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युद्ध के बदलते तरीकों के बीच संयुक्त कमान जरूरी

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युद्ध के बदलते तरीकों के बीच संयुक्त कमान जरूरी

संजय बनर्जी (कर्नल रिटायर्ड)

हाल ही में केंद्र सरकार ने संयुक्त थिएटर कमान की स्थापना के लिए नियमों को औपचारिक रूप से अधिसूचित किया है, जो देश के सशस्त्र बलों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. बीते कुछ वर्षों से सशस्त्र बलों में संयुक्त कमान को लेकर अटकलें, चर्चाएं/बहसें हो रही हैं. पर जब पहली बार सीडीएस (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ) के पद पर जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति हुई, तब जाकर तीनों सेनाओं की कमान सार्वजनिक तौर पर चर्चा में आयी. पर सच तो यह है कि सशस्त्र बल और रक्षा मंत्रालय काफी समय से संयुक्त कमान को लेकर विचार-विमर्श कर रहे थे, जिसमें सेना के तीनों अंगो- थल सेना, नौसेना और वायु सेना शामिल थे. दरअसल, युद्ध के बदलते क्षेत्रों और नयी युद्ध रणनीतियों के विकास को देखते हुए इसकी आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही थी.

यह सर्वविदित तथ्य है कि सशस्त्र बलों की विभिन्न शाखाएं कभी भी अलग-अलग काम नहीं करती हैं. पहले भी संघर्ष के दौरान हवाई सहायता के लिए थल सेना (आर्मी) को हमेशा वायु सेना द्वारा समर्थन दिया जाता रहा है. सेना के अंगों में जरूरी सहयोग और तालमेल बना रहे, इसके लिए उन्हें संयुक्त प्रशिक्षण दिया जाता रहा है. इसी कारण 1965, 1971 के युद्धों औैर 1999 के संघर्ष के समय हमने जीत हासिल की. हालांकि सैन्य कार्रवाई के दौरान बलों की कमान थल सेना के पास थी क्योंकि वे संघर्ष अनिवार्य रूप से जमीनी थे, जहां दुश्मन को या तो बेदखल किया जाना था और भूमि को पुनः प्राप्त करना था या उसे अपने कब्जे में लेना था. पर 1971 के संघर्ष की कमान पूरी तरह से भारतीय नौसेना के हाथों में थी, जहां वायु सेना आवश्यकता के अनुसार सहायता करती थी. हालांकि संघर्ष की शुरुआत में हमारी वायु सेना ने भी दुश्मन वायु सेना के खिलाफ अपनी स्वतंत्र भूमिका निभायी थी, ताकि हवाई मार्ग के जरिये प्रभुत्व हासिल किया जा सके.

मिसाइलों (सभी रेंज की), ड्रोन, मानव रहित हवाई वाहन, नयी पीढ़ी के विमान और उच्च स्तर के इलेक्ट्रॉनिक और काउंटर इलेक्ट्रॉनिक उपायों को शामिल करने के साथ ही आधुनिक युद्ध के तरीके पूरी तरह से बदल गये हैं. इस लिहाज से देखें, तो भूमि, जल और वायु के जरिये लड़े जाने वाले युद्ध के तरीकों के बीच की विभाजक रेखाएं धुंधली पड़ गयी हैं. अब तीनों सेनाओं को अपनी क्षमताओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है और दुश्मन से एकजुट एवं एकीकृत बल के रूप में लड़ना पड़ता है. यही वह कारण है, जिसने संयुक्त त्रि-सेवा कमान की आवश्यकता उत्पन्न की है, जिसका नेतृत्व, युद्ध क्षेत्र किस तरीके का है, इसके आधार पर तीनों सेनाओं के अधिकारियों द्वारा किया जायेगा. हालांकि रेगिस्तानी, अर्ध-रेगिस्तानी और पहाड़ी क्षेत्र अभी भी अनिवार्य रूप से थल सेना और वायु सेना के प्रभुत्व में रहेंगे, जबकि नौसैनिक लड़ाइयां नौसेना और वायु सेना के प्रभुत्व में लड़ी जायेंगी, जिसमें समुद्र तट पर उतरने या द्वीपों और तटों की रक्षा के मामले में थल सेना की भागीदारी होगी. संयुक्त कमान होने का एक प्रमुख कारण आधुनिक मिसाइलों, ड्रोन, एयरक्राफ्ट और इलेक्ट्रॉनिक उपायों की आश्चर्यजनक रूप से प्रभावशाली पहुंच है. युद्ध के नये वाहन सभी संभावित भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करने में सक्षम होने के साथ ही एक साथ प्रभाव डाल सकते हैं. इस तरह ये युद्ध के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं. अच्छी तरह से संगठित संयुक्त कमान रणनीतिक सोच, सहयोग और प्रशिक्षण के साथ प्रभावी ढंग से बचाव या आक्रामक कार्रवाई कर सकती है. हालांकि संयुक्त कमान को बेहतर बनाने के लिए कहना जितना आसान है, उसे जमीन पर उतारना उतना सरल नहीं है. सबसे पहले, सशस्त्र बलों को अपने कामकाज के पुराने तरीकों को छोड़ना होगा और अपनी अंतर-सेवा प्रतिद्वंद्विता और आधिपत्य को छोड़ना होगा, यदि कोई है तो. एकमात्र त्रि-सेवा संस्थान जहां तीनों सेवाओं के अधिकारी युद्ध कला और रणनीतिक मामलों में एक साथ प्रशिक्षण लेते हैं, वे हैं रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज और राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज. ऐसे में तीनों सेवाओं के रैंक और फाइल के लिए सामूहिक प्रशिक्षण को पुनर्गठित करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से अत्याधुनिक कनिष्ठ नेतृत्व स्तर पर और निचले रैंक के लिए, जो युद्ध के मैदान में शारीरिक रूप से अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करेंगे.

भारत-पाकिस्तान के बीच हुए हालिया संघर्ष ने संयुक्त कमान की आवश्यकता को पूरी तरह से पुष्ट किया है. पाकिस्तान के अंदर स्थित आतंकवादी मुख्यालयों और प्रशिक्षण शिविरों पर भारतीय वायु सेना और भारतीय थल सेना (आर्मी) ने मिसाइल का इस्तेमाल कर सटीक निशाना साधा था. जब पाकिस्तान ने ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों से जवाबी कार्रवाई की, तब भारतीय थल सेना और भारतीय वायु सेना की वायु रक्षा प्रणालियों ने ही ढाल का काम किया था. जब भारत के जवाब देने का समय आया, तब भारतीय वायु सेना और थल सेना द्वारा दागी गयी मिसाइलों ने सफलतापूर्वक पाकिस्तानी वायु सेना के ठिकानों को निशाना बनाया. नतीजा, पाकिस्तान को युद्ध विराम के लिए मजबूर होना पड़ा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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