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Home Opinion विशाल बाजार और बड़ी युवा आबादी हैं भारत की शक्ति

विशाल बाजार और बड़ी युवा आबादी हैं भारत की शक्ति

विशाल बाजार और बड़ी युवा आबादी हैं भारत की शक्ति
देश के युवा

young population : आज का विश्व ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और भू-राजनीतिक घटनाएं सीधे व्यापार और आम जनजीवन को प्रभावित कर रही हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा संकट, महंगाई और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान ने दुनिया के व्यापारिक ढांचे को बदल कर रख दिया है. ऐसे समय में संकट केवल चुनौती नहीं होता, वह नये अवसरों के द्वार भी खोलता है. बीते कुछ वर्षों में दुनिया ने देखा है कि वैश्विक व्यापार कितना परस्पर जुड़ा हुआ है. चीन में उत्पादन रुकने से अमेरिका में सामान की कमी हो जाती है, यूरोप में युद्ध होने से भारत में पेट्रोल व डीजल की कीमतें बढ़ जाती हैं, और समुद्री मार्गों में बाधा आने से छोटे व्यापारियों तक की लागत बढ़ जाती है. इससे पता चलता है कि अब व्यापार स्थानीय नहीं रहा, बल्कि हर व्यवसाय किसी न किसी रूप में वैश्विक घटनाओं से प्रभावित होता है.


वर्तमान समय भारत के लिए मिश्रित प्रभाव लेकर आया है. एक ओर कच्चे तेल, गैस और आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ी है, तो दूसरी ओर विश्व की बड़ी कंपनियां चीन पर निर्भरता कम कर भारत की ओर देख रही हैं. यह भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर है. यदि हम अपनी उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता और लॉजिस्टिक को मजबूत करें, तो भारत विश्व का प्रमुख विनिर्माण और निर्यात केंद्र बन सकता है. पर आज व्यापार की सबसे बड़ी चुनौती अनिश्चितता है. डॉलर की कीमत में उतार-चढ़ाव, कच्चे माल की कीमतों में तेजी, ब्याज दरों में वृद्धि और उपभोक्ताओं की बदलती क्रय क्षमता ने व्यापारिक रणनीतियों को पूरी तरह बदल दिया है.

ऐसे में केवल बड़ा कारोबार होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लचीला और दूरदर्शी कारोबार होना आवश्यक है. वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रभाव छोटे और मध्यम उद्योगों पर पड़ा है. कच्चे माल की कीमतें बढ़ीं, परिवहन महंगा हुआ, बैंक ऋण पर ब्याज बढ़ा और बाजार में प्रतिस्पर्धा तीव्र हो गयी है. ऐसे में कई छोटे उद्योगों के लिए नकदी प्रवाह बनाये रखना कठिन हो गया है. पर ठीक इसी दौर में डिजिटल तकनीक ने नये अवसर भी दिये हैं. आज एक छोटा व्यापारी भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से देश-विदेश के ग्राहकों तक पहुंच सकता है. डिजिटल भुगतान, इ-कॉमर्स और सोशल मीडिया मार्केटिंग ने आज व्यापार की परिभाषा बदल दी है.


भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका विशाल घरेलू बाजार और युवा जनसंख्या है. आज भारतीय उपभोक्ता गुणवत्ता, ब्रांड और सुविधा को महत्व देता है. यह बदलाव भारतीय उद्योगों के लिए सकारात्मक संकेत है. यदि हम ‘मेक इन इंडिया’ को गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा से जोड़ें, तो भारतीय उत्पाद विश्व बाजार में मजबूत पहचान बना सकते हैं. वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का महत्व भी बढ़ गया है. कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने स्पष्ट कर दिया है कि आयात पर अत्यधिक निर्भरता जोखिमभरा है. भारत को नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और हरित उद्योगों पर तेजी से काम करना होगा. यह केवल पर्यावरण की आवश्यकता नहीं, आर्थिक मजबूती की भी शर्त है.

उधर तकनीक के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है. एआइ, ऑटोमेशन और डाटा आधारित निर्णय प्रणाली व्यापार की कार्यशैली बदल रही है. जो व्यवसाय तकनीक अपनायेंगे, वे आगे बढ़ेंगे, जो पुराने तरीकों पर अड़े रहेंगे, उनके लिए प्रतिस्पर्धा कठिन होगी. वैश्विक संकट का सामाजिक प्रभाव भी है. महंगाई बढ़ने से आम आदमी की क्रय शक्ति प्रभावित होती है. जब उपभोक्ता खर्च कम करता है, तो बाजार की मांग घटती है एवं व्यापार प्रभावित होता है. इसलिए सरकारों के लिए आवश्यक है कि वे रोजगार, बुनियादी ढांचे और निवेश को बढ़ावा दें. भारत सरकार के अवसंरचना, डिजिटल इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन और स्टार्टअप नीति जैसे कदम सही दिशा में हैं. पर इनका लाभ तभी व्यापक होगा, जब उद्योग जगत भी पारदर्शिता, गुणवत्ता और नवाचार को प्राथमिकता देगा.


आज भारतीय व्यवसायियों के सामने निर्यात का बड़ा अवसर भी है. विश्व बाजार नये आपूर्तिकर्ता खोज रहा है. टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग, फूड प्रोसेसिंग, ऑटो कंपोनेंट और आइटी सेवाओं में भारत की क्षमता बहुत बड़ी है. हमें केवल सस्ती कीमत पर नहीं, विश्वस्तरीय गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति के आधार पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी. समझना होगा कि व्यापार केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं है. वर्तमान वैश्विक संकट ने सिखाया है कि मजबूत समाज और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के पूरक हैं. कर्मचारियों का कौशल विकास, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, स्थानीय समुदायों का सहयोग और नैतिक व्यापारिक व्यवहार अब केवल सामाजिक दायित्व नहीं, दीर्घकालिक व्यावसायिक सफलता की शर्त बन चुके हैं. वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण अवश्य हैं, पर निराशाजनक नहीं. भारत के पास जनशक्ति, बाजार, उद्यमिता और लोकतांत्रिक स्थिरता जैसी अनेक शक्तियां हैं. यदि हम आत्मविश्वास, नवाचार और अनुशासन के साथ आगे बढ़ें, तो यह संकट भारत के लिए एक नये आर्थिक युग की शुरुआत बन सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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