विपरीत ओली की चीन यात्रा, पढ़ें डॉ धनंजय त्रिपाठी का खास लेख
नेपाल के प्रधानमंत्री चीन की यात्रा पर

KP Sharma Oli : नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के लिए भारत की जगह चीन को प्राथमिकता दी गयी है. ओली दो से पांच दिसंबर तक चीन की आधिकारिक यात्रा पर थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद इस बार उनकी यह पहली आधिकारिक यात्रा थी. हालांकि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है. ऐसा करने वाले ओली दूसरे प्रधानमंत्री हैं. इससे पूर्व 2008 में नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ भी अपनी पहली आधिकारिक यात्रा पर चीन ही गये थे. यह बात जरूर है कि यह परंपरा रही है कि नेपाल के प्रधानमंत्री अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के लिए भारत का ही चुनाव करते रहे हैं, इसके बाद उन्होंने किसी दूसरे देश की यात्रा की है. जब भी इस तरह की यात्रा होती है, तो उसका एक सांकेतिक महत्व होता है, जिसमें आप यह जताने का प्रयास करते हैं कि आपके प्राथमिकता के क्षेत्र में कौन से देश सबसे ऊपर हैं. इस तरह से यह एक सांकेतिक यात्रा कही जा सकती है. आप इसका यह अर्थ भी निकाल सकते हैं कि ओली ने कहीं न कहीं यह दिखाने की कोशिश की है कि चीन को शायद वो भारत के ऊपर अधिक प्राथमिकता देना चाहते हैं.


जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. वर्ष 2008 में प्रचंड भी ऐसा कर चुके हैं. पर चीन की यात्रा के बाद वे भारत भी आये थे. और प्रचंड के प्रधानमंत्री काल में भारत-नेपाल संबंध काफी सुधरे भी थे. ऐसे में यह मानना सही नहीं होगा कि ओली की चीन यात्रा से चीन-नेपाल के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर बड़े पैमाने पर कोई बदलाव होने जा रहे हैं. इस यात्रा से नेपाल-भारत के रिश्ते में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है. ओली की चीन यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच नौ समझौते भी हुए हैं. यदि आप इन समझौतों को देखेंगे तो इनमें कोई ऐसी भड़काऊ बात नहीं है. जहां तक बीरआइ प्रोजेक्ट की बात है, जिसमें सहयोग के लिए ओली ने अभी हस्ताक्षर किया है, तो नेपाल सात वर्ष पहले से इस परियोजना का हिस्सा है.

सच कहें, तो बीआरआइ नेपाल में अधिकांश मामलों में एक असफल परियाजना रही है. नेपाल-चीन के बीच बीआरआइ को पुनर्जीवित करने की प्राथमिकता है, पर वह इतना आसान नहीं है, विशेषकर दक्षिण एशिया के अंदर चीन की कर्ज नीति (डेब्ट डिप्लोमेसी) को देखते हुए. श्रीलंका के अंदर चीन ने बहुत से ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर खड़े कर दिये, जिसे उसकी अर्थव्यवस्था उपयोग ही नहीं कर सकती है. ठीक इसी तरह, मालदीव के अंदर चीन ने बहुत से बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर बना दिये, जो उनके लिए उपयोगी नहीं रहीं. यह भी सच है कि केवल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने से कुछ नहीं होगा, बल्कि इन छोटे देशों की अर्थव्यवस्था भी विकसित होनी चाहिए. इस तरह की परियोजनाएं चीन ने पूरे दक्षिण एशिया में बना रखी है. पाकिस्तान चाहे जो कुछ भी बोले, पर उसके भीतर भी बीआरआइ की आलोचना होती है.

इन देशों की स्थिति को देखते हुए नेपाल को लगा कि बीआरआइ से उसे लाभ कम हानि अधिक होगी. इसीलिए वहां यह परियोजना सफल नहीं हो पायी. इस यात्रा के बाद भी परियोजना को लेकर कोई महत्वपूर्ण बदलाव होने की संभावना नहीं है. यह बदलाव तब होगा, जब चीन नेपाल को बड़ी रियायत देगा. और जिस तरह से चीन अपने आर्थिक हितों को ऊपर रखता है, मुझे नहीं लगता है कि वह नेपाल को बीआरआइ में कोई बड़ी रियायत देगा. ऐसी स्थिति में यह परियोजना नेपाल में सफल नहीं हो पायेगी.


यह भी गौर करने वाली बात है कि भारत-नेपाल संबंध पिछले कुछ समय में मजबूत हुए हैं. दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार बढ़ा है. हाल ही में भारत-नेपाल-बांग्लादेश के बीच ऊर्जा व्यापार का समझौता हुआ है. यह ऊर्जा व्यापार नेपाल को लाभ पहुंचाने वाला है. कहा जा रहा है कि 28 ऐसी परियोजनाएं हैं, जिसके जरिये नेपाल लगभग 700 मेगावाट बिजली भारत को देने वाला है. जिससे आने वाले समय में इस व्यापार के 16 अरब नेपाली रुपये तक पहुंचने की संभावना है. तो इस ऊर्जा व्यापार से नेपाल को आर्थिक रूप से बड़ा लाभ होगा. ऐसा अनुमान है कि भविष्य में भारत-नेपाल के बीच ऊर्जा व्यापार 10,000 मेगावाट तक पहुंच जायेगा. इस दृष्टिकोण से देखें, तो नेपाल की अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान का रास्ता भारत से होकर गुजरता है, न कि चीन से.

चीन की तरफ से इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के लिए जो धन आ रहा है, वह कर्ज अधिक बढ़ायेगा, चीनी उद्योगों को अधिक लाभ देगा, बनिस्पत नेपाल के. पर भारत के साथ नेपाल का जो ऊर्जा व्यापार होगा, उससे नेपाल को भारत की तुलना में कहीं अधिक लाभ होगा, उसकी अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत होगी. एक बात और, जब भी हम भारत-नेपाल संबंध की चर्चा करते हैं, तो राजनीतिक व आर्थिक पहलू के अतिरिक्त उसके सामाजिक व सांस्कृतिक पहलू को भी देखते हैं, जो बहुत महत्व रखता है. दोनों देशों के बीच साझी संस्कृति है. बेटी-रोटी का संबंध है. उसे आप चीन या किसी भी अन्य देश के साथ बदल नहीं सकते. भारत के साथ भी यही बात लागू होती है. नेपाल-भारत के बीच में कोई परंपरागत सीमा नहीं हैं. वैसी सीमाएं नहीं हैं, जहां पर रुकावट हो, हालांकि बीच में कुछ सीमा विवाद हुए हैं, परंतु उसके बावजूद रोटी-बेटी के संबंध में कमी नहीं आयी है. लोगों का आपस में प्रेम बना हुआ है.


एक और बात, ओली कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध रखते हैं. पिछली बार भी जब वो प्रधानमंत्री बने थे, तो चीन के पक्ष में उन्होंने कुछ बयान दिये थे, भारत से थोड़ी सख्ती से बात करते थे, पर इन सबके बावजूद उस दौरान भी भारत-नेपाल संबंधों में कोई बहुत गिरावट नहीं आयी थी. संबंध ठीक ही रहे थे. रही बात चीन की, तो ओली की इस यात्रा से उसे जरूर लाभ होगा. चीन निरंतर दक्षिण एशिया के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रहा है. पाकिस्तान का वह सदाबहार दोस्त है. बांग्लादेश के भीतर भी वह अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रहा है. नेपाल में भी वह काफी कुछ करना चाहता है. तो चीन के दृष्टिकोण से यह यात्रा अधिक महत्वपूर्ण है. चीन की दक्षिण एशिया में भारत के साथ थोड़ी प्रतिस्पर्धा तो है ही, तो वह ऐसी कोशिश करता है या करना चाहेगा कि किसी तरह से यहां उसकी स्थिति भारत से मजबूत बने. इसके लिए वह ओली की इस यात्रा को बढ़ा-चढ़ा कर दिखायेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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