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Home Opinion ‘दृष्टि’ के जरिये भारत के नये अंतरिक्ष युग की शुरुआत

‘दृष्टि’ के जरिये भारत के नये अंतरिक्ष युग की शुरुआत

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‘दृष्टि’ के जरिये भारत के नये अंतरिक्ष युग की शुरुआत
दृष्टि उपग्रह

Drishti : भारतीय स्टार्टअप अब तेजी से उन्नत अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं. कैलिफोर्निया से स्पेसएक्स रॉकेट में भारतीय स्टार्टअप, गैलेक्सआइ द्वारा एक खास उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा जाना इस नवपरिवर्तन को दिखाता है. इसका नाम है ‘दृष्टि’. यह सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि दिखाती है कि अब अंतरिक्ष क्षेत्र सिर्फ सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि युवाओं द्वारा शुरू किये गये स्टार्टअप इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. इसरो और डीआरडीओ जैसे संस्थानों ने जो मजबूत नींव तैयार की, उस पर निजी कंपनियां नयी ऊंचाइयां हासिल कर रही हैं.


इसकी महत्ता को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि पारंपरिक उपग्रह संवेदक कैसे काम करते हैं. आमतौर पर उपग्रह संवेदक दो प्रकार की तकनीक पर आधारित होते हैं- ऑप्टिकल (प्रकाशीय संवेदक) और सिंथेटिक (कृत्रिम) अपर्चर रडार (एसएआर). ऑप्टिकल संवेदक बिल्कुल सामान्य कैमरे की तरह काम करते हैं. ये सूर्य के प्रकाश के परावर्तन के आधार पर तस्वीरें लेते हैं, जिससे स्पष्ट और समझने में आसान चित्र प्राप्त होते हैं. पर इनकी एक सीमा है- ये बादल, धुएं या सूर्य के प्रकाश के अभाव में काम नहीं कर पाते. दूसरी ओर एसएआर तकनीक, माइक्रोवेव सिग्नल का उपयोग करती है, जो बादलों और धुएं को आसानी से पार कर सकते हैं, और अंधेरे में भी काम करते हैं. इससे हर समय, हर मौसम में निगरानी करना संभव हो जाता है. हालांकि, एसएआर से मिलने वाली तस्वीरें सामान्य चित्र जैसी नहीं होतीं, बल्कि एक्स-रे जैसी जटिल होती हैं, जिन्हें समझने के लिए विशेष ज्ञान और कौशल की आवश्यकता होती है.

‘दृष्टि’ को खास बनाने वाली बात यह है कि इसमें इन दोनों तकनीकों को एक ही उपग्रह में जोड़ा गया है. इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि दोनों संवेदक एक ही समय पर एक ही स्थान की तस्वीर लेने के लिए पूरी तरह समन्वित हैं. इस तकनीक को गैलेक्सआइ ने ‘ऑप्टोएसएआर’ नाम दिया है. पहले ऑप्टिकल और एसएआर के संलयन के लिए विभिन्न उपग्रहों और विभिन्न समयों से प्राप्त चित्र लेने पड़ते थे, जिससे अक्सर अध्ययन में असंगति आ जाती थी. ‘दृष्टि’ इस समस्या को पूरी तरह खत्म करने में सक्षम है. अब यदि बादलों या अंधेरे के कारण ऑप्टिकल संवेदक काम नहीं कर पाता, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से एसएआर डाटा से ऑप्टिकल जैसे चित्र तैयार किये जा सकते हैं.


‘दृष्टि’ को बनाना आसान नहीं था. ऑप्टिकल और एसएआर सेंसर अलग-अलग तरीके से काम करते हैं तथा पृथ्वी को अलग-अलग कोण से देखते हैं. यदि इनमें ठीक से तालमेल न किया जाये, तो ये अलग-अलग स्थानों की तस्वीरें ले सकते हैं. गैलेक्सआइ ने अपनी विशेष तकनीक के जरिये इस समस्या को हल किया और दोनों संवेदकों को एक साथ काम करने के लिए तैयार किया. इससे हर समय उपयोगी चित्र उपलब्ध रहेंगे. यह सिर्फ तकनीकी सुधार नहीं, व्यावहारिक बदलाव भी है, क्योंकि इससे उपग्रहीय आंकड़े अब अधिक लोगों के लिए उपयोगी और सुलभ हो जायेंगे. इस उपलब्धि को भारत के बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के संदर्भ में समझना भी जरूरी है. चेन्नई स्थित अग्निकुल कॉसमॉस और हैदराबाद स्थित स्काइरूट एयरोस्पेस जैसे स्टार्टअप पहले ही थ्रीडी प्रिंटेड रॉकेट इंजन और निजी रॉकेट लॉन्च जैसी उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं.

वहीं पिक्सेल (नयी दिल्ली), ध्रुवा स्पेस (हैदराबाद) और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस (बेंगलुरु) जैसी कंपनियां उपग्रह और प्रणोदन तकनीकों में नये प्रयोग कर रही हैं. ये सभी मिलकर भारत में एक मजबूत और तेजी से विकसित हो रहा अंतरिक्ष बाजार बना रहे हैं. ‘दृष्टि’ की उपयोगिता भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. यहां अक्सर बादल छाये रहते हैं, खासकर मॉनसून के दौरान, जिससे ऑप्टिकल छायाचित्रण में बाधा आती है. ऐसे में यह उपग्रह आपदा प्रबंधन, कृषि योजना और पर्यावरण निगरानी में मददगार साबित हो सकता है. गैलेक्सआइ के संस्थापकों ने साबित किया है कि बड़े बदलाव लाने के लिए जरूरी नहीं कि आपके पास बहुत बड़े संसाधन हों- जरूरी है सोच, नवाचार और लगातार प्रयास की.


‘दृष्टि’ जैसी तकनीक हमें सिर्फ पृथ्वी ही नहीं, अन्य ग्रहों को जानने में भी मदद करेगी. शिक्षा के क्षेत्र में भी ‘दृष्टि’ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा. इससे विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित जैसे विषयों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और आने वाले समय में और अधिक नवाचार देखने को मिलेगा. ‘दृष्टि’ का प्रक्षेपण न केवल अंतरिक्ष आधारित सुदूर संवेदन को एक नयी दिशा देता है, बल्कि यह भारतीय स्टार्टअप्स की क्षमता और आत्मविश्वास का भी प्रमाण है. जब ‘दृष्टि’ पृथ्वी की कक्षा में अपनी यात्रा शुरू करेगा, तो वह सिर्फ तकनीक ही नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के सपनों और उम्मीदों को भी साथ लेकर चलेगा. यह याद दिलायेगा कि प्रगति उन्हीं लोगों के कारण होती है जो अलग सोचने का साहस रखते हैं. भारत के लिए यह एक नये अंतरिक्ष युग की शुरुआत है, और दुनिया के लिए इस बात का संकेत है कि जब नवाचार की कोई सीमा नहीं होती, तब संभावनाएं भी असीमित हो जाती हैं. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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